Sunday, December 16, 2018

Describe the Salient features of the Gupta Administration.

Describe the Salient features of the Gupta Administration.


(1) गुप्त काल में जिलों का शासन - 

प्रान्तों से छोटी इकाई प्रदेश कहलाती थी जो आजकल की कमिश्नरी के बराबर होती थी और इससे छोटी इकाई विषय कहलाती थी जो जिले के बराबर होती थी। विषयों का शासन विषयपति कुमारामात्य अथवा महाराज करते थे। विषयपति की नियुक्ति भी पाँच वर्ष के लिए होती थी और उनकी सहायता के लिए एक सभा का गठन किया जाता था जिसके चार सदस्य होते थे।
(1) नगर व्यापारियों की श्रेणियों या बैंकों (पूगों) के प्रमुख 
(2) सार्थावाह (मुख्यव्यापारी)
 (3) प्रथम कुलिक (अथवा शिल्प श्रेणियों के प्रधान)
 (4) प्रथम कायस्थ (विषय के मुख्य लेखक)
विषयपति के स्थायी स्थान को “अधिष्ठान” तथा कार्यालय को “अधिकरण” कहा जाता था। इसमें निम्नलिखित पदाधिकारियों के विभाग स्थित थे।
(1) धुवाधिकरणिक (भूमि कर का अधिकारी) 
(2) भाण्डामाराधिकृत (कोषाध्यक्ष) 
(3) रालवटक (लेखापाल या मुनीम) 
(4) गोल्मिक (जंगलों और किलों के अधिकारी) 
(5) शौल्किक (चुंगी का संग्रहकर्ता) 
(6) महाक्षपटलिक (प्रलेखागार का अधिकारी)
 (7) अग्रहारिक (दान में दी गई भूमि की देख रेख करने वाला अधिकारी) 
(8) सर्वाध्यक्ष (सामान्य अधीक्षक होते थे, उनके अधीन कुलपुत्र काम करते थे जिन।
कार्य दुराचार रोकना था ।)

(2) गुप्त काल में नगर प्रशासन - 

नगर का शासन राज्य की ओर से नियुक्त पदाधिकारियों तथा स्थानीय सभा, समितियों एवं समुदायों द्वारा सम्पन्न होता था । नागरिक प्रशासन का प्रमुख पुरपाल या नगर रक्षक होता था। नगरों में एक परिषद् भी होती थी जो आधुनिक नगरपालिका की तरह कार्य करती थी। इस परिषद का अध्यक्ष नगरपति कहलाता था । नगरपति को दांगिक कहा जाता था। नगरपति की नियुक्ति विषयपति द्वारा की जाती थी । नगरपति नगर के लोगों से कई प्रकार के टैक्स वसूल करता था और उनसे होने वाली आय को नगर व्यवस्था के उपयोग में लेता था। नगरों में नगरपालिकाएं स्वच्छता, रोशनी, सडक, व्यापार नियंत्रण का कार्यभार संभालती थी । यदि कोई व्यक्ति मुख्य भाग, स्नानागार, मन्दिर तथा भवन के निकट गन्दगी फैलाते हुए पकड़ा जाता था तो उसे दण्ड दिया जाता था, उसे एक पण दण्ड कर के रूप में देना पड़ता था।

गुप्त काल में ग्राम प्रशासन - 

पूर्वी भारत में विषय को वीथियों में विभाजित किया गया और वीथि गाँवों में विभक्त थे । साम्राज्य की सबसे छोटी इकाई गाँव था। ग्राम का मुख्य अधिकारी ग्रामिक, महत्तर अथवा भोजक होता था। डॉ. रामशरण शर्मा के अनुसार गुप्तकाल में ग्राम प्रधान अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। यह गाँव का काम काज श्रेष्ठजनों की सहायता से सम्भालता था। हर गाँव के प्रशासन से प्रमुख स्थानीय व्यक्ति जुड़े हुए होते थे। उनकी अनुमति के बिना जमीन की कोई खरीद बिक्री नहीं हो सकती थी। उक्त विवरणानुसार गाँव की भी अपनी सभा होती थी जिसे ग्राम परिषद् कहते थे। इसमें निम्नलिखित सदस्य होते थे।
(1) ग्रामिक • यह गाँव का मुखिया होता था। 
(2) महत्तर - यह गाँव का वयोवृद्ध तथा अनुभवी व्यक्ति होता था। 
(3) अष्टकुलाधिकारणिक - सम्भवतः स्थानीय क्षेत्र के आठ कुलों या गुप्तचरों का अधिकारी । 
(4) कुटुम्बिन - ये ग्राम के परिवारों के मुख्य सदस्य होते थे।
ग्राम पंचायतें ग्रामीणों के भूमि सम्बन्धी और छोटे- छोटे अन्य प्रकार के झगड़ों का निपटारा करती थी। ग्राम की स्वच्छता, आवास, खेतों की सिंचाई आदि की व्यवस्था भी पंचायत के हाथ में थी।
गुप्त काल में प्रशासनिक विकेन्द्रीयकरण के बारे में डॉ. रोमिला थापर का यह कथन उद्धृत कर देना समीचीन जान पड़ता है कि वह लिखित है अनेक प्रकार के मंत्री और परामर्शदाता राजा की सहायता करते थे। प्रान्त (देश अथवा मुक्ति) अनेक जिलों में (प्रदेश अथवा विषय) में विभाजित थे और प्रत्येक जिले के अपने प्रशासनिक कार्यालय थे। व्यावहारिक स्तर पर स्थानीय प्रशासन केन्द्र के नियंत्रण से मुक्त था। जब तक केन्द्रीय सत्ता की नीति अथवा आदेशों पर कोई स्पष्ट प्रभाव पड़ता हो नीति सम्बन्धी प्रश्नों पर अथवा किन्हीं विशेष स्थितियों के सम्बन्ध में निर्णय साधारणतया स्थानीय स्तर पर ही लिये जाते थे। जिले के अधिकारी (आयुक्त) और उनके ऊपर एक और प्रान्तीय अधिकारी (कुमारामात्य) स्थानीय प्रशासन और केन्द्र के बीच की कड़ी थे। मौर्यों और गुप्तों के शासन में यही महत्वपूर्ण अन्तर था जहाँ अशोक इस बात के लिए आग्रहशील था कि उसे जिलों के छोटे से छोटे अधिकारी के कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, गुप्त राज्य इस भार को कुमारामात्यों तथा आयुक्तों पर छोड़कर सन्तुष्ट थे।”

