गुप्त प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

गुप्त प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

गुप्त साम्राज्य में गुप्त सम्राटों ने शासन की व्यवस्था को अत्यन्त सुदृढ़ बनाया। गुप्त शासकों की शासन व्यवस्था बहुत ही उच्च स्तर की थी। एक विशाल साम्राज्य, उत्तरी भारत की राजनीतिक एकता, महान् सम्राटों की उपस्थिति, कुशल शासन, हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान और विकास, संस्कृत भाषा की प्रगति और श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण, विभिन्न ललित कलाओं और विज्ञान की उन्नति, कृषि उद्योग और व्यापार की प्रगति के फलस्वरूप आर्थिक समृद्धि, भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रसार आदि सभी कुछ ऐसा है कि गुप्तकाल को प्राचीन भारतीय इतिहास का श्रेष्ठतम काल स्वीकार किया जाता है। डॉ.अल्टेकर का कथन है। कि “केन्द्र तथा प्रान्तों में गुप्त प्रशासन सुव्यवस्थित था सचिवालय कार्य कुशल था और वह जिलों तथा गाँवों में होने वाली घटनाओं की सूचना प्राप्त कर सकता था । गुप्त प्रशासन ने काफी लम्बे समय तक प्रजा को विदेशी आक्रमणों तथा आन्तरिक उपद्रवों से सुरक्षित रखा। दण्ड विधान, प्रशासन, न्याय तथा मानवीयता का सुन्दर समन्वय था। सरकार प्रजा के सांसारिक तथा आध्यात्मिक हितों की रक्षा करती थी । प्रशासन के विकेन्द्रित होने के कारण जनता का भी शासन में महत्त्वपूर्ण योगदान था और स्थानीय संस्थाओं को बहुत से अधिकार प्राप्त थे। हम गुप्त शासन व्यवस्था पर उचित ही गर्व कर सकते हैं जिसने तत्कालीन और बाद के राज्यों के लिए एक आदर्श शासन व्यवस्था के रूप में कार्य किया।”
गुप्तों के शासन काल में प्रथम बार भारतीय शासन प्रणाली का विकसित रूप देखने । को मिलता है । गुप्त सम्राटों ने अपने पूर्ववर्ती राजाओं की शासन प्रणाली को आधार बनाकर इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये और उसे अधिक व्यावहारिक और गतिशील बनाया। गप्त प्रशासन की अग्रलिखित विशेषतायें थीं ।

गुप्तों की शासन-व्यवस्था - (A) केन्द्रीय प्रशासन

(1) सम्राट - गुप्त काल में मौर्य शासन काल की तरह ही केन्द्रीय शासन का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं सम्राट था। गुप्त सम्राटों को भारतीय जनता (राज्य के दैवी उत्पत्ति सिद्धान्त के आधार पर) ईश्वर का प्रतिनिधि मानने लगी थी। सम्राट का स्थान देवतुल्य होता था। 1578 से सम्बन्धित अनेक प्रशस्तिकारों ने गुप्त सम्राटों की महानता प्रदर्शित करने के लिए उनकी तुलना यम कुबेर आदि देवताओं के साथ की है। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी का देव कहा गया है उसकी तुलना वरुण, यम, कुबेर एवं इन्द्र आदि से की गई है। इससे स्पष्ट होता है कि सम्राट का पद बड़ा गौरवशाली हो गया था तथा सम्राट बड़े ही आदर सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। गुप्त सम्राटों ने अश्वमेघ यज्ञ के द्वारा अन्य राज्यों पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित की, अपनी शक्ति, समृद्धि और गौरव को प्रदर्शित करते हुए सम्राट परमदेवता, परमभट्टारक एकाधिराज, महाराजाधिराज, पृथ्वीपाल, परमेश्वर सम्राट, चक्रवर्तिनी आदि अनेक उपाधियाँ धारण करते थे। महाकवि कालिदास ने भी गुप्त सम्राटों को राजन, नरपति, देव भट्टारक, असह विक्रम, अप्रतिरथ और सम्राट आदि शब्दों को सम्बोधित किया
निः सन्देह गुप्त काल में राजपद वंशानुगत था परन्तु राजकीय सत्ता ज्येष्ठाधिकार की पक्की प्रथा के अभाव के कारण यह प्रथा सीमित थी। सिंहासन सदैव ज्येष्ठ पुत्र को नहीं मिलता था। कभी कभी राजसिंहासन की प्राप्ति हेतु राजकुमारों में वैमनस्य भी हो जाता था। उदाहरण के लिए समुद्रगुप्त एवं उसके किसी भाई कोच में गद्दी के लिए सम्भवतः संघर्ष हुआ ।

