Sunday, December 16, 2018

प्रश्न 23. स्कन्दगुप्त के पश्चात् उत्तराधिकार क्रम निश्चित कीजिए।

प्रश्न 23. स्कन्दगुप्त के पश्चात् उत्तराधिकार क्रम निश्चित कीजिए। 

साक्ष्यों के अभाव के कारण स्कन्दगुप्त के पश्चात उत्तराधिकार के क्रम में मुश्किल हो जाता है। इस कालक्रम निर्धारण में विद्वानों में भी तीव्र मतभेद स्कन्दगुप्त के पश्चात् गुप्त साम्राज्य की अक्षुण्णता का प्रश्न है तो इस बारे में यह कहा जा सकता है कि स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।
डॉ. मजूमदार के कथनानुसार वर्तमान समय में हमें जो जानकारी प्राप्त होती है उसके आधार
157 पर स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त वंश के इतिहास का स्पष्ट विवरण देना अथवा यहाँ तक कि उसकी निश्चित रूपरेखा प्रस्तुत करना भी असम्भव है। हमें अनेक सम्राटों के नाम ज्ञात हैं परन्तु उनकी तिथियों अथवा उनके पारस्परिक सम्बन्धों को सर्वथा निश्चित नहीं किया जा सकता। जिन तथ्यों का ज्ञान हमें प्राप्त है उन्हें इस प्रकार समन्वित नहीं किया जा सकता जिसे सम्पूर्ण रूप से सन्तोषजनक कहा जाय। ऐसी स्थिति में एक पुनः अन्तर्कालीन निर्मित सूची के बनाने का प्रयास करना उचित होगा जो सबसे अधिक तर्कपूर्ण तथा कम से कम आपत्तिजनक हो ।'

स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्तवंश के उत्तराधिकार का क्रम

नवीन सूची के अनुसार स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्तवंश के उत्तराधिकार का क्रम निम्न रहा है
(1) पुरुदत्त (467 से 473 ई)
(2) कुमारगुप्त द्वितीय (473-476 ई.) 
(3) बुद्धगुप्त (477 से - 495 ई) 
(4) वैन्य गुप्त अथवा तथागत गुप्त (494-95 ई. से 507 ई) 
(5) भानुगुप्त (507 ई. में सिंहासनारूढ़) 
(6) नरसिंह गुप्त बालादित्य 
(7) कुमारगुप्त तृतीय (530-540 ई) 
(8) विष्णुगुप्त (540 ई. से 550 ई) 

भितरी की राजमुद्रा वाले लेख में उत्तराधिकार का क्रम निम्न प्रकार है।
 (1) कुमारगुप्त प्रथम ।
(2) पुरुदत्त । | 
(3) नरसिंह गुप्त बालादित्य 
(4) कुमारगुप्त द्वितीय।।
किन्तु यह क्रम विश्वसनीय तथ्यों के आधार पर नहीं है। अतः नवीन सूची के अनुसार निर्धारित तिथिक्रम ही विश्वसनीय और मान्य है जिसका विवरण निम्न प्रकार है।

(1) पुरुदत्त (467 ई. से 473 ई.) –

डॉ. राय चौधरी के अनुसार 'स्कन्दगुप्त की मृत्यु के बाद साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। सम्भव है स्कन्दगुप्त का तात्कालिक उत्तराधिकारी उसका भाई पुरुदत्त था जिसने 467 ई. से 473 ई. तक राज्य किया। सिंहासनारोहण के समय यह अवश्य ही वृद्ध पुरुष रहा होगा, अत: छः वर्ष राज्य करने के बाद ही उसका स्वर्गवास हो गया ।' गुप्त नरेशों का कोई भी अभिलेख स्कन्दगुप्त के पश्चात् सौराष्ट्र और पश्चिमी मालवा में उपलब्ध नहीं हुआ। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन प्रदेशों पर पुरुदत्त का अधिकार नहीं रह गया था। पुरुदत्त की स्वर्ण व रजत मुद्राएँ भी बहुत कम संख्या में मिली हैं इससे विदित होता है कि इसके काल में ही गुप्त सत्ता पतन की और अग्रसर होने लगी थी। पुरुदत्त ने अपने पूर्वजों की तरह अनेक उपाधियाँ धारण की । , आरके, मुकर्जी के अनुसार इसकी कुछ मुद्राओं पर श्री विक्रम की उपाधि अंकित मिलती
ससे यह सम्भावना व्यक्त की जा सकती है कि इसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की | उसकी कुछ मुद्राओं पर प्रक्टादित्य नाम उत्कीर्ण मिलता है । ऐलन महोदय के मतानुसार * दत्त की उपाधि थी । अत: ऐलन का मत है कि पुरुदत्त ने प्रकाशादित्य की भी उपाधि धारण की थी।
अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि पुरुदत्त बौद्ध धर्म का अनुयायी था। लेकिन भीतरी राजमुद्रा लेख में पुरुदत्त की परम भागवत की उपाधि न मिलने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उसका व्यक्तिगत धर्म वैष्णव नहीं रह गया था। वरन् बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था । परमार्थकृत वसुबन्धु जीवन द्वारा प्रतीत होता है कि वह बौद्ध मतावलम्बी था। ऐसी भी सम्भावना की जाती है कि इसने अपने कुमार बालादित्य को सुशिक्षित बनाने के लिए वसुबन्धु को आचार्य नियुक्त किया था। । डॉ. राय चौधरी का मानना है कि पुरुदत्त के पश्चात् सम्भवतः उसका पुत्र नरसिंह गुप्त बालादित्य राजा बना । उसका समीकरण उस बालादित्य से स्थापित किया गया है जिसके विषय में ह्वेनसांग ने कहा है कि उसने मिहिरकुल को कैद किया। डॉ. राय चौधरी बताते हैं। कि मिहिरकुल का विजेता पुरुदत्त का पुत्र नहीं बल्कि एक व्यक्ति था। | 

