Sunday, December 16, 2018

Describe the Salient features of the Gupta Administration.

Describe the Salient features of the Gupta Administration.

इस विवरण से स्पष्ट है कि निसंदेह गुप्त सम्राट मन्त्रियों की सलाह या सहायता से शासन चलाते थे। यह भी अनुमान किया जाता है कि सभी प्रकार के विभागों को मंत्रियों के अधीन कर दिया जाता था और उसका उत्तरदायित्व उसी सम्बन्धित मंत्री पर छोड़ दिया जाता था। जहाँ तक परामर्श मानने का प्रश्न है तो यह कहा जा सकता है कि सम्राट सर्वोच्च पदाधिकारी था और वह मंत्रियों की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था। लेकिन फिर भी गुप्त सम्राटों के विषय में यह कहा जाता है कि वह अक्सर अपने मंत्रियों के परामर्श को सम्मान देते थे। मंत्रियों के महत्व का उल्लेख करते हुए कामन्दक ने उन्हें राजा के महत्त्वपूर्ण अग बताया है और अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि जो सम्राट अपने मंत्रियों के परामर्श पर गौर नहीं करता उसको अपने शत्रुओं के सम्मुख पराजित होना पड़ता है। मंत्रियों के लिए भी आवश्यक है कि वह अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने वाले, दूरदर्शी, विद्वान, था और वह मात्रा जाता है कि वह अटक ने उन्हें राजा कों चयों के महत्त्व का उल्लते हुए कहा है कि जित होना पड़ता है, विद्वान, सत्य के मार्ग पर चलने वाले, न्याय प्रिय तथा कुलीन हों गुप्त साम्राज्य में मत्रियों का चयन उनकी सैनिक योग्यताओं पर भी निर्भर करता था।

गुप्तकाल में मंत्रिपरिषद

गुप्त काल में अमात्य, सचिव या मंत्री का पद परम्परागत या वंशानुगत होता था। उदयगिरी के गुहालेख से ज्ञात होता है कि धुवभूति महादण्डनायक तथा अमात्य रह चुका था। उसके पश्चात उसका पुत्र हरिषेण भी महादण्ड नायक बना । करमदांडा अभिलेखों से जान पड़ता है कि शिखर स्वामी चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का मंत्री था और शिखर स्वामी का पुत्र पृथ्वीषेण कुमार गुप्त का मंत्री था। इन तथ्यों से विदित होता है कि बहुधा महादण्डनायक ही सम्राट को विदेश मंत्री होता था।
| करमदांडा की शिवलिंग प्रशस्ति से यह भी ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने एवं कुमार गुप्त के अमात्य ब्राह्मण थे, परन्तु ऐसा मान लेना सर्वथा गलत होगा कि गुप्त सम्राटों ने केवल ब्राह्मणों को ही अपना अमात्य बनाया और दूसरे वर्गों की उपेक्षा की निसंदेह मंत्रियों और अमात्यों की नियुक्ति अब भी सम्राट ही करता था। कभी- कभी सम्राट एक ही व्यक्ति को अनेक प्रमुख पदों पर नियुक्त कर देता था जैसा कि प्रयास प्रशस्ति से विदित होता है। हरिषेण, कुमारामात्य, सन्धि विग्रहिक और महादण्ड नायक नामक तीन पदों को धारण करता था।

गुप्तकाल में नागरिक कर्मचारी (Civil Officers) -

 गुप्त सम्राटों ने अपने प्रशासन को सुव्यवस्थित एवं कुशलता के साथ संचालित करने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक कर्मचारी नियुक्त कर रखे थे। जिनमें राजपुरुष, राजनायक, राजपुत्र, राजामात्य, महासामन्त आदि के अतिरिक्त निम्नलिखित कर्मचारी प्रमुख थे। 
(i) कुमारामात्य - गुप्त अभिलेखों के अनुसार कुमारामात्य ऐसे कर्मचारियों का एक वर्ग था जो उच्च से उच्च पदों पर नियुक्त किये जाते थे । केन्द्रीय सचिवालय का संचालन भी यही कुमारामात्य करते थे। ये केन्द्रीय आदेशों को सरकारी विभागों और प्रान्तों में भेजते थे। डॉ. अल्टेकर ने कुमारामात्य के पद को आधुनिक आई.
ए. एस. पदाधिकारियों की तरह एक वर्ग माना है। 
(ii) महाप्रतिहार या कंचुकी - कंचुको वास्तव में महाप्रतिहार ही होता था, महाप्रतिहारका कार्य सम्राट से भेंट करने के लिए आने वालों का आज्ञा पत्र देने का भी था। यह राजप्रासाद का रक्षक भी होता था।
(iii) राजामात्य - राजामात्य सम्राट के परामर्शदाता के रूप में कार्य करता था। 
(iv) राजस्थानीय - राज स्थानीय सम्भवतः सम्राट या गवर्नर के निवास स्थान का एक कर्मचारी था। 
१) आज्ञा संचार के - आज्ञा संचारकों का कार्य सम्राट की आज्ञाओं का पालन करना था। ये संरक्षकों तथा पथ प्रदर्शकों का कार्य भी करते थे। 
(vi) सर्वाध्यक्ष - सर्वाध्यक्ष एक प्रमुख अधिकारी होता था जिसे सभी केन्द्रीय विभागों का सामान्य पर्यवेक्षण करना पड़ता था।

