गुप्तकाल हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का काल था। प्रमाणित कीजिए।

गुप्तकाल हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का काल था। प्रमाणित कीजिए।

गुप्त कालीन आर्थिक जीवन - गुप्त साम्राज्य के विस्तृत क्षेत्र पर प्रभाव एवं आधिपत्य तथा कुशल प्रशासनिक व्यवस्था के कारण देश में शान्ति रही। इससे आर्थिक जीवन समृद्ध एवं विभिन्न साधनों की उत्पत्ति में वृद्धि हो सकी । तत्कालीन आर्थिक स्थिति से सम्बन्धित पहलुओं का अध्ययन निम्न शीर्षक में किया जा सकता है :

गुप्तकाल में कृषि - 

गुप्तकाल में (सैद्धान्तिक रूप से) राजा सम्पूर्ण भूमि का स्वामी होता था लेकिन व्यवहार में भूमि तीन प्रकार की थी। परती जो राज्य के अधिकार में होती थी जो सामान्यतया वेतन के रूप में दी जाती थी, राज्य द्वारा अधिकृत कृषि भूमि, जिसे दान में दिया जा सकता था, लेकिन शायद बहुत कम किया गया, क्योंकि वह पहले से ही जोत की भूमि थी और उससे राज्य को आय होती थी : और तीसरे प्रकार की भूमि निजी स्वामित्व में थी। प्रत्येक भूमि के क्रय-विक्रय के लिए शासकीय आज्ञा की आवश्यकता होती थी।
नन्दपुर ताम्रपत्र (488 ई) से ज्ञात होता है कि परती भूमि भी क्रय की जाती थी। इस अभिलेख में एक अधिकारी स्थानीय शासन के सदस्यों के संघ के सामने निम्न प्रस्ताव रखता है “अब तुम्हारे विषय में परती भूमि के विक्रय प्रणाली की स्थापना (एक कुलीयवाय दो दीनारों की दर पर ) की जाती है। राज्य कृषि की ओर विशेष ध्यान देता था। कृषि की प्रगति के लिए सिंचाई इत्यादि का प्रबन्ध करना शासन का प्रमुख कर्तव्य था । सिंचाई के लिए घटी यन्त्र (रहट) का उपयोग गाँवों में खूब होता था। मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील की जिसका शक शासन रूद्रदमन द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया था, पुन: गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त द्वारा मरम्मत करायी गयी और उसे काम में लाया गया। स्कन्दगुप्त के शासन काल में सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। इस विस्तृत विवरण से न केवल राज्य की कृषि के लिए समुचित व्यवस्था करने का आभास होता है वरन् उस काल में अतिरिक्त जल को एकत्रित कर उसे फसल के लिए प्रयोग में लाने की वैज्ञानिक प्रणाली की जानकारी से अवगत गुप्तकालीन समाज का संकेत मिलता है । फाह्यान के विवरण से इस बात का ज्ञान मिलता है कि राज्य की भूमि जोतने वाले अपनी उपज का एक अंश राजा को कर के रूप में देते थे।
सम्भवतः किसानों को कर नकद (हिरण्य) के साथ-साथ अनाज (भेंट) के रूप में देने की छूट थी। गुप्त युग से ही सामन्तवादी प्रवृत्ति क्रमशः जोर पकड़ रही थी। गुप्त लेखों में जिन भूमिदानों का उल्लेख किया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि भूमिदान के साथ-साथ गाँव की भूमि से उत्पन्न होने वाले आय भी ग्रहीता को सौंप दी जाती थी । इससे समाज में बेगार प्रथा तथा आर्थिक शोषण को बढ़ावा मिला। इस संदर्भ में इतिहासकार रामशरण शर्मा का यह कथन उल्लेखनीय जान पड़ता है जिसमें वे कहते हैं -“गुप्तकाल की महत्त्वपूर्ण घटना थी।