गुप्त काल में सैन्य संगठन -

गुप्त सम्राटों ने अपने साम्राज्य को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु सेना को संगठित करने पर बहुत ध्यान दिया । इस तरह एक विशाल तथा शक्तिशाली सेना का गठन किया। सेना के चार अंग थे । घोड़े, हाथी, पैदल और रथ ही थे। गुप्त सम्राटों ने अपनी सेना को जिस ढंग से सुसज्जित किया। उससे विदित होता है कि उन्होंने रथों की अपनी सेना के लिए अवसर के अनुकूल न समझते हुए उपेक्षा की। सेना का सबसे उच्च अधिकारी महाबलाधिकृत कहलाता था, इसके सहायक अन्य अनेक सैनिक अधिकारी होते थे। सेना की टुकड़ी को चमू कहते थे। सैन्य विभाग के अन्य प्रमुख अधिकारी निम्नलिखित
(1) महासेनापति अथवा महादण्डनायक - राजा के नीचे महासेनापति हुआ करता था।
एक अन्य अभिलेख में इसे महाबलाधिकृत कहा गया है। समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तम्भ लेख में हरिषेण, धुवभूति और तिलकभट्ट को महादण्डनायक कहा गया है।
(2) बलाधिकृत (सैनिकों की नियुक्ति करने वाला अधिकारी)
 (3) भटाश्वति (पैदल और घुड़सवारों का अध्यक्ष)
 (4) रणभाण्डागारिक (सैनिक सामान, रसद आदि का अधिकारी)
 (5) महापीलुपति (गजसेना का अध्यक्ष) 
(6) महाश्वपति (अश्व सेना का अध्यक्ष)
सम्राट की एक परम्परागत सेना होती थी। इसके अतिरिक्त स्थानीय तथा सामन्तों की सेनायें भी होती थी जो विपत्ति आने पर सम्राट की मदद करती थी। अस्त्र- शस्त्र निर्माण हेतु अनेक उद्योग स्थापित थे। प्रयाग की प्रशस्ति के अनुसार सैनिकों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले शस्त्रों में परशु (फरसा) बाण, शंकु शक्ति, प्रासासि, तीमर, भिन्दिपाल, नाराच, वैतास्तिक आदि मुख्य थे। अधिकतर योद्धा तीर, तलवार और फरसों से लड़ते थे और अपनी सुरक्षा हेतु कवच पहनते थे।

गुप्त काल में पुलिस का प्रबंध - 

विदेशी पर्यटकों के अनुसार देश में कानून और व्यवस्था की अच्छी स्थिति थी। अपराधों की संख्या नगण्य थी। बडे-बड़े नगरों में और कस्बों में पुलिस की व्यवस्था की गई थी। पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी दण्डपाशाधिकारी कहलाता था, गुप्तचर विभाग भी था जिसके कर्मचारी दूत कहलाते थे। डॉ. अल्टेकर इस अधिकारी को आधुनिक पुलिस अधीक्षक के समकक्ष मानते थे। फाह्यान के अनुसार “ उस समय चोरी का कोई भय नहीं था इससे ज्ञात होता है कि गुप्तों के समय में पुलिस प्रशासन अधिक सुदृढ़ था।” गुप्त शासन काल में पुलिस विभाग का संगठन निम्न प्रकार था।
(1) दण्डपाशाधिकारी (पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी) 
(2) चौरोद्वरणिक (चोर पकड़ने वाले सिपाही) 
(3) दण्डपाशिक (लाठी और रस्से वाले सिपाही) 
(4) दूत (गुप्तचर विभाग के कर्मचारी) 
(5) भट या गात (साधारण सिपाही)