गुप्तकाल में  राजस्व तथा पुलिस अधिकारी (Revenue & Police Officers) 

गुप्त काल में सम्राटों द्वारा प्रशासन के कार्यों को भली- भाँति कार्यान्वित करने के लिए राजस्व वसूलने एवं पुलिस के कार्यों को पूर्णत: अलग- अलग नहीं किया गया था। इन विभागों के मुख्य कर्मचारी उपरिक, शापराधिक, चौरोद्धरणिक दंडिक, दण्डपाशिक, गौमिक, क्षेत्र प्रान्तपाल, टपाल, अंगरक्षक आयुक्तक, विनियुक्तक, राजुक आदि थे। बासाढ़ की मुद्रा के अनुसार पुलिस विभाग का बड़ा कर्मचारी दण्डपाशिक होता था। डॉ.अल्टेकर इसे आधुनिक पुलिस अधीक्षक के समकक्ष मानते हैं। फाह्यान के अनुसार “उस समय चोरी का कोई भय नहीं था।” इससे स्पष्ट होता है कि गुप्त काल में पुलिस प्रशासन अधिक सुदृढ़ था । ।

गुप्तकाल में  सैनिक अधिकारी (Military Officers) - 

सैनिक विभाग केन्द्र का सबसे महत्वपूर्ण विभाग होता था। सम्राट ही सेना का अध्यक्ष होता था। सम्राट के वृद्ध होने पर युदराज सेना की अध्यक्षता करता था। गुप्तकालीन अभिलेखों में उल्लेखित प्रमुख सैनिक अधिकारी निम्नलिखित थे
(i) महासेनापति - यह साम्राज्य के विभिन्न भागों में सैन्य संचालन के लिए नियुक्त
रहता था। यह राजा के नीचे प्रधान सेनापति का कार्य संभालता था। सेना विभाग का समस्त कार्य इसी के हाथ में था। 
(ii) पहाटपटनायक - यह पुलिस विभाग का सबसे उच्च अधिकारी था । सम्राट की सुरक्षा का उत्तरदायित्व उसी पर होता था। उसके अधीन दण्डनायक, दण्डिक तथा टण्डपाशविक नामक अन्य छोटे अधिकारी होते थे । समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ लेख में हरिषेण ध्रुवभूति और तिलक भट्ट को महादण्डनायक कहा गया है।
(iii) पहाबलाधिकृत - यह पदाधिकारी प्रधान सेनापति होता था। इसके अधीन अन्य बलाधिकृत (सेनानायक) होते थे । 
(iv) पहासन्धि विग्रहिक - यह मंत्री सन्धि विग्रह विभाग का अधिकारी था। युद्ध और शान्ति के मामले उसके कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत थे । अपने पड़ौसी राजाओं से सन्धि या विग्रह करना इसके ही अधिकार क्षेत्र में था।
(५) रणभाण्डाधिकृत - यह सेना में कार्य आने वाली सामग्री की व्यवस्था एवं पूर्ति
करने के कार्य में लिप्त रहता था। इसका एक पृथक विभाग होता था। 
(vi) भाण्टा माराधिकृत - यह राजकोष का अधिकारी होता था।
(vii) विनय स्थितिस्थापक - शान्ति एवं व्यवस्था करने वाला एक अधिकारी होता था।
यह अधिकारी धर्म विभाग का अध्यक्ष होता था। 
(viii) महाअक्षपटलक - यह अधिकारी राज्य के समक्ष आदेशों का रिकार्ड रखने के
लिए होता था। 
(ix) अटाश्वपति - अश्वसेना का नायक ।

गुप्तकाल में अन्य अधिकारी - 

उपरोक्त पदाधिकारियों के अतिरिक्त कुछ अन्य छोटे स्तर के कर्मचारी भी होते थे ।
(i) ध्रुवाधिकरण - इस अधिकारी का मुख्य कार्य भूमिकर को वसूल करना था। |