बहु संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वर्ग संख्या

बहु संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वर्ग संख्या

सामूहिक 'योजक' निर्देश विभिन्न विषयों की तालिकाओं में अनेक स्थानों पर मिल जाते हैं। निम्नलिखित उदाहरणों में सामूहिक 'योजक' निर्देशों का पालन करते हुए संश्लेषित वर्ग संख्या का निर्माण किया गया है:
(a) शीर्षक First aid in heart diseases की वर्ग संख्या का निर्माण करने के लिए सर्वप्रथम तृतीय सारांश तदुपरान्त संबंधित तालिका में देखने पर वर्ग संख्या 616.12 तथा शीर्षक [Diseases] of heart मिल जाता है। यह एक तारांकित शीर्षक है अत: पाटिप्पणी "Add as instructed under 616.1 - 616.9 " का अनुसरण करते हुए पृ. 868 - 869 में दिए गए निर्देशों तक पहुंच जाते हैं । इन निर्देशों का अवलोकन करने पर 0252 First aid मिल जाता है। अब, निर्देशों के आरंभिक भाग में दी गई टिप्पणी A side from...add to notation for each Term identified by* as follows:" के अनुसार First aid की वर्ग संख्या 0252 को आधार संख्या 616.12 के आगे जोड़ देते है। अतः शीर्षक -
First aid in heart diseases की वर्ग संख्या 616.12 + 0252 = 616.120 252

बहुसंश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वर्ग संख्या निर्माण की विधि की जानकारी देना

(b) शीर्षक Violin performance की वर्ग संख्या का निर्माण करने हेतु, सर्वप्रथम तृतीय सारांश में देखने पर 787 String instruments and their music शीर्षक मिल जाता है। 787 की तालिका में 787.1 Violin शीर्षक दिया हुआ है किन्तु इसके आगे तारा-चिन्ह अंकित है। अत: हम पृष्ठ के नीचे दी गई पाद् टिप्पणी "Add as instructed under 787 - 789 " का अनुसरण करते हुए उसके पहले पृष्ठ में दिए गए निर्देशों तक पहुंच जाते हैं । इन निर्देशों का अवलोकन करने पर 0714 performance शीर्षक मिल जाता है । फिर इन निर्देशों के आरंभिक भाग में दी गई टिप्पणी Add to each subdivision identified by * as follows : के अनुसार performance की संख्या 0714 को आधार संख्या 787.1 के आगे जोड़ देते हैं। अत: शीर्षक Violin performance की वर्ग संख्या -
787.1 + 0714 = 787.107 14 5. अभ्यासार्थ प्रश्न
i) Management of cooperative enterprises ii) Remodeling the architecture of post office buildings iii) Flute concerts iv) Society of library science students v) Motion-picture photography of science vi) Problems in acquisition of government publications in libraries vii) Book selection in national libraries viii) Surgical treatment of ovary diseases ix) Physical chemistry of Potassium
x) Preservation of knitted laces वर्ग संख्याएं । 1) 658.047
2) 725.160 286 3) 788.510 73
4) 371.840 2 5) 778.538 5
6) 025.283 4 7) 025.218 75
8) 618.110 7 9) 546.383 5
10) 746.220 488
6. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. DEWEY (Melvil), Dewey Decimal Classification and Relative Index. 19th
ed., Ed by Benjamin A Custer. Albany, N.Y. The Forest Press,
1979. 2. SATIJA (MP), Exercise in the 19th edition of Dewey Decimal
Classification, New Delhi, Concept, Publishing Co., 2001,
260
इकाई - 17 :

निर्माण उद्देश्य

2. विभिन्न तालिकाओं से बहुसंश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण करना। संरचना/विषयवस्तु
1. विषय प्रवेश 2. बहुसंश्लेषण की प्रक्रिया 3. बहु संश्लेषण का उदाहरण सहित अध्ययन 4. सारांश 5. अभ्यासार्थ प्रश्न | 6. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. विषय प्रवेश
दशमलव वर्गीकरण प्रणाली का मूल स्वभाव सामान्यतया परिगणनात्मक होने के कारण इस प्रणाली में समस्त विषयों को सर्वप्रथम मुख्य वर्गों में तत्पश्चात प्रत्येक मुख्य वर्ग को प्रभागों में। प्रत्येक प्रभाग को अनुभागों में, तथा प्रत्येक अनुभाग को उप-अनुभागों में उत्तरोत्तर विभक्त करते जाते है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में किसी एक विषय के विभिन्न पक्ष अलग-अलग अनुभागों या उप-अनुभागों या फिर सारणियों में वर्गीकृत किए हुए मिल सकते हैं। पिछले अध्यायों में संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वर्ग संख्या निर्माण की विधियों का अध्ययन किया। उन अध्यायों में किसी आधार संख्या के आगे तालिकाओं अथवा सारणियों से सम्पूर्ण वर्ग संख्या या उसका एक अंश जोड़ने के निर्देश दिए गए थे।
इस अध्याय में दिए गए विभिन्न उदाहरणों में बहु संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वर्ग संख्या निर्माण की विधि का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, वर्ग संख्याओं या उनके उन अंशों, जिन्हें बहुसंश्लेषण की प्रक्रिया में जोड़ना है, को दृष्टांत में समान्तर चतुर्भुज के अंदर रखा गया है। किसी वर्ग संख्या के आगे दिए गए शीर्षक के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए आवश्यकतानुसार उसके विस्तृत शीर्षक को दीर्घ कोष्ठक में दिया गया है। जो उदाहरणों से स्पष्ट होगा।

2. बहुसंश्लेषण की प्रक्रिया

विशिष्टीकरण तथा मिशन-अभिमुख शोध के युग में बहु पक्षिक विषयों पर प्रलेखों का प्रकाशित होना एक साधारण बात हो गई है। अनेक बार ऐसे विषयों के वर्गीकरण की आवश्यकता हो जाती है जिनके विभिन्न पक्ष तालिकाओं तथा सारणियों में दो से भी अधिक स्थानों पर वर्णित हैं। ऐसे बहु पक्षिक विषयों के वर्गीकरण के लिए संश्लेषण की प्रक्रिया को अनेक बार दोहराने की आवश्यकता पड़ती है। वर्गीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया में संश्लेषण की प्रत्येक अवस्था के लिए स्पष्ट निर्देश दो तरह से दिए जा सकते हैं। यह निर्देश या तो मूल आधार संख्या के ही साथ दिए होते हैं या मूल आधार संख्या के साथ केवल एक अन्य वर्ग संख्या या उसके अंश को जोड़ने के निर्देश मिलते हैं। यहां पहुंचने पर पुनः जोड़िए निर्देश मिल जाते हैं। इस प्रकार अंकों की एक कड़ी के साथ दूसरी कड़ी जुड़ती चली जाती है। और अंत में विभिन्न वर्ग संख्याओं या उनके अंशों को जोड़कर बनी अंतिम वर्ग संख्या में तीसरे अंक के पश्चात एक दशमलव बिन्दु लगाकर बहु संश्लेषण की प्रक्रिया पूर्ण की जाती है।
बहु संश्लेषण की प्रक्रिया में आधार संख्या का निर्धारण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसी आधार संख्या के साथ अन्य पक्षों को जोड़ने के निर्देश मिलते हैं। आधार संख्या के निर्धारण में दशमलव वर्गीकरण प्रणाली के आधारभूत ढांचे की जानकारी की प्रमुख भूमिका होती है। यदि उचित आधार संख्या का निर्धारण कर लिया जाय तो अन्य पक्षों को जोड़ने के लिए उत्तरोत्तर निर्देश मिलते जाते हैं। वैकल्पिक रूप में, स्वानुभाविक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। और प्रत्येक उचित होने वाले पक्ष से आरंभ करके संश्लेषण की प्रक्रिया की जांच की जा सकती है। जिस पक्ष की वर्ग संख्या के अंतर्गत संश्लेषण का प्रावधान है उसी को आधार संख्या मानकर बहु संश्लेषित वर्ग संख्या का निर्माण किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया में अनेक स्तरों पर पूर्ण वर्ग संख्या अथवा उसका एक अंश जोड़ने का प्रावधान होता है। अत: संश्लेषण की प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर से संबंधित वर्ग संख्याओं को अभ्यास पुस्तिका में उत्तरोत्तर लिखते जाना चाहिए। इससे अंतिम बहुसंश्लेषित वर्ग संख्या निर्मित करते समय जोड़ने में असुविधा न हो। 
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शीर्षक - प्रायोगिकी की पत्रिका

