योद्धा एवं प्रशासक के रूप में स्कन्दगुप्त की गुप्त साम्राज्य के प्रति सेवाओं का मूल्यांकन कीजिए।

योद्धा एवं प्रशासक के रूप में स्कन्दगुप्त की गुप्त साम्राज्य के प्रति सेवाओं का मूल्यांकन कीजिए।

(2) प्रान्तीय शासन-

स्कन्दगुप्त ने अपने शासन की सुविधा के लिए अपने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभक्त कर रखा था। प्रान्त का प्रधान अधिकारी गोप्ता कहलाता था। सम्राट इन प्रान्तपतियों पर अपना कड़ा नियंत्रण और अनुशासन रखता था लेकिन राजधानी से दूरस्थ होने के कारण इन्हें विभिन्न आपातकालीन निर्णय लेने में स्वतंत्रता होती थी। जूनागढ़ शिलालेख के अनुसार सौराष्ट्र प्रान्त का राज्यपाल पर्णदत्त,गंगा और यमुना के बीच का दोआब का विषयपति सर्वनाग, समक्षेत्र का शासनकर्ता भीमवर्मा तथा गुजरात के गिरनगर का सवाच्च पदाधिकारी चक्रपालित था। डॉ.मजूमदार के मतानुसार प्रभाकर नामक व्यक्ति पश्चिमी मालवा में स्कन्दगुप्त का गवर्नर था।
| इस तरह स्कन्दगुप्त की शासन व्यवस्था उदारता और लोकहित के सिद्धान्तों पर आधारित थी । वह अपनी प्रजा के कल्याण एवं समृद्धता के लिए प्रयासरत रहता था। भितरी के लेखानुसार स्कन्दगुप्त दीन व्यक्तियों पर दया करता था। प्रजा उसके गुणों की प्रशंसा करती थी। उसके सार्वजनिक कार्य का सबसे सुन्दर उदाहरण गिरिनगर की सुदर्शन झील के बांध का जाणद्धिार था। इस तरह इसने इस झील के बाँध की मरम्मत करा के प्रजा वत्सलता का परिचय दिया। गिरिनार अभिलेख से विदित होता है कि उसके शासनकाल में उसकी प्रजा आर्थिक दृष्टि से काफी सम्पन्न थी।

सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण 

स्कन्दगुप्त बड़ा ही लोकोपकारी था । गिरिनार पर्वत स्थित सुदर्शन झील का बाँध जिसका निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के सौराष्ट्र गवर्नर पुष्यगुप्त ने किया था तथा अशोककालीन गवर्नर तुषास्यु ने इससे एक नहर निकलवायी थी। शक राजा रूद्रदामन प्रथम ने अपनी जेब से इसकी मरम्मत करायी थी यह बांध 455 ई. में पुनः टूट गया इसका कारण भीषण वर्षा थी । इस बाँध के टूटने से जनता को भीषण कष्ट होने लगा। अतः स्कन्दगुप्त के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने इसकी मरम्मत कराई । यह बाँध 100 हाथ लम्बा और 68 हाथ चौड़ा था इसकी ऊंचाई 7 आदमियों के बराबर थी। बाद में इस बाँध के किनारे विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया। । धार्मिक नीति स्कन्दगुप्त परम भागवत आर्या वैष्णव मतावलम्बी था। भित्तरी के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने अपने पिता की स्मृति में भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करवाई थी। जूनागढ़ अभिलेख से विदित होता है कि उसके अधीन सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चन्द्रपालित ने (भगवान गोविन्द के उपासक के रूप में) गिरिनार की सुदर्शन झील के तट पर विष्णु भगवान का एक मन्दिर बनवाया था। जैसाकि स्पष्ट है कि स्कन्दगुप्त वैष्णव धर्मावलम्बी था किन्तु उसने अपने कर्मचारियों या प्रजाजनों के धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया।

