Estimate the services of Skand Gupta to the Gupta empire both as a generald and as an administrator.

Estimate the services of Skand Gupta to the Gupta empire both as a generald and as an administrator.

अल्कर ने गुप्तकालीन मुद्राएं पृष्ठ 180 पर लिखा है कि 'स्कन्दगुप्त की प्रचलित मध्य देशीय मुद्राओं के ऊपर फैलाए हुए पंख वाले मोर का चित्र अंकित है। दूसरी ओर या तो परम भागवत् महाराजाधिराज श्रीस्कन्दगुप्त विक्रमादित्य या परम भागवत् श्री विक्रमादित्य स्कन्दगुप्त या श्री स्कन्दगुप्तों दिव्य जयति लेख उत्कीर्ण हैं।'
उपाधियाँ-अपने पूर्वजनों की तरह स्कन्दगुप्त ने भी अनेक उपाधियाँ धारण की थी। कहौम के लेख में इसे इन्द्र के सामन (शत्कोपम) कहा गया है। भितरी अभिलेख के अनुसार इसकी विक्रमादित्य एवं क्रमादित्य नामक दो उपाधियाँ आती हैं। क्रमादित्य नामक उपाधि तो इसकी स्वर्ण एवं रजत मुद्राओं पर भी अंकित है । मन्जुश्री मूलकल्प नामक ग्रंथ में स्कन्दगुप्त को कई नामों वाला नरेश कहा है तथा इसका एक और नाम 'देवराज' माना है। कथा सरित्सागर में इसे विक्रमादित्य कहा गया है।

स्कंदगुप्त का शासनकाल–

कुमारगुप्त प्रथम का देहावसान गुप्त सम्वत् 136 अर्थात् 455 ई. के लगभग हुआ । विद्वानों का मानना है कि स्कन्दगुप्त की राज्याभिषेक तिथि 455 ई. ही रही होगी उसके सिक्कों पर प्रथम तिथि 455 ई. है और अन्तिम तिथि 467 ई. है । इसके जूनागढ़ अभिलेख में इसी तिथि का उल्लेख प्राप्त है। गढ़वा अभिलेख में उसके शासनकाल की अन्तिम तिथि गुप्त सम्वत् 148 अर्थात् 467 ई. है। इस तरह स्कन्दगुप्त ने कुल 12 वर्ष राज्य किया। उसके अल्पकालीन शासन का कारण हो सकता है कि उसके जीवन का अधिकांश भाग उसके पिता के 40 वर्षीय राज्यकाल में व्यतीत हो चुके थे । इस प्रकार स्कन्दगुप्त का शासनकाल 455 ई. से 467 ई. तक था।
| स्कन्दगुप्त का चरित्र और मूल्यांकन । (1) अनेकानेक चारित्रिक गुणों से युक्त-भीतरी अभिलेख के आधार पर दहा जा सकता है कि स्कन्दगुप्त में अनेकानेक चारित्रिक गुण थे। वह विनय, बल और सुनीति से युक्त था। वह साधुओं के चरित्र का रक्षक था। उसमें राजाओं के सभी गुण विद्यमान थे ।। वह महान दयाल प्रजा हितैषी था। उसके शासनकाल में कोई भी व्यक्ति अधम, दुखी, दरिद्र लोलुप, संकटग्रस्त एवं दुराचारी नहीं था। आर्य मंजू श्री मूलकल्प के अनुसार स्कन्दगुप्त एक श्रेष्ठ, बुद्धिमान और धर्मात्मा व्यक्ति था।