 शीर्षक - प्रायोगिकी की पत्रिका

Journal of Technology 605
खण्ड दो की अनुसूची में Serial Publictions of Technology का अंकन 605 (V2, P824) दिया गया है। इस शीर्षक में भी मुख्य आधार अंक 600 से दोनों शून्य अंकों को छोड़कर शेष अंक 6 के साथ मानक उपविभाजन अंकन 05 को जोड़ा गया है।
6 + 05 = 606 टिप्पणी :
खण्ड दो की अनुसूची में मुख्य वर्ग अंक के साथ से अन्तिम शून्य अंक मानक उपविभाजन अंकन जोड़ने से पहले हटाने का प्रावधान है। लेकिन अगर ऐसे अंकन के विषय भाग अगर मानक उपविभाजनों की जगह तक बढ़ाया गया है तब मानक उपविभाजनों को अनुसूची में दिए हुए प्रावधान के अनुसार ही जोड़ा जाता है। जैसे कि Philosophy and theory of the arts का वर्गीक 700.1 है न कि 701 और Study and Teachings of Religion का अनुसूची में वर्ग अंक 200.7 दिया हुआ है न कि 207 ।। 6. सारणी-1 में प्राथमिकता सारणी का प्रयोग ।
। आमतौर पर सारणी 1 में दी गई मानक उपविभाजनों में से किसी दो मानक उपविभाजनों को एक के बाद एक किसी एक वर्ग अंक के साथ नहीं जोड़ा जाता। वर्गाकार को दोनों मानक उपविभाजनों में से एक को जोड़ने का निर्देश है। वर्गाकार की सहायता के लिए सारणी 1 से पहले एक प्राथमिक सारणी दी हुई है। जिसके प्रयोग से वर्गाकार यह तय कर सकता है कि अगर किसी शीर्षक में दो मानक उपविभाजन का वर्णन हो तो वर्गाकार को किस मानक उपविभाजन को प्राथमिकता देनी चाहिए जैसे किशीर्षक - यान्त्रिक इंजीनियरिंग की तकनीक में दृश्य-श्रव्य उपचार

Audio Visual treatment of techniques of mechanical engineering 621.028

इस शीर्षक में Technique 028 तथा Audio-visual treatment 0208 दोनों मानक उपविभाजन हैं, इसलिए दोनों में से एक को ही आधार अंक 621 (V2, P926) के साथ जोड़ा जा सकता है। सारणी 1 के शुरू में ही दिए गए प्राथमिकता सारणी के अनुसार मानक उपविभाजन technique के अंकन 028 को Audio-visual treatment के अंकन -0208 से प्राथमिकता दी गई है। इसलिए शीर्षक 18 का सही वर्गीक है 621 + - 028 = 621.028 न कि 621 + - 0208 = 621.0208 ।। शीर्षक - अर्थशास्त्र के क्षेत्र में संगठनों की तालिका
Tables of organizations in the field of Economics 330.021 2
अर्थशास्त्र शीर्षक में Organisation तथा Tables दोनों मानक उपविभाजन हैं। किन्तु सारणी 1 के साथ Prefix प्राथमिक सारणी में Tables के मानक उपविभाजन के अंकन - 0212 को organisations के मानक उपविभाजन के अंकन -06 से प्राथमिकता दी गई है। इसलिए इस शीर्षक के आधार अंक 330 (V2, P240) के साथ जोड़ा जाएगा ।
330 + - 0212 = 330.021 2 टिप्पणी :
उपर्युक्त शीर्षकों से यह संकेत मिलता है कि अगर किसी शीर्षक में दो मानक उपविभाजन हों तो वर्गाकार वरीयता सूची (Table of Precedence) की सहायता से यह तय कर सकता है कि दोनों मानक उपविभाजनों में से आधार अंक के साथ किस मानक उपविभाजन को जोड़ा जाएगा। लेकिन सारणी 1 में -04 एक ऐसा मानक उपविभाजन है जिसके साथ -01 से -09 तक कोई भी मानक उपविभाजन जोड़ा जा सकता है।

शीर्षक - संरचनात्मक इंजीनियरिंग आकलन की सामग्री का अध्ययन

Study of Structural Engineering estimates of materials 624.104 207
खण्ड दो की अनुसूची में Structural Engineering का आधार अंक 624.1 दिया हुआ है (V2, P984)। इस अंक के साथ मानक उपविभाजन -042 को जोड़कर Structural Engineering estimates का अंकन 624.1042 अनुसूची में दिया गया है। सारणी 1 में दिए गए मानक उपविभाजन 04 के साथ दिए गए निर्देशानुसार इस मानक उपविभाजन के साथ 0109 तक कोई भी मानक उपविभाजन जोड़ा जा सकता है। निर्देशानुसार अन्तिम वर्गीक -
624.1042 + 07 = 624.104 207 शीर्षक - शास्त्रीय संगीत का अध्यापन
Teachings of Classical Music 780.430 7
अनुसूची में संगीत का आधार अंक 780 है। और 780.43 अंकन Classical संगीत को निर्धारित किया गया है । इस अंकन में 043 मानक उपविभाजन के अंक 04 का विस्तार है। मानक उपविभाजन -07 को जोड़ने के बाद अन्तिम वर्गीक --
780.43+07= 780.430 7 बनेगा। 7. मानक उपविभाजनों का विस्तार
बहुत से मानक उपविभाजनों का विस्तार सारणी 1 में दिए गए मानक उपविभाजनों के साथ निर्देशानुसार सारणी 2 से 7 को साथ जोड़ने से किया जा सकता है। मानक उपविभाजनों के प्रसार के लिए कहीं-कहीं खण्ड 2 की अनुसूची से भी अंकन लिए जाने का निर्देश मानक उपविभाजनों की सारणी 1 में दिया गया है। मानक उपविभाजनों के प्रसार का अनुप्रयोग निम्नांकित उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा। शीर्षक - व्यावसायिक बैंकों में ईलैक्ट्रोनिक डाटा प्रक्रमण

Electronics data processing in commercial Banks 382.120 285 4

अनुसूची में व्यावसायिक बैंकों का अंकन 332.12 दिया हुआ है (V2, P263)। इस अंकन के साथ सारणी 1 से data processing का मानक उपविभाजन अंकन -0285 जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन मानक उपविभाजन अंकन -0285 के नीचे यह निर्देश दिया गया है।
Add to the base number -0285 the number following 011.61 - 00.64 ।। अर्थ यह है कि वर्गाकार को केवल 001.61 - 00.64 या इसी के आगे के विभाजनों में से Electronics data processing का अंकन खण्ड 2 की अनुसूची से देखकर उसमें से 006.6 अंक को हटाकर बाकी अंकों को 001.6 के साथ जोड़ना है।
| खण्ड 2 की अनुसूची में Electronics data processing का अंकन 001.64 दिया हुआ है। ऊपर दिए हुए निर्देशानुसार Electronics data processing का मानक उपविभाजन बनेगा -0285 + 4 = -02854 और शीर्षक 21 का अन्तिम अंकन बनेगा।
| 332.12 + 02854 = 332.120 285 4 शीर्षक - संगीत उपकरणों के निर्माण में संश्लेषण ध्वनि के सिद्धांत
Principles of Synthesis of sound in manufacturing Musical Instruments 681.801 534 4
| अनुसूची में Musical Instruments Manufacturing का आधार अंक है 681.8 (V2, P1199)। इस शीर्षक में Scientific Principles का अंकन 015 मानक उपविभाजन है। सारणी 1 में इस मानक उपविभाजन के नीचे यह निर्देश दिया गया है कि इस मानक उपविभाजन के साथ 510-590 तक अंक 5 को हटाकर बाकी अंकों को 015 के साथ जोड़ा जा सकता है। शीर्षक 23 में Synthesis of sound का अंक है 534.4 | अंक 5 को हटाकर बाकी के अंकन को अगर 015 से जोड़ा जाए तो अन्तिम वर्गीक बनेगा
681.8+015+344 = 681.801 534 4 शीर्षक - जैव टैक्नोलोजीविज्ञों के भू-अर्थविज्ञान