गिरिनार की सुदर्शन झील के तट पर विष्णु भगवान का एक मन्दिर

 वह अन्य सभी धर्मों का सम्मान करता था। वह उच्च कोटि का धार्मिक सहिष्ण था। इसी धार्मिक सहिष्णुता से उसके शासनकाल में सभी धर्मों के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी उन्हें किसी भी धर्म को अपनाने, अपने उपास्य देव की पूजा करने, धार्मिक अनुष्ठान करने, अपने आराध्य देवी देवताओं की मूर्तियों एवं मन्दिरों या पूजा गृहों का निर्माण करने की स्वतंत्रता थी। सभी धर्मों के लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना एवं एक दूसरे के सुख दुख में सहानुभूति बनी रहती थी। शासन की तरफ से किसी पर कोई प्रतिबंध नहीं था। राजकीय पदों पर सभी धर्मों के लोगों को योग्यता के आधार पर अवसर दिया जाता था। उसकी धार्मिक सहिष्णुता और पारस्परिक सहानुभूति के कुछ उदहारण हमें अभिलेख से मिलते हैं। बिहार स्तम्भ लेख के अनुसार मन्दिरों के एक चक्र का निर्माण किया गया। जिसमें स्कन्द देवता और ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, महेन्द्री, वाराही, चामुंडा, चंडी और चार्चिका नामक देवी माताओं की उपासना होती थी। कहौम के स्तम्भ लेख में उल्लेख है कि ब्राह्मणों के प्रति आसक्त एक व्यक्ति ने जैन मूर्तियाँ बनवायी थी ये मूर्तियाँ आदिनाथ, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पाश्र्वनाथ तथा महावीर की थी। इन्दौर ताम्रलेख से जानकारी मिलती है कि इसके शासनकाल में क्षत्रियों ने एक सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया था और इस मन्दिर के रखरखाव एवं नित्य तेल दीप जलाने के उद्देश्य से एक ब्राह्मण ने इस सूर्य मन्दिर में काफी रुपया दान में दिया था।
इस प्रकार स्कन्दगुप्त ने अपने पूर्वजों की धार्मिक नीति का अनुसरण करते हुए अपनी धार्मिक नीति को अधिक उदार एवं सहिष्णु बनाया।

स्कन्दगुप्त की आर्थिक नीति-

स्कन्दगुप्त के शासन काल का अधिकांश दौर शान्ति और व्यवस्था की दृष्टि से सराहनीय रहा। उसके शासनकाल में प्रजाजन समृद्ध और सम्पन्न थे। आर्थिक उन्नति एवं धन सम्पत्ति की सुविधाएं तथा इनके अनुकूल वातावरण बना हुआ था । सभी अपने आप में खुश थे अपने परिश्रय से धन सम्पत्ति की वृद्धि में तल्लीन थे । स्कन्दगुप्त बड़ा ही उदार एवं दानशील प्रकृति वाला सम्राट था उसकी इस प्रवृत्ति का प्रभाव प्रजाजनों पर पड़े बिना न रहा । इन्दौर के लेख से विदित है कि वहाँ इन्द्रपुर में तेलियों की समिति थी । चन्द्रापुर के पद्मा भाग में रहने वाले चतुर्वेदी ब्राह्मण देव विष्णु ने इस समिति के पास कुछ द्रव्यस्थायी रूप से दान स्वरूप जमा किया था। इसके सूद से वहाँ के सूर्य मन्दिर में प्रतिदिन दीप जलाया जाता था। बिहार के स्तम्भ लेख के अनुसार भी किसी व्यक्ति ने अजपुरक नामक नगर की एक श्रेणी के पास स्थायी रूप से मुद्रा जमा की थी। धनी तथा दानशील लोग दान दक्षिणा की धनराशि इन श्रेणियों के कोष में रख देते थे जिसके ब्याज से मन्दिरों- मरों आदि की सहायता होती थी।

स्कन्दगुप्त की मुद्राएं 

स्कन्दगुप्त ने अपने शासनकाल के अधिकांश वर्ष अपने साम्राज्य की मर्यादा और उसकी प्रतिष्ठा को बचाने में लगाये । पुष्यमित्रों, हुणों और वाकाटकों से संघर्ष एवं साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा पर असुरक्षा आदि से उसका बहुत-सा अमूल्य समय इन्हीं उलझनों में व्यतीत हुआ । इस कारण उसको स्वर्ण मुद्राएं तैयार करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया फिर भी मुद्रा निर्माण के क्षेत्र में उसने अपनी मुद्राओं की तौल बढ़ाकर 80 रत्ती या 144 ग्रेन कर दिया। कनिंघम का कथन है कि स्कन्दगुप्त की मुद्राओं में हीन धातु का मिश्रण अधिक था। डॉ. अल्टेकर के मतानुसार सम्भवतः हूण युद्ध के पश्चात् उसे मुद्राओं में हीन धातु का मिश्रण करना पड़ा। स्कन्दगुप्त ने चार प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं प्रचलित की।
 (1) धनुर्धर शैली
(2) राजा और लक्ष्मी शैली 
(3) छत्र मौली ।
(4) अश्वारोही शैली ।
स्कन्दगुप्त के राज्य में गुजरात, वल्लभी एवं पश्चिमी मालवा भी सम्मिलित थे अतः उसे पश्चिम देशीय रजत मुद्राओं को प्रचलित करने की आवश्यकता महसूस हुई। डॉ. अल्टेकर ने इन रजत सिक्कों को तीन वर्षों में विभक्त किया है।
 (1) गरुड़ प्रकार
(2) नन्दी प्रकार 
(3) वेदी प्रकार ।
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