स्कन्दगुप्त की गुप्त साम्राज्य के योगदान को स्पष्ट कीजिये

स्कन्दगुप्त की गुप्त साम्राज्य के योगदान को स्पष्ट कीजिये

डॉ. रतिभानुसिह नाहर के कथनानुसार 'गुप्त सम्राटों में ही नहीं प्राचीन भारत के महान् सम्राटों में स्कन्दगुप्त की गणना की जानी चाहिए। अपने युवराजकाल में ही उसने पुष्यमित्रों को पराजित कर अपनी वीरता और साहस का परिचय दिया। उसने सिंहासनारूढ़ होने पर हुणों के आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया और उनको अपने देश की सीमा के बाहर खदेड़ दिया। इस महान् और गौरवपूर्ण कार्य के लिए स्कन्दगुप्त की जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी है।' । डॉ. के.पी. जायसवाल के अनुसार 'स्कन्दगुप्त ने धर्मनिष्ठ हिन्दू भारत के तरुणों का नेतृत्व किया और संख्या में अपने से अधिक शक्तिशाली शत्रु पर आक्रमण करके पराक्रम और साहस का परिचय दिया।'

एक विजेता के रूप में मूल्यांकन स्कन्दगुप्त

| डॉ. वी.सी. पाण्डेय का कथन है कि 'स्कन्दगुप्त की गणना प्राचीन भारत के महान सम्राटों में होती है। वह बड़ी ही विषम परिस्थितियों में सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। वृद्ध पिता के शासन के अन्तिम चरण में ही गुप्त साम्राज्य पर पुष्यमित्रों का आक्रमण हुआ था। यह भी सम्भव है कि इस आक्रमण में वाकाटकों ने पुष्यमित्रों का साथ दिया हो परन्तु गुप्त साम्राज्य पर सबसे अधिक भयंकर आक्रमण हूणों का था। इस बाह्य आक्रमण ने साम्राज्य की सुरक्षा खतरे में डाल दी थी। इसके साथ ही साम्राज्य के कुछ प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे। इनमें मालवा का प्रान्त सबसे अधिक कष्टदायक सिद्ध हुआ। स्कन्दगुप्त ने अदम्य पराक्रम और धैर्य का परिचय देते हुए सभी बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं को पराजित किया । इसी से भीतरी अभिलेख में उसे गुप्त वंश का वीर कहा गया है। बाह्य आक्रमणों से देश जाति और संस्कृति की रक्षा करने वाले स्कन्दगुप्त के प्रति सारी प्रजा कृतज्ञता का अनुभव करती थी उसकी यशोगाथा प्रत्येक दिशा में गाई जाती थी। उसकी उपाधि विक्रमादित्य सार्थक थी।'

(4) संगठनकर्ता के रूप में मूल्यांकन–

विजेता ही नहीं स्कन्दगुप्त एक कुशल संगठनकर्ता था। जिस साम्राज्य को उसने शक्तिशाली शत्रुओं से सुरक्षित रखा उसे सुसंगठित और सुव्यवस्थित बनाने का भी प्रयास किया उसने अपने साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभक्त कर उन पर योग्य गवर्नरों को नियुक्त किया। सौराष्ट्र में उसका गोप्ता (गवर्नर) पर्णदत्त था। गंगा यमुना का दोआब विषयपति शर्बनाग के हाथों में सौंपा। पश्चिमी मालवा में उसका गवर्नर प्रभाकर था और कौशाम्बी में भीमवर्मन, ये सभी गवर्नर अत्यन्त योग्य थे । व्यक्तियों के गुणों को परखने में स्कन्दगुप्त बेजोड़ था। उसने स्थानीय शासन की थी सुव्यवस्था की और नगरों के सुशासन के लिए नगराध्यक्ष नियुक्त किये । एक संगठनकर्ता के रूप में उसकी
उपलब्धियों का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह अपने पूर्वजों से प्राप्त विशाल साम्राज्य को जो अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक फैला था सुरक्षित और संगठित रख सका।।