Land Economics for Biotechnologists 333.002 462 08

अनुसूची में Land Economics का अंकन 333 दिया हुआ है (V2, P275) । इस अंकन के साथ मानक उपविभाजन जोड़ने के लिए जैसे कि अनुसूची में संकेत दिया है एक अतिरिक्त शून्य लगानी होगी। मानक उपविभाजन -024 के नीचे यह निर्देश दिया हुआ है कि अगर कोई एक ग्रन्थ का किसी दूसरे विशेष विषय के लिए लिखा जाता है तो उस का अंकन सारणी 7 से लिया जाए। निर्देशानुसार शीर्षक का वर्गीक इस प्रकार बनेगा -
333 + 0024 + 6208 = 333.002.462 08 शीर्षक - स्पेनिश भाषा के अन्तर्राष्ट्रीय विधान का विश्वकोश

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ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख

ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख

इस भाग में वर्गीकरण की विभिन्न अनुसूचियों का उल्लेख है। वर्ग संख्याओं का निर्माण करने के लिये संबंधित अनुसूचियों से एकल संख्यायें प्राप्त की जाती हैं।
अध्याय 02 में ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख है तथा ग्रन्थांक में प्रयोग में लाये जाने वाले रूप (Form) उप विभाजनों की अनुसूची दी गई है- जैसे सचित्र ग्रन्थ के लिये f(Picture), अनुक्रमणिका के लिये b(index) कोड (संहिता) के लिये q(Code) इत्यादि।
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नोट:- ग्रन्थांक का निर्माण करते समय इस अध्याय के साथ-साथ भाग 1 के अध्याय 03 का निरंतर अवलोकन करना पड़ता है।
अध्याय 1 में ज्ञान जगत का विभाजन मुख्य वर्गों में किया गया है। प्रत्येक मुख्य वर्ग के लिये प्रयुक्त प्रतीक चिन्ह का भी संबंधित मुख्य वर्ग के साथ उल्लेख किया गया है। जैसे, 2 = Library Science, B= Mathematics, C=Physics, V=History इत्यादि।
अध्याय 2 में सर्वमान्य एकलों की अनुसूची का उल्लेख है। यहां पर प्रायः अधिकांश सर्वसामान्य एकलों के साथ उनसे सम्बन्धित पक्ष परिसूत्र दिया गया है। इस पक्ष परिसूत्र को ध्यान में रखकर संबंधित सर्वसामान्य एकल का प्रयोग किया जाता है। जैसे, m (P), (P2) =Periodically; Autobiography= w(P),1: Conference Proceeding =p(P),(P2).

सर्वसामान्य एकलों का प्रयोग करते समय भाग- 1 

के अध्याय 2 का निरंतर अवलोकन करना पड़ता है क्योंकि इस अध्याय में प्रत्येक पक्ष-परिसूत्र के संबंध में दिशा निर्देश दिये गये हैं। (पृ. 1.43 से 1.46)
अध्याय 3 में काल एकलों का दो स्तरों पर विभाजन किया गया है। प्रथम स्तर कलैण्डर पर आधारित समय को- जैसे, M=1800 से 1899 (उन्नीसवीं शताब्दी) तथा वितीय स्तर पृथ्वी की गति अथवा प्राकृतिक घटना चक्र पर आधारित काल को- जैसे n3 = Summer (ग्रीष्मकाल), d=Night (रात्रि) व्यक्त करता है। कलैण्डर पर आधारित काल को B.C. (ई.पू.) एवं A.D. (ई.) के रूप में भी व्यक्त किया गया है। जैसे, C=999 से 1 B.C.; D=1 से 999 A.D. इत्यादि।
अध्याय 4 में स्थान एकलों अर्थात् भौगोलिक विभाजनों का उल्लेख है। स्थान एकलों की भी दो स्तरों पर अनुसूचियां दी गई हैं; जैसे (S1) प्रथम स्तर विश्व के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से संबंधित हैं तथा (S2) द्वितीय स्तर पर प्राकृतिक विभागों का उल्लेख है। (S2) वितीय स्तर के एकलों का संशोधन कर दिया गया है तथा इनका संशोधित रूप परिशिष्ट (Annexure) के पृष्ठ 26 पर उपलब्ध है।
| अध्याय 5 में भाषा एकलों की अनुसूची उपलब्ध है। 'साहित्य' एवं 'भाषा शास्त्र' मुख्य वर्गों में भाषा का प्रयोग होता है तथा भाषा की एकल संख्या इसी अध्याय से प्राप्त की जाती है।

| अध्याय 6 में विभिन्न जाति एवं प्रकार के दशा संबंधों 

के लिये प्रयोग में लाये जाने वाले प्रतीकों का उल्लेख है। ये प्रतीक अन्तर्विषयी, अन्तर्पक्ष एवं अन्तर्पक्ति दशासंबंधों के विभिन्न प्रकारों के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं।
शेष अध्यायों-अर्थात् अध्याय 9a (Generalia Bibliography) से अध्याय Z (Law) तक-में सभी मुख्य वर्गों से संबंधित वर्गीकरण अनुसूचियां दी गई हैं। प्रत्येक मुख्य वर्ग के अन्तर्गत सर्वप्रथम उस मुख्य वर्ग का 'पक्ष-परिसूत्र (Facet Formula) दिया गया है। इसके बाद पक्ष परिसूत्र की मांग के अनुसार विभिन्न पक्षों से संबंधित एकल संख्याओं का क्रमशः उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इनके प्रायोगिक उपयोग संबंधी आवश्यक दिशा निर्देश दिये गये हैं। इन अनुसूचियों के प्रत्येक पृष्ठ को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक
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भाग में पहले (बायीं ओर) प्रतीक संख्या तथा उसके सामने उस प्रतीक संख्या से संबंधित पद (शब्द) का उल्लेख है। पक्ष परिसूत्र में मुख्य वर्ग के वर्गीकरण के लिये आवश्यक पक्षों का ही उल्लेख होता है। स्थान एवं काल पक्ष का प्रायः उल्लेख नहीं होता क्योंकि ये दोनों पक्ष सर्वसामान्य पक्ष होते हैं। इनका प्रयोग विशिष्ट विषय की मांग के अनुसार क्रमशः अध्याय 3 एवं अध्याय 4 के आधार पर कर लिया जाता है। उदाहरणार्थ -

अध्याय 92 के अन्तर्गत (पृष्ठ 2.30) Library Science (ग्रन्थालय विज्ञान) 