गुप्तकाल में कर व्यवस्था

स्थानीय किसानों के मध्य राजकीय जमीदारों का उदय । पुरोहितों को दिये जाने का जाने वाले भूमि अनुदानों के फलस्वरूप अनेक परती क्षेत्रों में खेती आरम्भ हो गई । परन्तु इस ला को स्थानीय कबीलाई किसानों पर ऊपर से लादा गया। स्थानीय कबीलाई किसान अवस्था में पहुंच गए। मध्य और पश्चिमी भारत में किसानों को बेगार करने को मज गया।” सामन्ती प्रथा के कारण धीरे- धीरे राजा या उसके द्वारा नियुक्त अधिकारियों किसानों का प्रत्यक्ष सम्पर्क समाप्त हुआ तथा राजकोष को आर्थिक हानि हुई । तत्कालीन वो से गुप्त युगीन प्राकृतिक सम्पदा एवं उत्पन्न की जाने वाली फसलों के विषय में हमें बहन कम जानकारी प्राप्त होती है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि उस समय धान, गेहूं, पटसन तिलहन, कपास, नील, ज्वार, बाजरा, विभिन्न औषधियाँ, मसाले, पान आदि की खेती होती थी खेती का ढंग परम्परावादी अर्थात बैलों की जोड़ी तथा लकड़ी के हल (लोहे की फाल लिए हुए) से की जाती थी। बाराहमिहिर की वृहत संहिता में तीन फसलों का जिक्र आया है। एक फसल श्रावण के महीने में तैयार होती थी, दूसरी बसन्त में और तीसरी चैत्र या बैसाख में।

गुप्तकाल में अन्य व्यवसाय व उद्योग धन्धे - 

कृषि के अतिरिक्त गुप्तकालीन भारत में गाँवों तथा शहरों में अनेक अन्य उद्योग धन्धों को भी यथेष्ट प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। गुप्तकालीन अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उस युग में पोत-निर्माण से लेकर मिट्टी के बर्तन बनाने तक और बिहार निर्माण से लेकर छोटे-छोटे गृह निर्माण तक के सभी कार्य निपुण शिल्पकारों के द्वारा किये जाते थे। विविध प्रकार के वस्त्र तैयार करने वाला उद्योग इस समय के अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण उद्योगों में गिना जाता था। देश तथा विदेश में उसकी विस्तृत माँग थी। रेशमी वस्त्रों, मलमल, कैलिको, लिनन, ऊनी तथा सूती वस्त्रों का बहुत बड़े परिमाण में उत्पादन होता था। रेशम की बुनाई का एक केन्द्र पश्चिम भारत भी था। हो सकता है कि परवर्ती गुप्तकाल में रेशम का उत्पादन घट गया हो क्योंकि पश्चिमी भारत में रेशम के बुनकरों की एक महत्त्वपूर्ण श्रेणी के अनेक सदस्यों ने अपना पारम्परिक व्यवसाय छोड़कर दूसरे व्यवसाय को अपना लिया था। हाथी दांत का व्यवसाय अधिक लाभकर था और इसी प्रकार पत्थर की कटाई तथा खुदाई का व्यवसाय भी क्योंकि इस समय मूर्तियों की माँग बहुत अधिक थी । लौह तथा इस्पात उद्योग बहुत प्रगति पर था।
महरौली (दिल्ली) स्थित गुप्तकालीन लौह स्तम्भ इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है कि गुप्तकाल में भारत के लोग अत्यधिक बढ़िया किस्म के लौह तथा धातुओं की वस्त निर्मित करने में कुशल थे । तरह-तरह के खनिज पदार्थ जैसे सोना,चॉदी, तांबा आदि का भी लोगों को ज्ञान हो चुका था। ताँबा ताम्रपत्र, बर्तन और सिक्के के काम आता था। बाराहमिहिर की वृहतसहिंता” में हीरा, मोती, रूबी तथा शंख इत्यादि की बनी वस्तुओं का कई बार उल्लेख आया है। पशुपालन भी जीविका का एक प्रमुख साधन एवं व्यवसाय था। गुप्तकाल में नालन्टा, वैशाली आदि स्थानों में श्रेष्ठियों, सार्थवाहों, प्रथम कुलिकों कलिकों इत्यादि की मह शिल्पियों की संघटनात्मक गतिविधियों को अन्य सामाजिक हित के कार्य भी करने पड़ते थे जैसे सभागृहों का निर्माण, यात्रियों के लिए पानी की सुविधा जुटाना तथा आश्रमगृहों, मन्दिरों, बार्गों का निर्माण करना आदि ।

गुप्तकाल में व्यापार - 

गुप्तकाल में व्यापार के क्षेत्र में भी कुछ उल्लेखनीय तथ्य सामने आए। उदाहरण के लिए विरुपात इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार इस काल में हम विदेश व्यापार में हास पाते हैं।
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