(2) योग्य एवं सफरन शासक के रूप में मूल्यांकन 

स्कन्दगुप्त एक योग्य एवं सफल शासक भी था। उसके शासनकाल के अधिकांश भाग में शान्ति और गास्था बनी रही। जिससे प्रजा को अपनी चमखी उन्नति के अवसर प्राप्त हुए वह एक प्रतिभा सम्पन्न शासक था उसने अपनी दूरदृष्टि का प्रयोग करते हुए शासन व्यवस्था को संगठित किया। इसके लिए उसने अपने प्रान्तों में योग्य राज्यपालों की नियुक्ति की, शासन से सम्बन्धित कार्यों में वह कभी दोन नहीं रखता था। वह प्राचीन भारत का अन्तिम सम्राट था जिसने पश्चिमोत्तर सी का का महत्व समझा और उसकी रक्षा का प्रबंध किया। उस समय पश्चिमोत्तर सीमा पर हों ने जमाव कर रखा था और हर समय इनके आक्रमण की सम्भावना बनी रहती थी। अतः उसने अपने सर्वाधिक योग्य व्यक्ति पर्णदत्त को सौराष्ट्र या गुजरात का गवर्नर नियुक्त किया। वह लोकोपकारी शासक था। वह प्रजा से और प्रजा उससे बहुत स्नेह करती थीं। वह अपनी प्रजा को नैतिक और भौतिक उन्नति हेतु सदैव तत्पर रहता था। उसने सौराष्ट्र में सुदर्शन झील के बाँध को पुनर्निर्माण करवाकर वहाँ की प्रजा पर आई विपत्ति का निवारण कर अपनी योग्यता एवं सफल शासक होने का परिचय दिया। । डॉ. रतिभानुसिंह नाहर के कथनानुसार 'स्कन्दगुप्त केवल एक वीर योद्धा और महान विजेता ही नहीं था। 

स्कंदगुप्त का प्रान्तीय शासन 

एक बुद्धिमान योग्य और सफल शासक भी था। अपने प्रान्तीय शासकों की नियुक्ति उसने जितने अधिक चिन्तन और विचार विमर्श के पश्चात् की थी उससे यह पष्ट हो जाता है कि शासन सम्बन्धी कार्यों में वह कभी असावधानी नहीं बरतता था। उसके प्रान्तीय शासक के पुत्र चक्रपालित ने सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण में असीम व्यय के बावजूद भी जिस तत्परता का परिचय दिया। उससे स्कन्दगुप्त की उदार शासन नीति पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। उसकी स्वर्ण मुद्राएं अपेक्षाकृत थोड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं और उनमें हीन धातुओं का मिश्रण अधिक है जिससे पता चलता है कि उसके शासनकाल में देश उतना समृद्ध नहीं था जितना कि उसके पिता के समय में था। परन्तु इस आर्थिक संकट का प्रमुख कारण था बर्बर हूणों का आक्रमण जिनका सफलतापूर्वक सामना करने के लिए राज्य को विपुल धन खर्च करना पड़ा होगा। इतना होने पर भी स्कन्दगुप्त ने लोकहित के कार्यों पर समुचित ध्यान दिया और प्रजा की भलाई के लिए सौराष्ट्र जैसे दूरस्थ प्रान्त में भी झील की मरम्मत करवाई।

(3) एक विजेता के रूप में मूल्यांकन 

स्कन्दगुप्त एक विजेता के रूप में भी देखा जा सकता है। उसने अपनी वीरता तथा कुशल सेनानायक होने की पुष्टि पुष्यमित्रों और हुणों को पराजित कर की। इसका प्रमाण हमें स्कन्दगुप्त के भीतरी अभिलेख से मिलता है जिसमें पुष्यमित्रों के आक्रमण का वर्णन है जिन्होंने गुप्तवंश की लक्ष्मी को विचलित कर दिया। इस अभिलेख के अनुसार अपने युवराजकाल में ही उसने पुष्यमित्रों को पराजित करके उसने गुप्तवंश की राजलक्ष्मी की पुनस्र्थापना की थी। उसकी यह एक महान् उपलब्धि थी। सिंहासन पर बैठते ही उसे पुष्यमित्रों से कहीं बड़ा संकटे इस समय हूणों से उपस्थित हुआ। वे पहले से ही भारत की पश्चिमोत्तर सीमा से टकरा रहे थे। उन्होंने गुप्तों की कमजोरी की गन्ध पाकर तुरंतु भारत पर आक्रमण कर दिया। उसने हूणों का बड़ी वीरता से सामना किया। कहा जाता है कि उसने हूणों के विरुद्ध इतना भयंकर युद्ध किया कि सारी पृथ्वी कम्पित हो गयी। उसने हृणों को मार भगाया और गुप्तवंश की शक्ति और प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर दिया। वह अपनी सैनिक योग्यता और अपने भुजबल से अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में मिले साम्राज्य को सुरक्षित व संगठित रख सका । यह उसकी सैनिक सफलता का सबसे बड़ा साक्ष्य है।
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