(2) कुमार गुप्त द्वितीय (473-476 ई.) -

नरसिंह गुप्त बालादित्य के पश्चात् उसकी रानी मित्रदेवी से उत्पन्न पुत्र कुमार गुप्त द्वितीय को धनुर्धर प्रकार के कुछ सिक्कों में वर्णित विक्रमादित्य माना गया है। आर्यमंजूश्री मूलकल्प में कहा गया है कि बालादित्य और उसके उत्तराधिकारी कुमार ने गौड़ (उत्तरी बंगाल का पश्चिमी भाग सहित पूर्व देश) पूर्वी भारत में राज्य किया। कुमार गुप्त द्वितीय ने धनुर्धर प्रकार के स्वर्ण सिक्के चलाये । महाराज हस्तिन को वह अपना सामन्त मानता था । सारनाथ बुद्धमूर्ति पर अंकित अभिलेख में गुप्त सम्वत् का वर्ष 154 दिया गया है जो 473 ई. के बराबर है। जब कुमार गुप्त पृथ्वी की रक्षा कर रहा था । वह बुद्ध मूर्ति तत्कालीन मूर्तिकला की एक उत्कृष्ट कृति है। इस मूर्ति की रचना अभय मित्र ने करवाई ताकि उसके माता- पिता, गुरु और पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हो । कुमार गुप्त द्वितीय का राज्य 476-477 ई. के लगभग समाप्त हुआ। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुरुदत्त बालादित्य और कुमार गुप्त द्वितीय तीनों ने केवल 10 वर्ष राज्य किया। किन्तु डॉ. राय चौधरी कहते हैं कि यह कोई असाधारण बात नहीं थी। उन्होंने अन्य वंशों तथा राज्यों के उदाहरण देकर सिद्ध करने की चेष्टा की है कि कई बार एक के बाद दूसरे राजा की मृत्यु होती गई । । 

(3) बुद्धगुप्त (477-495 ई.) 

बुद्धगुप्त ने 477 ई. से 495 ई. तक लगभग 20 वर्ष राज्य किया। कई अभिलेखों में बुद्धगुप्त का उल्लेख किया गया है। उनमें से एक अभिलेख में बुद्धगुप्त को ‘परम देवता, परम भट्टारक, महाराजाधिराज श्री पृथ्वीपति कहा गया है। बुद्धगुप्त एक योग्य तथा शक्तिशाली शासक था। उसका साम्राज्य उत्तरी बंगाल से पर्वी मालवा तक फैला हुआ था। इसके अन्तर्गत यमुना और नर्मदा नदी के बीच का प्रदेश समिलित था। 484 ई. के एरण के अभिलेख से ज्ञात होता है कि महाराज सुरश्मिचन्द्र बड़गप्त के सामन्त के रूप में कालिन्टी (यमुना) तथा नर्मदा के बीच भूक्षेत्र पर राज्य करता था। उसके मध्य प्रदेश में चांदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं इससे विदित है कि इस सामन्त शासक का आधिपत्य मध्यप्रदेश पर भी था।'  बुद्धगुप्त के लिए किसी भी अभिलेख में परम भागवत की उपाधि का प्रयोग नहीं किया है। इससे जाहिर है कि वह बौद्ध मतावलम्बी था।