ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख

ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख

इस भाग में वर्गीकरण की विभिन्न अनुसूचियों का उल्लेख है। वर्ग संख्याओं का निर्माण करने के लिये संबंधित अनुसूचियों से एकल संख्यायें प्राप्त की जाती हैं।
अध्याय 02 में ग्रन्थांक निर्माण करने के पक्ष-परिसूत्र का उल्लेख है तथा ग्रन्थांक में प्रयोग में लाये जाने वाले रूप (Form) उप विभाजनों की अनुसूची दी गई है- जैसे सचित्र ग्रन्थ के लिये f(Picture), अनुक्रमणिका के लिये b(index) कोड (संहिता) के लिये q(Code) इत्यादि।
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नोट:- ग्रन्थांक का निर्माण करते समय इस अध्याय के साथ-साथ भाग 1 के अध्याय 03 का निरंतर अवलोकन करना पड़ता है।
अध्याय 1 में ज्ञान जगत का विभाजन मुख्य वर्गों में किया गया है। प्रत्येक मुख्य वर्ग के लिये प्रयुक्त प्रतीक चिन्ह का भी संबंधित मुख्य वर्ग के साथ उल्लेख किया गया है। जैसे, 2 = Library Science, B= Mathematics, C=Physics, V=History इत्यादि।
अध्याय 2 में सर्वमान्य एकलों की अनुसूची का उल्लेख है। यहां पर प्रायः अधिकांश सर्वसामान्य एकलों के साथ उनसे सम्बन्धित पक्ष परिसूत्र दिया गया है। इस पक्ष परिसूत्र को ध्यान में रखकर संबंधित सर्वसामान्य एकल का प्रयोग किया जाता है। जैसे, m (P), (P2) =Periodically; Autobiography= w(P),1: Conference Proceeding =p(P),(P2).

सर्वसामान्य एकलों का प्रयोग करते समय भाग- 1 

के अध्याय 2 का निरंतर अवलोकन करना पड़ता है क्योंकि इस अध्याय में प्रत्येक पक्ष-परिसूत्र के संबंध में दिशा निर्देश दिये गये हैं। (पृ. 1.43 से 1.46)
अध्याय 3 में काल एकलों का दो स्तरों पर विभाजन किया गया है। प्रथम स्तर कलैण्डर पर आधारित समय को- जैसे, M=1800 से 1899 (उन्नीसवीं शताब्दी) तथा वितीय स्तर पृथ्वी की गति अथवा प्राकृतिक घटना चक्र पर आधारित काल को- जैसे n3 = Summer (ग्रीष्मकाल), d=Night (रात्रि) व्यक्त करता है। कलैण्डर पर आधारित काल को B.C. (ई.पू.) एवं A.D. (ई.) के रूप में भी व्यक्त किया गया है। जैसे, C=999 से 1 B.C.; D=1 से 999 A.D. इत्यादि।
अध्याय 4 में स्थान एकलों अर्थात् भौगोलिक विभाजनों का उल्लेख है। स्थान एकलों की भी दो स्तरों पर अनुसूचियां दी गई हैं; जैसे (S1) प्रथम स्तर विश्व के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से संबंधित हैं तथा (S2) द्वितीय स्तर पर प्राकृतिक विभागों का उल्लेख है। (S2) वितीय स्तर के एकलों का संशोधन कर दिया गया है तथा इनका संशोधित रूप परिशिष्ट (Annexure) के पृष्ठ 26 पर उपलब्ध है।
| अध्याय 5 में भाषा एकलों की अनुसूची उपलब्ध है। 'साहित्य' एवं 'भाषा शास्त्र' मुख्य वर्गों में भाषा का प्रयोग होता है तथा भाषा की एकल संख्या इसी अध्याय से प्राप्त की जाती है।

| अध्याय 6 में विभिन्न जाति एवं प्रकार के दशा संबंधों 

के लिये प्रयोग में लाये जाने वाले प्रतीकों का उल्लेख है। ये प्रतीक अन्तर्विषयी, अन्तर्पक्ष एवं अन्तर्पक्ति दशासंबंधों के विभिन्न प्रकारों के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं।
शेष अध्यायों-अर्थात् अध्याय 9a (Generalia Bibliography) से अध्याय Z (Law) तक-में सभी मुख्य वर्गों से संबंधित वर्गीकरण अनुसूचियां दी गई हैं। प्रत्येक मुख्य वर्ग के अन्तर्गत सर्वप्रथम उस मुख्य वर्ग का 'पक्ष-परिसूत्र (Facet Formula) दिया गया है। इसके बाद पक्ष परिसूत्र की मांग के अनुसार विभिन्न पक्षों से संबंधित एकल संख्याओं का क्रमशः उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इनके प्रायोगिक उपयोग संबंधी आवश्यक दिशा निर्देश दिये गये हैं। इन अनुसूचियों के प्रत्येक पृष्ठ को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक
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भाग में पहले (बायीं ओर) प्रतीक संख्या तथा उसके सामने उस प्रतीक संख्या से संबंधित पद (शब्द) का उल्लेख है। पक्ष परिसूत्र में मुख्य वर्ग के वर्गीकरण के लिये आवश्यक पक्षों का ही उल्लेख होता है। स्थान एवं काल पक्ष का प्रायः उल्लेख नहीं होता क्योंकि ये दोनों पक्ष सर्वसामान्य पक्ष होते हैं। इनका प्रयोग विशिष्ट विषय की मांग के अनुसार क्रमशः अध्याय 3 एवं अध्याय 4 के आधार पर कर लिया जाता है। उदाहरणार्थ -

