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Sunday, December 16, 2018

स्कंदगुप्त के पश्चात क्रमशः अन्य शासकों का विवरण

स्कंदगुप्त के पश्चात क्रमशः अन्य शासकों का विवरण


भितरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसके पिता का नाम पुरुगप्त तथा माता का नाम वत्सदेवी था। यह माना जाता है कि इसका भाई बुद्धगुप्त था। अनेक इतिहासवेत्ताओं ने नरसिंहगुप्त का समीकरण ह्वेनसांग के बालादित्य से किया है क्योंकि नरसिंहगुप्त की मुद्राओं पर उसकी उपाधि बालादित्य अंकित है। ह्वेनसांग के अनुसार बालादित्य ने हूणों से सफलतापूर्वक लोहा लिया था।
नरसिंहगुप्त बालादित्य के शासनकाल में गुप्तवंश की प्रभुता को हूण नेता तोरमाण ने मध्य भारत में चुनौती दी । ह्वेनसांग के अनुसार 'मगध नरेश बालादित्य राजा बुद्ध के नियम का अनन्य भक्त था । जब उसने मिहिरकुल के अत्याचारों तथा नृशंसता के समाचार सुने तो उसने राज्य की सीमाओं को पूर्णतः सुरक्षित कर लिया और शुल्क देने से इन्कार कर दिया। मिहिरकुल द्वारा आक्रमण करने पर बालादित्य ने अपनी सेना सहित एक द्वीप में आश्रय लिया। बालादित्य के सैनिकों ने उसका एक तंग दर्रे में पीछा किया और उसे बन्दी बना लिया। उसने मिहिरकुल को मारना चाहा किन्तु अपनी माता के कहने पर मुक्त कर दिया । हूणों पर विजय बालादित्य के शासनकाल की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । आर्यमंजूश्री मूलकल्प में नरसिंह गुप्त बालादित्य को चक्रवर्ती सम्राट कहा गया है। इस ग्रंथ के अनुसार पूर्वी मालवा का क्षेत्र उसके स्वामित्व में था।'

नरसिंह गुप्त बालादित्य का साम्राज्य

डॉ. रतिभानुसिंह नाहर का कथन है ‘नरसिंह गुप्त बालादित्य का साम्राज्य बंगाल से अवध तक व्याप्त था। अयोध्या साम्राज्य की मुख्य नगरी थी । अवध में उसकी मुद्राएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हुई हैं। नदिया जिले में राजघाट से एक स्वर्णमुद्रा प्राप्त हुई है। बंगाल के वीरभूम जिले में एक अन्य मुद्रा प्राप्त हुई है। इस प्रकार नरसिंह बालादित्य का साम्राज्य पर्याप्त विस्तृत था और इसने गुप्त साम्राज्य के लुप्त गौरव को पुनस्र्थापित करने के लिए पुनः प्रयास किया था। इसको अपने प्रयत्न में पर्याप्त सफलता भी प्राप्त हुई थी।
नरसिंह गुप्त बालादित्य बौद्ध मतावलम्बी था। इसकी जानकारी चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से मिलती है । भितरी के राजमुद्रा लेख में नरसिंह गुप्त बालादित्य की परम भागवत उपाधि न मिलने से अनुमान है कि उसका व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म नहीं रह गया था। परमार्थ कृत वसुबन्धु जीवनी द्वारा प्रतीत होता है कि वह बौद्ध मतावलम्बी था। वसुबन्धु जिसको कि नरसिंह गुप्त बालादित्य के पिता बड़ा ही सम्मान प्रदान करते थे और वह उसका परम भक्त था । ऐसी सम्भावना व्यक्त की जाती है कि पुरुदत्त ने अपने कुमार बालादित्य को सुशिक्षित बनाने के लिए वसुबन्धु को आचार्य नियुक्त किया था। विद्वानों ने बालादित्य का समीकरण नरसिंह गुप्त के साथ किया है। इस आधार पर भी इतिहासकार नरसिंह गुप्त को बौद्ध धर्म का अनुयायी मानते हैं। बौद्ध अनुयायी होते हुए भी वह अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था सभी धर्मों का सम्मान करता था। आर्य मंजूश्री मूलकल्प के अनुसार चक्रवर्ती बालादित्य की मृत्यु 36 वर्ष की आयु में हुई थी।

