Ads Here

Sunday, December 16, 2018

गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए। 

Describe the Administration system of Gupta Empire.
गुप्त शासन व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
Give an out line of the Gupta Administration.

गुप्त साम्राज्य की आय के साधन - 

राज्य की आमदनी का मुख्य स्रोत भूमि कर या लगान था जो भूमि की किस्म को देखकर 16 प्रतिशत से लेकर 25 प्रतिशत तक लिया जाता था। भूमि कर के अतिरिक्त राज्य की आय के अन्य स्रोत या साधन निम्नलिखित थे।
(1) चुंगी टैक्स
 (2) आयात-निर्यात कर
(3) व्यापारियों से और शिल्पियों से वसूला गया टैक्स
(4) वनों, चरागाहों तथा खानों से होने वाली आय
(5) धातुकर- सोने चाँदी के निर्यात- आयात का कर
(6) धान्य (अनाज के रूप में)।
(7) अपराधियों से लिया गया अर्थदण्ड
(8) चाट भाट प्रवेश कर (पुलिस और सेना कर)
(9) उपहार भेट आदि से आय।।
गुप्त काल में उपरोक्त प्राप्त आय को सैनिक अभियानों, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, राजाप्रसाद की सज्जा सामग्री और संस्थाओं और विद्वान व्यक्तियों को आर्थिक मदद प्रदान करने में व्यय किया जाता था। कभी- कभी वेतन की जगह कर्मचारियों को जागीरें भी दे दी जाती थी लेकिन गुप्त काल में जागीर देने की प्रथा बहुत नगण्य थी।

गुप्त साम्राज्य में सार्वजनिक हित -

गुप्त सम्राटों में अपनी प्रजा के कल्याण की भावना निहित थी। यह अपनी प्रजा की सुख समृद्धि हेतु भरसक प्रयत्न में जुटे रहते थे। वे अपनी प्रजा को वत्स तुल्य मानते थे और उनकी नैतिक तथा भौतिक उन्नति के लिए प्रयासरत रहते थे । गुप्त सम्राट ने अपनी प्रजा के हितार्थ सड़क का निर्माण करवाया, सिंचाई की व्यवस्था की तथा कृषि की उन्नति हेतु अथवा सिंचाई की व्यवस्था में अनेक बाँधों- झीलों और जलाशयों का निर्माण करवाया, प्रजा के स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु चिकित्सालयों की स्थापना की। अनेक धर्मशालाओं एवं कुओं का निर्माण कराया। गुप्त सम्राट कला साहित्य के प्रेमी थे। अतः उन्होंने अपने राज्य काल में कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन दिया एवं साहित्यकारों एवं कलाकारों को आश्रय दिया । वह अपनी प्रजा के दुख दर्द में शामिल थे अतः उनकी स्थिति को देखते हुए उदारतापूर्वक आर्थिक मदद प्रदान करते थे।

गुप्तों की शासन प्रणाली की समीक्षा : 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि गुप्त वंशीय शासन प्रणाली सुव्यवस्थित और सुसंगठित थी । इतिहासकारों और विद्वानों ने इस व्यवस्था की प्रशंसा की है। डॉ. बी. ए. स्मिथ (Early History of India) में लिखते हैं कि *प्राचीन हिन्दू इतिहास में अन्य सभी युगों की तुलना में महान, गुप्त सम्राटों का युग सर्वाधिक मानवीय और सन्तोषजनक युग है। इनसे अच्छा शासन कभी भारत में हुआ ही नहीं।” डॉ सेल्टर का अभिमत है कि “गुप्त शासन प्रणाली पूर्णत: मौलिक नहीं कही जा सकती किन्तु इसे प्रभावकारी और हितकर अवश्य माना जा सकता है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए इसे विकसित कर लिया गया था। यह एक असभ्य, निरंकुश शासन व्यवस्था नहीं थी, जहाँ राजा ही पूर्णाधिकार प्राप्त शासक था। मंत्रिपरिषद तथा राज्य के उच्चाधिकारियों के रूप में इसमें कई संवैधानिक प्रतिबन्ध थे इस प्रकार की कार्यकुशलता ने राजस्व के स्रोतों को नियमित रूप दिया। इसके आर्थिक साधनों की ऐसी उत्तम व्यवस्था थी कि इसके शासकों को मगध से समुद्रतट की सीमा तक और पश्चिम में सौराष्ट्र की सीमा तक तथा हिमालय के प्रारम्भ से मध्य भारत की दूरवर्ती सीमाओं तक फैले हुए विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखने की क्षमता प्रदान की।