का पक्ष परिसूत्र इस प्रकार है: 2 [P]; [M] : [E] [2P] इस पक्ष परिसूत्र में तीन पक्षों का प्रयोग हुआ है; अर्थात् [P], [M] एवं [E]। तदानुसार इस पक्ष परिसूत्र से संबंधित एकल संख्याओं का ही उल्लेख इस मुख्य वर्ग में किया गया है। वर्गीकरण करते समय संबंधित पक्षों की एकल संख्या चुनकर उन्हें इस पक्ष परिसूत्र के क्रम में रखकर वर्गीक का निर्माण किया जाता है। 2.2.1 अनुसूचियों की अनुक्रमणिका एवं विशिष्ट अनुक्रमणिकायें अनुसूचियों की अनुक्रमणिका भाग 2 के अन्त में (पृष्ठ 2.124 से 2.172 तक) अनुसूचियों में प्रयुक्त संघटक पदों की अनुक्रमणिका का उल्लेख है। इसका व्यवस्थापन वर्णक्रम से है। इसके प्रायोगिक उपयोग का विस्तृत विवरण बाद में अनुच्छेद 7 - अनुक्रमणिका प्रायोगिक उपयोग के अन्तर्गत किया गया है। विशिष्ट अनुक्रमणिकायें उपर्युक्त अनुक्रमणिका के अलावा इस भाग 2 में उपयुक्त स्थानों पर निम्नलिखित विशिष्ट अनुक्रमणिकाओं का भी समावेश किया गया है: (i) अध्याय 4 = स्थान एकल के अन्त में (पृष्ठ 2.18 से 2.25 तक) स्थान एकल पदों से संबंधित 'भौगोलिक अनुक्रमणिका' दी गई है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। इसकी सहायता से किसी भी स्थान की एकल संख्या का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अध्याय = वनस्पतिशास्त्र के अन्त में (पृष्ठ 2.61 से 2.63 तक) वनस्पतियों के प्राकृतिक वर्गों के एकल पदों से संबंधित अनुक्रमणिका उपलब्ध है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। अध्याय K= प्राणिशास्त्र के अन्त में (पृष्ठ 2.73 से 2.78 तक) विभिन्न प्राणियों के प्राकृतिक वर्गों के एकल पदों से संबंधित अनुक्रमणिका उपलब्ध है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। 2.3 भाग 3 : वरेण्य ग्रन्थ व धार्मिक ग्रन्थ |

इस भाग में विविध प्रकार के वरेण्य ग्रन्थों एवं धार्मिक ग्रन्थों 

के बने बनाये वर्गीक दिये गये हैं। जैसे भारतीय विद्या (Indology), भारतीय धर्मों, दर्शन शास्त्र, आयुर्वेद, भाषा
शास्त्र, साहित्य समालोचन, अलंकार शास्त्र आदि के ग्रन्थ। इन ग्रन्थों का व्यवस्थापन संबंधित विषय या प्रकरण के अन्तर्गत वर्गीकों के अनुसार सहायक क्रम में किया गया है, जैसे- LBAyurveda System शीर्षक के अन्तर्गत आयुर्वेद के वरेण्य ग्रन्थों का। इन वर्गीकों का निर्माण वरेण्य ग्रन्थ विधि के अनुसार किया गया है। एक सामान्य श्रेणी के वर्गीकरणकार के लिये इन ग्रन्थों का वर्गीकरण करना सरल नहीं था। अतः रंगनाथन ने इस कार्य को इस प्रकार सरल बना दिया है। वरेण्य ग्रन्थों व धार्मिक ग्रन्थों के वर्गीकरण के लिये इस भाग का विशेष महत्व है।

2.3.1 अनुक्रमणिका : वरेण्य ग्रन्थ

वरेण्य ग्रन्थों व धार्मिक ग्रन्थों की उपर्युक्त अनुसूची वर्गीकों के अनुसार व्यवस्थित होने के कारण किसी विशिष्ट धार्मिक ग्रन्थ या वरेण्य ग्रन्थ को इस अनुक्रम में ढूंढना कठिन है। अत: इनकी अनुक्रमणिका इस अनुसूची के तुरन्त बाद पृष्ठ 3.54 से 3.126 तक दी गई है। यह अनुक्रमणिका लेखक के नाम एवं ग्रन्थ की आख्या के अनुसार वर्णानुक्रम में व्यवस्थित है। इस प्रकार किसी भी ऐसे ग्रन्थ का वर्गीक आसानी से ढूंढा जा सकता है।

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अंकन के प्रकार (Type of Notation) विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम

अंकन के प्रकार (Type of Notation) विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम

अर्थात विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम में व्यवस्थित करना है । अंकन के द्वारा प्रत्येक प्रलेख को एक वर्ग संख्या प्रदान की जाती है, जिसके अनुसार वर्गीकृत व्यवस्था यंत्रवत बन जाती है | इस व्यवस्था का लाभ यह है कि पाठक दवारा किसी प्रलेख के मांगे जाने पर उसे लाखों पुस्तकों के मध्य से तुरन्त निकाला जा सकता है और पाठक के द्वारा लौटाये जाने पर पुन: उसके निर्धारित स्थान पर रखा जा सकता है । 2. अंकन अपने क्रमसूचक मान (Ordinal Value) के आधार पर विषयों को समकक्ष एवं अधीनस्थ वर्गों में विभाजित कर, उनके विकास के प्रत्येक स्तर को प्रदर्शित करता है । 3. यह पद्धति की वर्णानुक्रम अनुक्रमणिका (Alphabetical Index) को कार्य शीलताप्रदान करता है, जिसके फलस्वरूप पद्धति में परिगणित वर्गों तक पहुंचा जा सकता है । 4. सूची के दो भागों-वर्णानुक्रम प्रसूची (Alphabetical Catalogue) तथा प्रसूची (Classified Catalogue) को कार्यशील बनाने का कार्य अंकन करता है ।
5. यह फलकों पर प्रलेखों की वर्गीकृत व्यवस्था को यंत्रवत बनाता है ।
6. अंकन वर्गीकरण पद्धति की अनुशूचियों के निर्माण तथा उनके भौतिक स्वरूप में अत्यधिक मितव्ययता प्रदान करता है ।। 7. अंकन अपने स्मृति सहायक (Mnemonics) गुण के कारण पुस्तकालयाध्यक्ष को वर्ग
एवं उसके विभाजन के अनुक्रम को याद रखने में सहायता प्रदान करता है ।
8. यह पुस्तक-संग्रह कक्षों का मार्ग दर्शन करने में सहायता करता है । अर्थात पुस्तक की वास्तविक स्थिति का पता चलता है । 9. आगम-निर्गम प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करने में सहायक होता है ।
10. प्रलेखन सेवा को गति प्रदान करने में सहायक होता है ।
11. पुस्तकालय के विभिन्न आकड़े व रिकार्ड तैयार करने में अंकन की भूमिका होती है ।
12. अंकन का प्रयोग ग्रन्थ की पीठ (Spine), मुख पृष्ठ के पश्च भाग, लेवल, आदि पर लिखने हेतु किया जाता है । 3.3. अंकन के प्रकार (Type of Notation):
वर्गीकरण पद्धति की अंकन व्यवस्था को निर्मित करने के लिए वर्गाचार्य (classificationist) ने कितने प्रकार के व किस प्रकार के अंकों, चिन्हों इत्यादि का प्रयोग किया है, इसी आधार पर अंकन को प्रमुख रूप से दो भागों से बाँटा गया है ।

शुद्ध अंकन (Pure Notation):