गुप्त प्रशासन में राजा की शक्तियाँ

 चन्द्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को अपने जीवन काल में भरे दरबार में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। इसी तरह रामगुप्त को पदच्युत कर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सत्ता हथियायी थी और सम्भवतः सरदारों एवं उच्च अधिकारियों ने उसका विरोध न करके स्वागत किया। निसन्देह उत्तराधिकार के निश्चित नियमों के अभाव में राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हो जाती थी, जिसका लाभ सरदार और उच्च अधिकारी उठा सकते थे। | गुप्त राजा देश का सर्वोच्च शासक होता था और उसी के नियंत्रण एवं अनुशासन में साम्राज्य का सम्पूर्ण शासन चलता था । व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका सम्बंधी सभी शक्तियाँ सम्राट के ही हाथ में केन्द्रित होती थी। कार्यपालिका का वही प्रधान होता था और साम्राज्य का सम्पूर्ण शासन उसी के नाम से संचालित होता था। देश में शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी राजा की ही होती थी तथा प्रजा के जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाना उसका परम धर्म समझा जाता था । आन्तरिक विद्रोहों का दमन और बाह्य आक्रमणों से साम्राज्य की रक्षा करना भी उसका एक मुख्य कर्तव्य था। युद्ध के समय वह सैन्य का संचालन करता था और युद्ध क्षेत्र में उपस्थित रहता था। राजा ही प्रधान सेनापति होता था। राजा ही सर्वोच्च न्यायाधीश होता था और उसी का निर्णय अन्तिम माना जाता था। प्रशासन के सभी उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति उसी के द्वारा होती थी । मंत्रिमण्डल के मन्त्रियों की नियुक्ति करने वाला वही होता ५ । राज- सम्बन्धी सभी नीतियों का सम्राट ही निधारक था।
 इतना होते हुए भी गुप्त सम्राट निरंकुश शासक नहीं थे। मंत्रिय तथा अन्य तय कर्मचारियों के साथ उनके अधिकार बंटे हुए थे। ग्राम पंचायतों तथा नगरपरिषद् आदि थानीय संस्थाओं को भी बहुत से अधिकार दे दिये गये थे। प्रजा की इच्छाओं का आदर करके तथा उनका हित साधन करके सम्राट को जनता में लोकप्रियता प्राप्त करनी पड़ती थी । प्राचीन राज्य धर्म नीति के प्रचलन के कारण राजा निरंकुश या अत्याचारी नहीं हो सकता था । डा. मजूमदार का कथन है कि प्राचीन सिद्धान्त बार- बार यह कहते हैं कि राजा केवल अपनी भलाई के लिए नहीं रहता, परन्तु वह जनता का ऋणी है और इस ऋण को अपने अच्छे शासन द्वारा ही चुका सकता है। शुक्रनीति का स्पष्ट उल्लेख है कि ब्रह्मा ने राजा को प्रजा का सेवक बनाया है जिसके बदले में वह प्रजा से कर लेता है। इस प्रकार राजा की शक्ति लोक कल्याण की भावना से ओत-प्रोत रहती थी। जनता से सम्पर्क रखने के लिए सम्राट देश का दौरा किया करता था । गुप्त सम्राट धर्मपरायण और प्रजावत्सल होते थे और अपनी प्रजा की नैतिक तथा भौतिक उन्नति के लिए सदैव चिन्तनशील तथा प्रयत्नशील रहते थे। राजा निरन्तर प्रजा की भलाई में लगा ही रहता था।

(2) मन्त्रिपरिषद - 

गुप्त काल में राजकार्यों में सम्राट का हाथ बंटाने के लिए मंत्री और आमात्य होते थे। कामदक नीतिसार में मंत्रियों तथा आमात्यों के मध्य के अन्तर को स्पष्ट किया गया है। इसके अनुसार मंत्रियों में वे अधिकारी ही आते थे जिनका मुख्य कार्य सम्राट को परामर्श देना और किसी गूढ़ विषय के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत के द्वारा निर्णय लेने में सहायता देना होता था। 
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