केन्द्र तथा प्रान्तों में प्रशासन व्यवस्था

डॉ. अल्टेकर ने लिखा है कि “केन्द्र तथा प्रान्तों में प्रशासन सुव्यवस्थित था । केन्द्रीय सचिवालय कार्य कुशल था और वह जिलों तथा गाँवों में होने वाली घटनाओं की सूचना प्राप्त करता था। गुप्त प्रशासन ने काफी लम्बे अर्से तक प्रजा को विदेशी आक्रमणों तथा आन्तरिक विद्रोह से सुरक्षित रखा । दण्ड विधान, प्रशासन, न्याय तथा मानवीयता का सुन्दर समन्वय था। सरकार प्रजा के सांसारिक तथा आध्यात्मिक हितों की रक्षा करती थी। प्रशासन के विकेन्द्रित होने के कारण जनता का भी शासन में हाथ था और स्थानीय संस्थाओं को बहुत से अधिकार प्राप्त थे ।”
डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार के कथनानुसार “गुप्त सम्राटों की यह अक्ष कीर्ति थी कि इन्होंने अपनी प्रजा को गुप्त कालीन शान्ति से लाभान्वित किया और पुलिस के उस कठोर नियंत्रण और फौजदारी द विधान के उन कठोर नियमों का प्रयोग नहीं किया जिनसे मौर्य शासन कलंकित हो गया था।
राजबली पाण्य के अनुसार "गुप्त सम्राट ने आदर्श शासन की व्यवस्था हेत एक ऐसी निश्चित योजना अपनाई जिसमें कि प्रजा सुखी और समृद्ध थी। गुप्तों की इस शासन प्रणाली से चीनी यात्री फाह्यान बहुत प्रभावित हुआ था। चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपनी यात्रा के अनुभवों में गुप्त शासन व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि “गुप्त शासन में प्रजा की भलाई की ओर रखासतौर से ध्यान दिया जाता था। शासन व्यवस्था अति उदार थी और सम्राट प्रजा के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता था। राजा कठोर नियमों का पालन नहीं करता था। अपराधों की संख्या नगण्य थी । दण्ड के नियम कठोर नहीं थे सम्पूर्ण साम्राज्य में शान्ति और खुशहाली थी । लोग न्यायालयों के बन्धनों से मुक्त थे और अपने विवादों का समाधान आपस के निर्णयों से ही कर लेते थे । जो लोग राजकीय भूमि में कृषि करते थे, उन्हें उपज का कुछ भाग ही राजा को भूमि लगान के रूप में देना पड़ता था । लोग व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र थे तथा शासन का उनके व्यक्तिगत मामलों में बहुत ही कम हस्तक्षेप होता था।”

गुप्त सम्राटों की धार्मिक सहिष्णुता की नीति

डॉ. ओमप्रकाश ने गुप्त सम्राटों की शासन व्यवस्था की समीक्षा में लिखा है कि गुप्त प्रशासन केन्द्र और प्रान्त दोनों में सुव्यवस्थित था । इन सम्राटों ने अपने साम्राज्य में शान्ति और सुव्यवस्था तो रखी ही साथ ही उन्होंने राज्य के साधनों को पूर्ण उपयोग कर आम प्रजाजनों की आर्थिक दशा को सुधारने का भरसक प्रयास किया। निर्धन और रोगग्रस्त लोगों को राज्य की तरफ से निःशुल्क भोजन वस्त्र और औषधियाँ प्रदान की जाती थी। राज्य प्रजा के लौकिक या भौतिक सुख का ही ध्यान नहीं रखता था । अपितु उसने उनके नैतिक उत्थान के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त कर रखे थे। जो विनय स्थिति स्थापक कहलाते थे । राज्य में स्थानीय विभिन्नताओं का आदर किया जाता था। गुप्त सम्राट धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करते थे राज्य की ओर से समस्त धर्मों को जिनमें कि हिन्दू, बौद्ध एवं जैनों की धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी जाती थी। जिले और गाँव की सभाओं को शासन सम्बन्धी बहुत अधिकार प्राप्त थे । ये संस्थायें स्थानीय साधनों के विकास और शान्ति तथा सुव्यवस्था सम्बंधी कार्यों को पूरा करती थी । गुप्त सम्राटों ने उत्तर भारत को एक सूत्र में बाँधकर राजनीतिक एकता कायम की। गुप्त सम्राटों की इस सुव्यवस्था से आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में वृद्धि हुई । प्रजाजनों को अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों को विकसित करने का एक सुनहरी अवसर मिला।