जिस वर्गीकरण पद्धति अंकन व्यवस्था में केवल एक ही प्रजाति के अंकों (संख्यायें 1.....9, 0 या अक्षरों A-Z) का प्रयोग किया जाता है, उसे शुद्ध अंकन कहते हैं । शुद्ध अंकन का प्रयोग सर्वप्रथम मेलविल इयूई ने अपनी दशमलव पद्धति में (1876) किया था । राइडर्स इंटरनेशनल क्लैसिफिकेशन (Riders International Classification) में भी शुद्ध अंकन का प्रयोग हुआ है ।
शुद्ध अंकन के गुण (Qualities of Pure Notation): (i) यह बहुत सरल होता है । अत: इसे पढ़ना, लिखना व याद करना आसान है ।
साथ ही पाठकों एवं पुस्तकालय कर्मचारियों के समय एवं श्रम की बचत होती है । (ii) इसके दारा निर्मित वर्ग संख्याओं का क्रम निश्चित करना आसान है । इसके लिए
पुस्तकालय कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती ।। (iii) इसे लिखने व टाइप करने में त्रुटियों की सम्भावना कम रहती है । शुद्ध अंकन के दोष (Demerits of Pure Notation) (i) शुद्ध अंकन का सबसे बड़ा दोष इसके आधार का सीमित होना है । एक प्रजाति के
अंको के प्रयोग के कारण अंकन का आधार सीमित हो जाता है । (जैसे यदि हिन्दअरबी संख्याओं का प्रयोग हो तो आधार अंक केवल 10 होते हैं, या यदि रोमन बड़े अक्षरों का प्रयोग हो तो आधार केवल 26 अंकों का होता है, जिसके कारण शान जगत के प्रथम श्रेणी के वर्गो (First Order Arrays) को विभाजित करने के लिए कम ही अंक उपलब्ध हो पाते हैं ।
(i) सीमित आधार तथा एक ही प्रजाति के अंकों के प्रयोग के कारण वर्ग संख्या अत्यन्त लंबी हो सकती है । (ii) शुद्ध अंकन पर आधारित पद्धति में ज्ञान जगत के निरन्तर विकास के कारण नवउत्पन्न विषयों को समाविष्ट करने की क्षमता का अभाव होता है । शुद्ध अंकन पर आधारित पद्धति में विधियों (Devices) का प्रावधान भी नहीं हो पाता है । मिश्रित अंकन (Mixed Notation) जिस वर्गीकरण पद्धति की अंकन व्यवस्था में कई प्रकार के अंकों, प्रतीकों व चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उसे मिश्रित अंकन कहा जाता है | वर्गीकरण में मिश्रित अंकन के प्रथम समर्थक ई.सी. रिचार्डसन थे । रिचार्डसन ने मिश्रित अंकन का सिद्धान्त प्रतिपादित कर इसकी उपयोगिता बताते हुए कहा कि प्रत्येक वर्गीकरण (पद्धति) को कभी न कभी मिश्रित अंकन प्रयोग करना ही पड़ेगा । ब्लिस भी मिश्रित अंकन के ही समर्थक थे तथा अपनी पद्धति का आधार भी मिश्रित अंकन ही बनाया । सेयर्स ने वर्गीकरण के उपसूत्रों में एक शुद्ध अंकन का उपसूत्र भी प्रतिपादित किया था किन्तु वे मिश्रित अंकन के प्रबल समर्थक थे | रंगनाथन की दवबिन्दु पद्धति (1933), लाईब्रेरी ऑफ कांग्रेस क्लैसिफिकेशन पद्धति (1904),

 ब्राउन की विषयात्मक पद्धति (1906), 

ब्लिस की ग्रंथात्मक पद्धति (1935) आदि मिश्रित अंकन के ज्वलन्त उदाहरण हैं ।
मिश्रित अंकन के गुण (Qualities Mixed Notation) (i) विभिन्न प्रकार के अंकों, प्रतीकों व चिन्हों के प्रयोग के कारण मिश्रित अंकन का | आधार विस्तृत होता है । अत: ज्ञान जगत के प्रथम श्रेणी (First order arrays)
के वर्गों को पृथक-पृथक अंक प्रदान करना सम्भव है ।। (ii) विस्तृत आधार के कारण वर्ग संख्या छोटी बनती है ।। (iii) विभिन्न प्रकार की विधियों (Devices) के प्रावधान के कारण पंक्ति एवं श्रृंखला एकलों में ग्राह्यता का गुण उत्पन्न होने से ज्ञान जगत के विषयों का सूक्ष्म वर्गीकरण सम्भव है । मिश्रित अंकन के दोष (Demerits of Mixed Notation) (i) शुद्ध अंकन की तुलना में यह जटिल होता है, अत: इसे लिखना, बोलना व याद रखना अपेक्षाकृत कठिन होता (ii) मिश्रित अंकन में वर्गों का क्रम जानना कठिन होता है । (iii) मिश्रित अंकन क्रमदर्शक मूल्य (Ordinal Value) को समझकर फलकों से पुस्तकें | निकालना तथा पुन: व्यवस्थित करना एक जटिल कार्य है । 4.4 अंकन में प्रयुक्त होने वाले अंको / प्रतीकों के प्रकार (Species of Digit / Symbols Used in Notation) अंकन व्यवस्था (Notation system) के निर्माण के लिए निम्न प्रकार के, चिन्हों, प्रतीकों इत्यादि का प्रयोग किया जाता है:
1. हिन्द-अरबी अंक (Indo-Arabic numerals) 1 से 9 तथा 0 2. रोमन-दीर्घ अक्षर (Roman Capital Letter): A से Z 3. रोमन लघु अक्षर (Roman Small Letter). a से z 4. ग्रीक अक्षर (Greek Letter) जैसे- A 5. संकेतक अंक (Indirect Digits) जैसे- , ; : . ' ( ) इत्यादि

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गुप्तकाल हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का काल था। प्रमाणित कीजिए।

गुप्तकाल हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का काल था। प्रमाणित कीजिए।

गुप्त कालीन आर्थिक जीवन - गुप्त साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्र पर प्रभाव एवं आधिपत्य तथा कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के कारण देश में शान्ति रही। इससे आर्थिक जीवन समृद्ध एवं विभिन्न साधनों की उत्पत्ति में वृद्धि हो सकी । तत्कालीन आर्थिक स्थिति से सम्बन्धित पहलुओं का अध्ययन निम्न शीर्षक में किया जा सकता है :

गुप्तकाल में कृषि - 

गुप्तकाल में (सैद्धान्तिक रूप से) राजा सम्पूर्ण भूमि का स्वामी होता था लेकिन व्यवहार में भूमि तीन प्रकार की थी। परती जो राज्य के अधिकार में होती थी जो सामान्यतया वेतन के रूप में दी जाती थी, राज्य द्वारा अधिकृत कृषि भूमि, जिसे दान में दिया जा सकता था, लेकिन शायद बहुत कम किया गया, क्योंकि वह पहले से ही जोत की भूमि थी और उससे राज्य को आय होती थी : और तीसरे प्रकार की भूमि निजी स्वामित्व में थी। प्रत्येक भूमि के क्रय-विक्रय के लिए शासकीय आज्ञा की आवश्यकता होती थी।
नन्दपुर ताम्रपत्र (488 ई) से ज्ञात होता है कि परती भूमि भी क्रय की जाती थी। इस अभिलेख में एक अधिकारी स्थानीय शासन के सदस्यों के संघ के सामने निम्न प्रस्ताव रखता है “अब तुम्हारे विषय में परती भूमि के विक्रय प्रणाली की स्थापना (एक कुलीयवाय दो दीनारों की दर पर ) की जाती है। राज्य कृषि की ओर विशेष ध्यान देता था। कृषि की प्रगति के लिए सिंचाई इत्यादि का प्रबन्ध करना शासन का प्रमुख कर्तव्य था । सिंचाई के लिए घटी यन्त्र (रहट) का उपयोग गाँवों में खूब होता था। मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील की जिसका शक शासन रूद्रदमन द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया था, पुन: गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त द्वारा मरम्मत करायी गयी और उसे काम में लाया गया। स्कन्दगुप्त के शासन काल में सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। इस विस्तृत विवरण से न केवल राज्य की कृषि के लिए समुचित व्यवस्था करने का आभास होता है वरन् उस काल में अतिरिक्त जल को एकत्रित कर उसे फसल के लिए प्रयोग में लाने की वैज्ञानिक प्रणाली की जानकारी से अवगत गुप्तकालीन समाज का संकेत मिलता है । फाह्यान के विवरण से इस बात का ज्ञान मिलता है कि राज्य की भूमि जोतने वाले अपनी उपज का एक अंश राजा को कर के रूप में देते थे।
सम्भवतः किसानों को कर नकद (हिरण्य) के साथ-साथ अनाज (भेंट) के रूप में देने की छूट थी। गुप्त युग से ही सामन्तवादी प्रवृत्ति क्रमशः जोर पकड़ रही थी। गुप्त लेखों में जिन भूमिदानों का उल्लेख किया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि भूमिदान के साथ-साथ गाँव की भूमि से उत्पन्न होने वाले आय भी ग्रहीता को सौंप दी जाती थी । इससे समाज में बेगार प्रथा तथा आर्थिक शोषण को बढ़ावा मिला। इस संदर्भ में इतिहासकार रामशरण शर्मा का यह कथन उल्लेखनीय जान पड़ता है जिसमें वे कहते हैं -“गुप्तकाल की महत्त्वपूर्ण घटना थी।