अध्याय 92 के अन्तर्गत (पृष्ठ 2.30) Library Science (ग्रन्थालय विज्ञान) 

का पक्ष परिसूत्र इस प्रकार है: 2 [P]; [M] : [E] [2P] इस पक्ष परिसूत्र में तीन पक्षों का प्रयोग हुआ है; अर्थात् [P], [M] एवं [E]। तदानुसार इस पक्ष परिसूत्र से संबंधित एकल संख्याओं का ही उल्लेख इस मुख्य वर्ग में किया गया है। वर्गीकरण करते समय संबंधित पक्षों की एकल संख्या चुनकर उन्हें इस पक्ष परिसूत्र के क्रम में रखकर वर्गीक का निर्माण किया जाता है। 2.2.1 अनुसूचियों की अनुक्रमणिका एवं विशिष्ट अनुक्रमणिकायें अनुसूचियों की अनुक्रमणिका भाग 2 के अन्त में (पृष्ठ 2.124 से 2.172 तक) अनुसूचियों में प्रयुक्त संघटक पदों की अनुक्रमणिका का उल्लेख है। इसका व्यवस्थापन वर्णक्रम से है। इसके प्रायोगिक उपयोग का विस्तृत विवरण बाद में अनुच्छेद 7 - अनुक्रमणिका प्रायोगिक उपयोग के अन्तर्गत किया गया है। विशिष्ट अनुक्रमणिकायें उपर्युक्त अनुक्रमणिका के अलावा इस भाग 2 में उपयुक्त स्थानों पर निम्नलिखित विशिष्ट अनुक्रमणिकाओं का भी समावेश किया गया है: (i) अध्याय 4 = स्थान एकल के अन्त में (पृष्ठ 2.18 से 2.25 तक) स्थान एकल पदों से संबंधित 'भौगोलिक अनुक्रमणिका' दी गई है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। इसकी सहायता से किसी भी स्थान की एकल संख्या का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अध्याय = वनस्पतिशास्त्र के अन्त में (पृष्ठ 2.61 से 2.63 तक) वनस्पतियों के प्राकृतिक वर्गों के एकल पदों से संबंधित अनुक्रमणिका उपलब्ध है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। अध्याय K= प्राणिशास्त्र के अन्त में (पृष्ठ 2.73 से 2.78 तक) विभिन्न प्राणियों के प्राकृतिक वर्गों के एकल पदों से संबंधित अनुक्रमणिका उपलब्ध है। इसका व्यवस्थापन वर्णानुक्रम से है। 2.3 भाग 3 : वरेण्य ग्रन्थ व धार्मिक ग्रन्थ |

इस भाग में विविध प्रकार के वरेण्य ग्रन्थों एवं धार्मिक ग्रन्थों 

के बने बनाये वर्गीक दिये गये हैं। जैसे भारतीय विद्या (Indology), भारतीय धर्मों, दर्शन शास्त्र, आयुर्वेद, भाषा
शास्त्र, साहित्य समालोचन, अलंकार शास्त्र आदि के ग्रन्थ। इन ग्रन्थों का व्यवस्थापन संबंधित विषय या प्रकरण के अन्तर्गत वर्गीकों के अनुसार सहायक क्रम में किया गया है, जैसे- LBAyurveda System शीर्षक के अन्तर्गत आयुर्वेद के वरेण्य ग्रन्थों का। इन वर्गीकों का निर्माण वरेण्य ग्रन्थ विधि के अनुसार किया गया है। एक सामान्य श्रेणी के वर्गीकरणकार के लिये इन ग्रन्थों का वर्गीकरण करना सरल नहीं था। अतः रंगनाथन ने इस कार्य को इस प्रकार सरल बना दिया है। वरेण्य ग्रन्थों व धार्मिक ग्रन्थों के वर्गीकरण के लिये इस भाग का विशेष महत्व है।

2.3.1 अनुक्रमणिका : वरेण्य ग्रन्थ

वरेण्य ग्रन्थों व धार्मिक ग्रन्थों की उपर्युक्त अनुसूची वर्गीकों के अनुसार व्यवस्थित होने के कारण किसी विशिष्ट धार्मिक ग्रन्थ या वरेण्य ग्रन्थ को इस अनुक्रम में ढूंढना कठिन है। अत: इनकी अनुक्रमणिका इस अनुसूची के तुरन्त बाद पृष्ठ 3.54 से 3.126 तक दी गई है। यह अनुक्रमणिका लेखक के नाम एवं ग्रन्थ की आख्या के अनुसार वर्णानुक्रम में व्यवस्थित है। इस प्रकार किसी भी ऐसे ग्रन्थ का वर्गीक आसानी से ढूंढा जा सकता है।

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