(5) धार्मिक सहिष्णुता के पोषक के रूप में मूल्यांकन 

स्कन्दगुप्त न केवल संगठनकर्ता महान् विजेता एवं योग्य युद्ध संचालक ही था बल्कि एक धार्मिक सहिष्णुता का पोषक तथा आदर्श प्रशासक भी था। निसंदेह वह भी अपने पूर्वजों की भाँति वैष्णव धर्मावलम्बी था परन्तु अनेक साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वह धार्मिक दृष्टि से बहुत ही सहिष्ण था। उसके साम्राज्यकाल में वैष्णवों के अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बी भी सुख शान्ति से रह रहे थे। राज्य उनकी पूजा उपासना में किसी प्रकार की बाधा नहीं डालता था। उसने जैन धर्मावलम्बियों को मूर्ति स्थापना के लिए दान दिया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार वह प्रसिद्ध विद्वान वसुबन्धु का शिष्य था लेकिन उसने अपने वैष्णव धर्म का प नहीं किया। उसके साम्राज्य में सभी धार्मिक सम्प्रदायों को अपने विश्वास के अनसार अनुष्ठान की स्वतंत्रता थी।
| डॉ. उदयनारायण राय ने स्कन्दगुप्त की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हए लि कि ‘गुप्तवंश का अद्वितीय वीरवर बाहुबल के लिए प्रख्यात अपने नाम को चरितार्थ ) वाला यह सम्राट अपने कुल का गौरव था। यदि समुद्रगुप्त सर्वराजोच्छेता एवं चन्द्रगुप्त शकारि था तो स्कन्द्रगुप्त को हूण विजेता होने का श्रेय प्राप्त था। उसने अपने विलक्षण कार्यों एवं महान् सफलताओं के द्वारा अपने पूर्वजों के यश की वृद्धि एवं विस्तार में महत्त्वपूर्ण योग दिया था। |

वीर योद्धा और महान विजेता

डॉ. रतिभानुसिंह नाहर के कथनानुसार ‘स्कन्दगुप्त केवल एक वीर योद्धा और महान विजेता ही नहीं था वह बुद्धिमान, योग्य और सफल शासक भी था। अपने प्रान्तीय शासकों की नियुक्ति उसने जितने अधिक चिन्तन और विचार विमर्श के पश्चात् की थी उससे यह स्पष्ट होता है कि शासन सम्बन्धी कार्यों में वह कभी असावधानी प्रदर्शित नहीं करता था। जब 467 ई. में इस महान् सम्राट की मृत्यु हुई तो उसे इस बात का सन्तोष था कि उसके महान् पूर्वजों ने जिस साम्राज्य का निर्माण किया था उसको वह उसी अवस्था में छोड़ रहा था। उस साम्राज्य की सीमाएँ किसी प्रकार संकुचित नहीं हो पायी थी। अतः अलेिखीय प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि स्कन्दगुप्त का साम्राज्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत, पश्चिम में काठियावाड़ से लेकर पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था।' । डॉ. आरएन. दाण्डेकर का कथन है कि 'स्कन्दगुप्त सर्वोच्च प्रशंसा का अधिकारी है। जो निसंदेह हूणों को पराजित करने वाला, यूरोप तथा एशिया में प्रथम वीर था। उसका बुद्धिमत्तापूर्ण शासन उसके शौर्यपूर्ण युद्ध, उसकी देशभक्ति सम्बन्धी इच्छायें इन सबने स्कन्दगुप्त को सबसे महान् गुप्त सम्राटों में से एक बना दिया। स्कन्दगुप्त ने हूणों द्वारा देश की बर्बादी अगले 50 वर्षों तक के लिए रोक कर भारत की महती सेवा की।
भीतरी अभिलेख के अनुसार उसकी कीर्ति का सर्वत्र, यहाँ तक कि शत्रु देशों में भी गुणगान होता था । स्कन्दगुप्त के पिछले मिश्रित धातु के सिक्कों के आधार पर यह कहा। जाता है कि उसे आर्थिक दबाव का अहसास इसलिए करना पड़ा क्योंकि पश्चिमोत्तर सीमा पर हूणों का दबाव निरन्तर बना रहा तथा उनकी बाढ़ को रोकने के लिए उसे पानी की तरह धन बहाना पड़ा। आन्तरिक और बाह्य कठिनाईयों को सहते हुए वह देश की रक्षा करने में समर्थ रहा। उसका देहावसान 467 ई. के आस-पास हुआ।
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