गुप्तकाल में कर व्यवस्था

स्थानीय किसानों के मध्य राजकीय जमीदारों का उदय । पुरोहितों को दिये जाने का जाने वाले भूमि अनुदानों के फलस्वरूप अनेक परती क्षेत्रों में खेती आरम्भ हो गई । परन्तु इस ला को स्थानीय कबीलाई किसानों पर ऊपर से लादा गया। स्थानीय कबीलाई किसान अवस्था में पहुंच गए। मध्य और पश्चिमी भारत में किसानों को बेगार करने को मज गया।” सामन्ती प्रथा के कारण धीरे- धीरे राजा या उसके द्वारा नियुक्त अधिकारियों किसानों का प्रत्यक्ष सम्पर्क समाप्त हुआ तथा राजकोष को आर्थिक हानि हुई । तत्कालीन वो से गुप्त युगीन प्राकृतिक सम्पदा एवं उत्पन्न की जाने वाली फसलों के विषय में हमें बहन कम जानकारी प्राप्त होती है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि उस समय धान, गेहूं, पटसन तिलहन, कपास, नील, ज्वार, बाजरा, विभिन्न औषधियाँ, मसाले, पान आदि की खेती होती थी खेती का ढंग परम्परावादी अर्थात बैलों की जोड़ी तथा लकड़ी के हल (लोहे की फाल लिए हुए) से की जाती थी। बाराहमिहिर की वृहत संहिता में तीन फसलों का जिक्र आया है। एक फसल श्रावण के महीने में तैयार होती थी, दूसरी बसन्त में और तीसरी चैत्र या बैसाख में।

गुप्तकाल में अन्य व्यवसाय व उद्योग धन्धे - 

कृषि के अतिरिक्त गुप्तकालीन भारत में गाँवों तथा शहरों में अनेक अन्य उद्योग धन्धों को भी यथेष्ट प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। गुप्तकालीन अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उस युग में पोत-निर्माण से लेकर मिट्टी के बर्तन बनाने तक और बिहार निर्माण से लेकर छोटे-छोटे गृह निर्माण तक के सभी कार्य निपुण शिल्पकारों के द्वारा किये जाते थे। विविध प्रकार के वस्त्र तैयार करने वाला उद्योग इस समय के अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण उद्योगों में गिना जाता था। देश तथा विदेश में उसकी विस्तृत माँग थी। रेशमी वस्त्रों, मलमल, कैलिको, लिनन, ऊनी तथा सूती वस्त्रों का बहुत बड़े परिमाण में उत्पादन होता था। रेशम की बुनाई का एक केन्द्र पश्चिम भारत भी था। हो सकता है कि परवर्ती गुप्तकाल में रेशम का उत्पादन घट गया हो क्योंकि पश्चिमी भारत में रेशम के बुनकरों की एक महत्त्वपूर्ण श्रेणी के अनेक सदस्यों ने अपना पारम्परिक व्यवसाय छोड़कर दूसरे व्यवसाय को अपना लिया था। हाथी दांत का व्यवसाय अधिक लाभकर था और इसी प्रकार पत्थर की कटाई तथा खुदाई का व्यवसाय भी क्योंकि इस समय मूर्तियों की माँग बहुत अधिक थी । लौह तथा इस्पात उद्योग बहुत प्रगति पर था।
महरौली (दिल्ली) स्थित गुप्तकालीन लौह स्तम्भ इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है कि गुप्तकाल में भारत के लोग अत्यधिक बढ़िया किस्म के लौह तथा धातुओं की वस्त निर्मित करने में कुशल थे । तरह-तरह के खनिज पदार्थ जैसे सोना,चॉदी, तांबा आदि का भी लोगों को ज्ञान हो चुका था। ताँबा ताम्रपत्र, बर्तन और सिक्के के काम आता था। बाराहमिहिर की वृहतसहिंता” में हीरा, मोती, रूबी तथा शंख इत्यादि की बनी वस्तुओं का कई बार उल्लेख आया है। पशुपालन भी जीविका का एक प्रमुख साधन एवं व्यवसाय था। गुप्तकाल में नालन्टा, वैशाली आदि स्थानों में श्रेष्ठियों, सार्थवाहों, प्रथम कुलिकों कलिकों इत्यादि की मह शिल्पियों की संघटनात्मक गतिविधियों को अन्य सामाजिक हित के कार्य भी करने पड़ते थे जैसे सभागृहों का निर्माण, यात्रियों के लिए पानी की सुविधा जुटाना तथा आश्रमगृहों, मन्दिरों, बार्गों का निर्माण करना आदि ।

गुप्तकाल में व्यापार - 

गुप्तकाल में व्यापार के क्षेत्र में भी कुछ उल्लेखनीय तथ्य सामने आए। उदाहरण के लिए विरुपात इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार इस काल में हम विदेश व्यापार में हास पाते हैं।
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गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए। 

Describe the Administration system of Gupta Empire.
गुप्त शासन व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
Give an out line of the Gupta Administration.

गुप्त साम्राज्य की आय के साधन - 

राज्य की आमदनी का मुख्य स्रोत भूमि कर या लगान था जो भूमि की किस्म को देखकर 16 प्रतिशत से लेकर 25 प्रतिशत तक लिया जाता था। भूमि कर के अतिरिक्त राज्य की आय के अन्य स्रोत या साधन निम्नलिखित थे।
(1) चुंगी टैक्स
 (2) आयात-निर्यात कर
(3) व्यापारियों से और शिल्पियों से वसूला गया टैक्स
(4) वनों, चरागाहों तथा खानों से होने वाली आय
(5) धातुकर- सोने चाँदी के निर्यात- आयात का कर
(6) धान्य (अनाज के रूप में)।
(7) अपराधियों से लिया गया अर्थदण्ड
(8) चाट भाट प्रवेश कर (पुलिस और सेना कर)
(9) उपहार भेट आदि से आय।।
गुप्त काल में उपरोक्त प्राप्त आय को सैनिक अभियानों, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, राजाप्रसाद की सज्जा सामग्री और संस्थाओं और विद्वान व्यक्तियों को आर्थिक मदद प्रदान करने में व्यय किया जाता था। कभी- कभी वेतन की जगह कर्मचारियों को जागीरें भी दे दी जाती थी लेकिन गुप्त काल में जागीर देने की प्रथा बहुत नगण्य थी।

गुप्त साम्राज्य में सार्वजनिक हित -

गुप्त सम्राटों में अपनी प्रजा के कल्याण की भावना निहित थी। यह अपनी प्रजा की सुख समृद्धि हेतु भरसक प्रयत्न में जुटे रहते थे। वे अपनी प्रजा को वत्स तुल्य मानते थे और उनकी नैतिक तथा भौतिक उन्नति के लिए प्रयासरत रहते थे । गुप्त सम्राट ने अपनी प्रजा के हितार्थ सड़क का निर्माण करवाया, सिंचाई की व्यवस्था की तथा कृषि की उन्नति हेतु अथवा सिंचाई की व्यवस्था में अनेक बाँधों- झीलों और जलाशयों का निर्माण करवाया, प्रजा के स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु चिकित्सालयों की स्थापना की। अनेक धर्मशालाओं एवं कुओं का निर्माण कराया। गुप्त सम्राट कला साहित्य के प्रेमी थे। अतः उन्होंने अपने राज्य काल में कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन दिया एवं साहित्यकारों एवं कलाकारों को आश्रय दिया । वह अपनी प्रजा के दुख दर्द में शामिल थे अतः उनकी स्थिति को देखते हुए उदारतापूर्वक आर्थिक मदद प्रदान करते थे।