(7) कुमार गुप्त तृतीय-

नरसिंह गुप्त बालादित्य की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कुमार गुप्त तृतीय सिंहासन पर आसीन हुआ। भितरी अभिलेख से विदित होता है कि वह नरसिंह गुप्त का पुत्र था। इसी अभिलेख में उसे परम भागवत की उपाधि से विभूषित किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कुमारगुप्त तृतीय का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था। इसकी उपाधि पर गरुड़ का चित्र अंकित होने से भी इसके वैष्णव धर्मोपासक होने की पुष्टि होती है । आर्य मंजूश्री मूल कल्प से भी उसकी उदार धार्मिक प्रवृत्ति का पता चलता है। वह भी एक धार्मिक सहिष्णु व्यक्ति था जिसने अन्य धर्मों का उतना ही सम्मान किया जितना कि अपने व्यक्तिगत धर्म का ।।
कुमार गुप्त तृतीय को शासन कार्य संभालते ही अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा उसे गौडों, आन्ध्रों और शुलिकों के विद्रोह का सामना करना पड़ा। इतिहासकारों का मत है कि पूर्वी भारत कुमार गुप्त तृतीय के साम्राज्य में शामिल था। आर्य मंजूश्री मूलकल्प से भी पूर्वी भारत पर उसके स्वामित्व की पुष्टि होती है। नालन्दा के लेख से भी यह ज्ञात होता है कि बिहार पर उसका अधिकार था। उत्तर प्रदेश पर भी उसके स्वामित्व की पुष्टि अभिलेख से होती है। डॉ. वीड़ी. महाजन का कथन है कि कुमारगुप्त तृतीय ने गौड़ों की सहायता से मौखरियों को परास्त कर दिया। उसने मौखरियों के शक्तिशाली राजा ईशान वर्मा को पराजित किया। यह भी बताया गया है कुमार गुप्त तृतीय का दाह संस्कार प्रयाग में किया गया जो उसके साम्राज्य का ही भाग होगा।'
आर्य मंजूश्री मूलकल्प में उसे कुमारण्य कहा गया है। उसकी प्रसारित मुद्राओं से ज्ञात होता है कि उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी ऐसा अनुमान लगाया जाता है। कि उसने बज्र की भी उपाधि धारण की थी ह्वेनसांग के अनुसार सम्भवत: बज्र भी उसकी एक उपाधि अथवा उपनाम था। कुमार गुप्त तृतीय का शासनकाल 530 ई. और 540 ई. के मध्य को स्वीकार किया जाता है।

(8) विष्णुगुप्त 

नालन्दा के मुद्रालेख की प्राप्ति के उपरान्त यह स्वीकार किया जाता है कि विष्णुगुप्त इस वंश का अन्तिम शासक था। इसी मुद्रा लेख से ज्ञात होता है कि विष्णुगुप्त कुमार गुप्त तृतीय का पुत्र तथा नरसिंह गुप्त का पौत्र था। इसने कुमार गुप्त की मृत्यु के पश्चात् सत्ता सँभाली जिसकी पुष्टि विष्णुगुप्त की प्राप्त उन मुद्राओं से होती है जिनका सम्बन्ध नरसिंहगुप्त और कुमारगुप्त के साथ रहा। डॉ. उदय नारायण कालीघाट मुद्रा भांड के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पूर्वी बंगाल इसके साम्राज्य के अन्तर्गत था। वर्तमान में मिले सुमण्डल के लेख से ज्ञात होता है कि उड़ीसा में गुप्त राज्य कम से कम 570 ई. तक स्थायी रहा। अतएव सम्भव है कि विष्णुगुप्त का राज्य किसी न किसी रूप में 570 ई. तक विद्यमान था। | जैन हरिवंश के अनुसार विष्णुगुप्त चन्द्रादित्य ने 550 ई. तक शासन किया। विष्णुगुप्त की ऐसी भी मुद्राएँ मिली हैं जिन पर श्री चन्द्रादित्य की उपाधि मिलती है। विष्णु गुप्त के बाद साम्राज्य की शक्ति में बहुत कमी हो गई और इसकी मृत्यु के उपरान्त गुप्त साम्राज्य के इतिहास का अन्त हो गया।