प्रश्न 35. डिमेटियस और मेनाण्डर की उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते हैं?

प्रश्न 35. डिमेटियस और मेनाण्डर की उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते हैं?

What do you know about the achievemenis of Dametrius and Manander?
अथवा मेनाण्डर के समय तक भारत पर हिन्द-यूनानी शासन का विवरण दीजिए?
Give an account of the Indo-Greek rule in India upto the time of Manander?
उत्तर - यूथोडेमस राजवंश में डिमेट्रियस के पश्चात् अपोलोडोटस स्ट्रेटो एवं मेनाण्डर आदि प्रमुख शासक हुए। मेनाण्डर के साथ अपोलोडोट्स का भी इतिहासकार अपने कथन में उल्लेख करते रहे हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि भारत विजय के लिए डिमेट्रियस ने मेनाण्डर और अपोलोडोट्स दोनों को ही भेजा था । इन दोनों शासकों के सम्मिलित सिक्के भड़ौच के पास मिले हैं। इस प्रदेश में सिकन्दर के नाम के भी सिक्के व ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं। एक इतिहासकार के कथनानुसार इन ध्वंसावशेषों पर सिकन्द मनाण्डर एक महान् विजेता था । और इस महान् सम्राट का नाम भारतीय जनश्रुतियों यात है। इस महान् सम्राट का जन्म कालसी में हुआ जिसकी राजधानी साकल थी। साकल एक बड़ा व्यापारिक नगर था । जहाँ सुन्दर भवनों का निर्माण हुआ । इतिहासकारों ने प्राप्त तथ्यों के आधार पर इस नगर की ऊँचाई हिमालय की चोटी के समकक्ष बतायी है। इसमें बड़े-बड़े बुर्ज, प्राचीर, एवं प्रवेशद्वार थे। यह बड़ा समृद्ध नगर था । मेनाण्डर का विवाह यूथोडेमस वंश की राजकुमारी से हुआ । अत: यह इसी वंश से सम्बन्धित माना जाता है । इण्डो ग्रीक राजाओं में यह सबसे महान् माना जाता था। इसका भारतीय नाम 'मिलिन्द था । इसका मिलिन्द पन्ह ग्रंथ में विस्तृत उल्लेख है । इस ग्रंथ में मिलिन्द तथा बौद्ध विद्वान् नागसेन के मध्य प्रश्नोत्तरों का वर्णन है। और शंका समाधान के पश्चात् मिलिंद ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।

मेनाण्डर के समय तक भारत पर हिन्द-यूनानी शासन

बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद मिलिंद्ध बौद्ध धर्म का प्रतिपादक बन गया। उसने बहुत से स्तूप तथा विहारों का निर्माण कराया । पुष्यमित्र शुंग से भयभीत होकर अनेकों बौद्ध भिक्षु उसकी शरण में पहुँच गये थे। वह बौद्ध धर्म संरक्षक और अपने जीवन को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए समर्पित करने वाला शासक माना जाता है। एक अभिलेख में उल्लेखानुसारमेनाण्डर के शासन काल के पाँचवें वर्ष में महात्मा बुद्ध के अवशेषों का संरक्षण हुआ । एक अन्य अवशेष में विजय मित्र का नाम जिसे एजेज द्वितीय का सामन्त बताया गया है। इस तरह से मेनाण्डर का शासनकाल ई.पू. प्रथम शदी प्रमाणित होता है।
। मेनाण्डर की मृत्यु के सम्बंध में इतिहासकारों में वैचारिक समानता का अभाव रहा है। इतिहासकार टार्न के अनुसार इसकी मृत्यु 150 ई. पू. के लगभग हुई। डॉ. सरकार के अनुसार मेनाण्डर का शासन काल 115 ई. पू. व 90 ई. पू. के मध्य था। ‘मिलिन्द पन्ह' के अनुसार मेनाण्डर बुद्ध के परिनिर्वाण के 500 वर्ष बाद तक जीवित रहा। प्लूटार्क के मतानुसार मैनाण्डर की मृत्यु पर उसके नगरों में उसके अस्थि अवशेषों के बँटवारे के लिए विवाद हुआ। अन्त में इन अस्थियों को राज्य के सब स्थानों में विभाजित करने का निर्णय हुआ।

मेनाण्डर की राज्य सीमा - उपलब्धियाँ

मेनाण्डर ने एक विस्तृत राज्य की स्थापना की थी। जो निम्न प्रकार उल्लेखित है। | (1) पूर्व में मेनाण्डर की राज्य सीमा मथुरा तक मानी जाती है। यद्यपि पाटलिपुत्र पर भी
उसके अधिकार का उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध इतिहासकार टार्न का कथन है कि जब डिमेट्रियस अपने राज्य को बचाने के लिए बैक्ट्रिया गया तो मेनाण्डर पाटलिपुत्र से मथुरा आ गया। लेकिन अनेक इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं
(2) पश्चिम में मेनाण्डर का राज्य काबुल घाटी तक फैला हुआ था। बाजौर अभिलेख में इस साम्राज्य का संकेत मिलता है। सिन्ध व बिलोचिस्तान में भी उसके सिक्के प्राप्त हुए हैं। अतः यह सम्भावना व्यक्त की जाती है कि सिन्धु व बिलोचिस्तान भी उसके राज्य में शामिल थे।
 (3) एक अनुमान के अनुसार राजस्थान भी उसके शासक के अन्तर्गत था। क्योंकि पातंजलि ने माध्यमिका (चित्तौड़) पर यवन आक्रमण का वर्णन किया है।
(4) पेरीप्लस के दक्षिण में भड़ौच के क्षेत्र में मेनाण्डर के नाम की मुद्राएँ प्राप्त हुई थी।
डॉ. डी. सी. सरकार ने मेनाण्डर के साम्राज्य विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा है । कि मेनाण्डर का राज्य अफगानिस्तान के मध्य भाग पंजाब, सिन्ध, राजपूताना, काठियावाड़ तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश तक फैला हुआ था।
प्रसिद्ध इतिहासकार रेप्सन के कथनानुसार “मेनाण्डर एक महान् शासक था । तथा उसकी ख्याति केवल भारत में ही नहीं थी । वरन् भारत से बाहर भी थी । वह अपनी न्यायप्रियता के लिए विख्यात था । उसकी सभा में 500 सदस्य थे। उसकी कुछ मुद्राओं पर “धार्मिकस्य' की उपाधि अंकित है।”
डॉ. नारायण के लेखानुसार “मेनाण्डर का नाम केवल उसकी मुद्राओं के आधार पर ही नहीं है। बल्कि भारतीय जनश्रुति में अपने नाम की लोकप्रियता में वह अन्य यूनानी सम्राटों से भारी बैठता है।”
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