गुप्तों की शासन प्रणाली की समीक्षा : 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि गुप्त वंशीय शासन प्रणाली सुव्यवस्थित और सुसंगठित थी । इतिहासकारों और विद्वानों ने इस व्यवस्था की प्रशंसा की है। डॉ. बी. ए. स्मिथ (Early History of India) में लिखते हैं कि *प्राचीन हिन्दू इतिहास में अन्य सभी युगों की तुलना में महान, गुप्त सम्राटों का युग सर्वाधिक मानवीय और सन्तोषजनक युग है। इनसे अच्छा शासन कभी भारत में हुआ ही नहीं।” डॉ सेल्टर का अभिमत है कि “गुप्त शासन प्रणाली पूर्णत: मौलिक नहीं कही जा सकती किन्तु इसे प्रभावकारी और हितकर अवश्य माना जा सकता है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए इसे विकसित कर लिया गया था। यह एक असभ्य, निरंकुश शासन व्यवस्था नहीं थी, जहाँ राजा ही पूर्णाधिकार प्राप्त शासक था। मंत्रिपरिषद तथा राज्य के उच्चाधिकारियों के रूप में इसमें कई संवैधानिक प्रतिबन्ध थे इस प्रकार की कार्यकुशलता ने राजस्व के स्रोतों को नियमित रूप दिया। इसके आर्थिक साधनों की ऐसी उत्तम व्यवस्था थी कि इसके शासकों को मगध से समुद्रतट की सीमा तक और पश्चिम में सौराष्ट्र की सीमा तक तथा हिमालय के प्रारम्भ से मध्य भारत की दूरवर्ती सीमाओं तक फैले हुए विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखने की क्षमता प्रदान की।

केन्द्र तथा प्रान्तों में प्रशासन व्यवस्था

डॉ. अल्टेकर ने लिखा है कि “केन्द्र तथा प्रान्तों में प्रशासन सुव्यवस्थित था । केन्द्रीय सचिवालय कार्य कुशल था और वह जिलों तथा गाँवों में होने वाली घटनाओं की सूचना प्राप्त करता था। गुप्त प्रशासन ने काफी लम्बे अर्से तक प्रजा को विदेशी आक्रमणों तथा आन्तरिक विद्रोह से सुरक्षित रखा । दण्ड विधान, प्रशासन, न्याय तथा मानवीयता का सुन्दर समन्वय था। सरकार प्रजा के सांसारिक तथा आध्यात्मिक हितों की रक्षा करती थी। प्रशासन के विकेन्द्रित होने के कारण जनता का भी शासन में हाथ था और स्थानीय संस्थाओं को बहुत से अधिकार प्राप्त थे ।”
डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार के कथनानुसार “गुप्त सम्राटों की यह अक्ष कीर्ति थी कि इन्होंने अपनी प्रजा को गुप्त कालीन शान्ति से लाभान्वित किया और पुलिस के उस कठोर नियंत्रण और फौजदारी द विधान के उन कठोर नियमों का प्रयोग नहीं किया जिनसे मौर्य शासन कलंकित हो गया था।
राजबली पाण्य के अनुसार "गुप्त सम्राट ने आदर्श शासन की व्यवस्था हेत एक ऐसी निश्चित योजना अपनाई जिसमें कि प्रजा सुखी और समृद्ध थी। गुप्तों की इस शासन प्रणाली से चीनी यात्री फाह्यान बहुत प्रभावित हुआ था। चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपनी यात्रा के अनुभवों में गुप्त शासन व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि “गुप्त शासन में प्रजा की भलाई की ओर रखासतौर से ध्यान दिया जाता था। शासन व्यवस्था अति उदार थी और सम्राट प्रजा के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता था। राजा कठोर नियमों का पालन नहीं करता था। अपराधों की संख्या नगण्य थी । दण्ड के नियम कठोर नहीं थे सम्पूर्ण साम्राज्य में शान्ति और खुशहाली थी । लोग न्यायालयों के बन्धनों से मुक्त थे और अपने विवादों का समाधान आपस के निर्णयों से ही कर लेते थे । जो लोग राजकीय भूमि में कृषि करते थे, उन्हें उपज का कुछ भाग ही राजा को भूमि लगान के रूप में देना पड़ता था । लोग व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र थे तथा शासन का उनके व्यक्तिगत मामलों में बहुत ही कम हस्तक्षेप होता था।”

गुप्त सम्राटों की धार्मिक सहिष्णुता की नीति

डॉ. ओमप्रकाश ने गुप्त सम्राटों की शासन व्यवस्था की समीक्षा में लिखा है कि गुप्त प्रशासन केन्द्र और प्रान्त दोनों में सुव्यवस्थित था । इन सम्राटों ने अपने साम्राज्य में शान्ति और सुव्यवस्था तो रखी ही साथ ही उन्होंने राज्य के साधनों को पूर्ण उपयोग कर आम प्रजाजनों की आर्थिक दशा को सुधारने का भरसक प्रयास किया। निर्धन और रोगग्रस्त लोगों को राज्य की तरफ से निःशुल्क भोजन वस्त्र और औषधियाँ प्रदान की जाती थी। राज्य प्रजा के लौकिक या भौतिक सुख का ही ध्यान नहीं रखता था । अपितु उसने उनके नैतिक उत्थान के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त कर रखे थे। जो विनय स्थिति स्थापक कहलाते थे । राज्य में स्थानीय विभिन्नताओं का आदर किया जाता था। गुप्त सम्राट धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करते थे राज्य की ओर से समस्त धर्मों को जिनमें कि हिन्दू, बौद्ध एवं जैनों की धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी जाती थी। जिले और गाँव की सभाओं को शासन सम्बन्धी बहुत अधिकार प्राप्त थे । ये संस्थायें स्थानीय साधनों के विकास और शान्ति तथा सुव्यवस्था सम्बंधी कार्यों को पूरा करती थी । गुप्त सम्राटों ने उत्तर भारत को एक सूत्र में बाँधकर राजनीतिक एकता कायम की। गुप्त सम्राटों की इस सुव्यवस्था से आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में वृद्धि हुई । प्रजाजनों को अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों को विकसित करने का एक सुनहरी अवसर मिला।
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Describe the Salient features of the Gupta Administration.

Describe the Salient features of the Gupta Administration.


(1) गुप्त काल में जिलों का शासन - 

प्रान्तों से छोटी इकाई प्रदेश कहलाती थी जो आजकल की कमिश्नरी के बराबर होती थी और इससे छोटी इकाई विषय कहलाती थी जो जिले के बराबर होती थी। विषयों का शासन विषयपति कुमारामात्य अथवा महाराज करते थे। विषयपति की नियुक्ति भी पाँच वर्ष के लिए होती थी और उनकी सहायता के लिए एक सभा का गठन किया जाता था जिसके चार सदस्य होते थे।
(1) नगर व्यापारियों की श्रेणियों या बैंकों (पूगों) के प्रमुख 
(2) सार्थावाह (मुख्यव्यापारी)
 (3) प्रथम कुलिक (अथवा शिल्प श्रेणियों के प्रधान)
 (4) प्रथम कायस्थ (विषय के मुख्य लेखक)
विषयपति के स्थायी स्थान को “अधिष्ठान” तथा कार्यालय को “अधिकरण” कहा जाता था। इसमें निम्नलिखित पदाधिकारियों के विभाग स्थित थे।
(1) धुवाधिकरणिक (भूमि कर का अधिकारी) 
(2) भाण्डामाराधिकृत (कोषाध्यक्ष) 
(3) रालवटक (लेखापाल या मुनीम) 
(4) गोल्मिक (जंगलों और किलों के अधिकारी) 
(5) शौल्किक (चुंगी का संग्रहकर्ता) 
(6) महाक्षपटलिक (प्रलेखागार का अधिकारी)
 (7) अग्रहारिक (दान में दी गई भूमि की देख रेख करने वाला अधिकारी) 
(8) सर्वाध्यक्ष (सामान्य अधीक्षक होते थे, उनके अधीन कुलपुत्र काम करते थे जिन।
कार्य दुराचार रोकना था ।)

(2) गुप्त काल में नगर प्रशासन - 

नगर का शासन राज्य की ओर से नियुक्त पदाधिकारियों तथा स्थानीय सभा, समितियों एवं समुदायों द्वारा सम्पन्न होता था । नागरिक प्रशासन का प्रमुख पुरपाल या नगर रक्षक होता था। नगरों में एक परिषद् भी होती थी जो आधुनिक नगरपालिका की तरह कार्य करती थी। इस परिषद का अध्यक्ष नगरपति कहलाता था । नगरपति को दांगिक कहा जाता था। नगरपति की नियुक्ति विषयपति द्वारा की जाती थी । नगरपति नगर के लोगों से कई प्रकार के टैक्स वसूल करता था और उनसे होने वाली आय को नगर व्यवस्था के उपयोग में लेता था। नगरों में नगरपालिकाएं स्वच्छता, रोशनी, सडक, व्यापार नियंत्रण का कार्यभार संभालती थी । यदि कोई व्यक्ति मुख्य भाग, स्नानागार, मन्दिर तथा भवन के निकट गन्दगी फैलाते हुए पकड़ा जाता था तो उसे दण्ड दिया जाता था, उसे एक पण दण्ड कर के रूप में देना पड़ता था।

गुप्त काल में ग्राम प्रशासन - 

पूर्वी भारत में विषय को वीथियों में विभाजित किया गया और वीथि गाँवों में विभक्त थे । साम्राज्य की सबसे छोटी इकाई गाँव था। ग्राम का मुख्य अधिकारी ग्रामिक, महत्तर अथवा भोजक होता था। डॉ. रामशरण शर्मा के अनुसार गुप्तकाल में ग्राम प्रधान अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। यह गाँव का काम काज श्रेष्ठजनों की सहायता से सम्भालता था। हर गाँव के प्रशासन से प्रमुख स्थानीय व्यक्ति जुड़े हुए होते थे। उनकी अनुमति के बिना जमीन की कोई खरीद बिक्री नहीं हो सकती थी। उक्त विवरणानुसार गाँव की भी अपनी सभा होती थी जिसे ग्राम परिषद् कहते थे। इसमें निम्नलिखित सदस्य होते थे।
(1) ग्रामिक • यह गाँव का मुखिया होता था। 
(2) महत्तर - यह गाँव का वयोवृद्ध तथा अनुभवी व्यक्ति होता था। 
(3) अष्टकुलाधिकारणिक - सम्भवतः स्थानीय क्षेत्र के आठ कुलों या गुप्तचरों का अधिकारी । 
(4) कुटुम्बिन - ये ग्राम के परिवारों के मुख्य सदस्य होते थे।
ग्राम पंचायतें ग्रामीणों के भूमि सम्बन्धी और छोटे- छोटे अन्य प्रकार के झगड़ों का निपटारा करती थी। ग्राम की स्वच्छता, आवास, खेतों की सिंचाई आदि की व्यवस्था भी पंचायत के हाथ में थी।
गुप्त काल में प्रशासनिक विकेन्द्रीयकरण के बारे में डॉ. रोमिला थापर का यह कथन उद्धृत कर देना समीचीन जान पड़ता है कि वह लिखित है अनेक प्रकार के मंत्री और परामर्शदाता राजा की सहायता करते थे। प्रान्त (देश अथवा मुक्ति) अनेक जिलों में (प्रदेश अथवा विषय) में विभाजित थे और प्रत्येक जिले के अपने प्रशासनिक कार्यालय थे। व्यावहारिक स्तर पर स्थानीय प्रशासन केन्द्र के नियंत्रण से मुक्त था। जब तक केन्द्रीय सत्ता की नीति अथवा आदेशों पर कोई स्पष्ट प्रभाव पड़ता हो नीति सम्बन्धी प्रश्नों पर अथवा किन्हीं विशेष स्थितियों के सम्बन्ध में निर्णय साधारणतया स्थानीय स्तर पर ही लिये जाते थे। जिले के अधिकारी (आयुक्त) और उनके ऊपर एक और प्रान्तीय अधिकारी (कुमारामात्य) स्थानीय प्रशासन और केन्द्र के बीच की कड़ी थे। मौर्यों और गुप्तों के शासन में यही महत्वपूर्ण अन्तर था जहाँ अशोक इस बात के लिए आग्रहशील था कि उसे जिलों के छोटे से छोटे अधिकारी के कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, गुप्त राज्य इस भार को कुमारामात्यों तथा आयुक्तों पर छोड़कर सन्तुष्ट थे।”

गुप्त काल में सैन्य संगठन -

गुप्त सम्राटों ने अपने साम्राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु सेना को संगठित करने पर बहुत ध्यान दिया । इस तरह एक विशाल तथा शक्तिशाली सेना का गठन किया। सेना के चार अंग थे । घोड़े, हाथी, पैदल और रथ ही थे। गुप्त सम्राटों ने अपनी सेना को जिस ढंग से सुसज्जित किया। उससे विदित होता है कि उन्होंने रथों की अपनी सेना के लिए अवसर के अनुकूल न समझते हुए उपेक्षा की। सेना का सबसे उच्च अधिकारी महाबलाधिकृत कहलाता था, इसके सहायक अन्य अनेक सैनिक अधिकारी होते थे। सेना की टुकड़ी को चमू कहते थे। सैन्य विभाग के अन्य प्रमुख अधिकारी निम्नलिखित
(1) महासेनापति अथवा महादण्डनायक - राजा के नीचे महासेनापति हुआ करता था।
एक अन्य अभिलेख में इसे महाबलाधिकृत कहा गया है। समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तम्भ लेख में हरिषेण, धुवभूति और तिलकभट्ट को महादण्डनायक कहा गया है।
(2) बलाधिकृत (सैनिकों की नियुक्ति करने वाला अधिकारी)
 (3) भटाश्वति (पैदल और घुड़सवारों का अध्यक्ष)
 (4) रणभाण्डागारिक (सैनिक सामान, रसद आदि का अधिकारी)
 (5) महापीलुपति (गजसेना का अध्यक्ष) 
(6) महाश्वपति (अश्व सेना का अध्यक्ष)
सम्राट की एक परम्परागत सेना होती थी। इसके अतिरिक्त स्थानीय तथा सामन्तों की सेनायें भी होती थी जो विपत्ति आने पर सम्राट की मदद करती थी। अस्त्र- शस्त्र निर्माण हेतु अनेक उद्योग स्थापित थे। प्रयाग की प्रशस्ति के अनुसार सैनिकों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले शस्त्रों में परशु (फरसा) बाण, शंकु शक्ति, प्रासासि, तीमर, भिन्दिपाल, नाराच, वैतास्तिक आदि मुख्य थे। अधिकतर योद्धा तीर, तलवार और फरसों से लड़ते थे और अपनी सुरक्षा हेतु कवच पहनते थे।

गुप्त काल में पुलिस का प्रबंध - 

विदेशी पर्यटकों के अनुसार देश में कानून और व्यवस्था की अच्छी स्थिति थी। अपराधों की संख्या नगण्य थी। बडे-बड़े नगरों में और कस्बों में पुलिस की व्यवस्था की गई थी। पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी दण्डपाशाधिकारी कहलाता था, गुप्तचर विभाग भी था जिसके कर्मचारी दूत कहलाते थे। डॉ. अल्टेकर इस अधिकारी को आधुनिक पुलिस अधीक्षक के समकक्ष मानते थे। फाह्यान के अनुसार “ उस समय चोरी का कोई भय नहीं था इससे ज्ञात होता है कि गुप्तों के समय में पुलिस प्रशासन अधिक सुदृढ़ था।” गुप्त शासन काल में पुलिस विभाग का संगठन निम्न प्रकार था।
(1) दण्डपाशाधिकारी (पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी) 
(2) चौरोद्वरणिक (चोर पकड़ने वाले सिपाही) 
(3) दण्डपाशिक (लाठी और रस्से वाले सिपाही) 
(4) दूत (गुप्तचर विभाग के कर्मचारी) 
(5) भट या गात (साधारण सिपाही)
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