अंकन के प्रकार (Type of Notation) विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम

अंकन के प्रकार (Type of Notation) विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम

अर्थात विषयों / प्रलेखों को सहायक अनुक्रम में व्यवस्थित करना है । अंकन के द्वारा प्रत्येक प्रलेख को एक वर्ग संख्या प्रदान की जाती है, जिसके अनुसार वर्गीकृत व्यवस्था यंत्रवत बन जाती है | इस व्यवस्था का लाभ यह है कि पाठक दवारा किसी प्रलेख के मांगे जाने पर उसे लाखों पुस्तकों के मध्य से तुरन्त निकाला जा सकता है और पाठक के द्वारा लौटाये जाने पर पुन: उसके निर्धारित स्थान पर रखा जा सकता है । 2. अंकन अपने क्रमसूचक मान (Ordinal Value) के आधार पर विषयों को समकक्ष एवं अधीनस्थ वर्गों में विभाजित कर, उनके विकास के प्रत्येक स्तर को प्रदर्शित करता है । 3. यह पद्धति की वर्णानुक्रम अनुक्रमणिका (Alphabetical Index) को कार्य शीलताप्रदान करता है, जिसके फलस्वरूप पद्धति में परिगणित वर्गों तक पहुंचा जा सकता है । 4. सूची के दो भागों-वर्णानुक्रम प्रसूची (Alphabetical Catalogue) तथा प्रसूची (Classified Catalogue) को कार्यशील बनाने का कार्य अंकन करता है ।
5. यह फलकों पर प्रलेखों की वर्गीकृत व्यवस्था को यंत्रवत बनाता है ।
6. अंकन वर्गीकरण पद्धति की अनुशूचियों के निर्माण तथा उनके भौतिक स्वरूप में अत्यधिक मितव्ययता प्रदान करता है ।। 7. अंकन अपने स्मृति सहायक (Mnemonics) गुण के कारण पुस्तकालयाध्यक्ष को वर्ग
एवं उसके विभाजन के अनुक्रम को याद रखने में सहायता प्रदान करता है ।
8. यह पुस्तक-संग्रह कक्षों का मार्ग दर्शन करने में सहायता करता है । अर्थात पुस्तक की वास्तविक स्थिति का पता चलता है । 9. आगम-निर्गम प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करने में सहायक होता है ।
10. प्रलेखन सेवा को गति प्रदान करने में सहायक होता है ।
11. पुस्तकालय के विभिन्न आकड़े व रिकार्ड तैयार करने में अंकन की भूमिका होती है ।
12. अंकन का प्रयोग ग्रन्थ की पीठ (Spine), मुख पृष्ठ के पश्च भाग, लेवल, आदि पर लिखने हेतु किया जाता है । 3.3. अंकन के प्रकार (Type of Notation):
वर्गीकरण पद्धति की अंकन व्यवस्था को निर्मित करने के लिए वर्गाचार्य (classificationist) ने कितने प्रकार के व किस प्रकार के अंकों, चिन्हों इत्यादि का प्रयोग किया है, इसी आधार पर अंकन को प्रमुख रूप से दो भागों से बाँटा गया है ।

शुद्ध अंकन (Pure Notation):

जिस वर्गीकरण पद्धति अंकन व्यवस्था में केवल एक ही प्रजाति के अंकों (संख्यायें 1.....9, 0 या अक्षरों A-Z) का प्रयोग किया जाता है, उसे शुद्ध अंकन कहते हैं । शुद्ध अंकन का प्रयोग सर्वप्रथम मेलविल इयूई ने अपनी दशमलव पद्धति में (1876) किया था । राइडर्स इंटरनेशनल क्लैसिफिकेशन (Riders International Classification) में भी शुद्ध अंकन का प्रयोग हुआ है ।
शुद्ध अंकन के गुण (Qualities of Pure Notation): (i) यह बहुत सरल होता है । अत: इसे पढ़ना, लिखना व याद करना आसान है ।
साथ ही पाठकों एवं पुस्तकालय कर्मचारियों के समय एवं श्रम की बचत होती है । (ii) इसके दारा निर्मित वर्ग संख्याओं का क्रम निश्चित करना आसान है । इसके लिए
पुस्तकालय कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती ।। (iii) इसे लिखने व टाइप करने में त्रुटियों की सम्भावना कम रहती है । शुद्ध अंकन के दोष (Demerits of Pure Notation) (i) शुद्ध अंकन का सबसे बड़ा दोष इसके आधार का सीमित होना है । एक प्रजाति के
अंको के प्रयोग के कारण अंकन का आधार सीमित हो जाता है । (जैसे यदि हिन्दअरबी संख्याओं का प्रयोग हो तो आधार अंक केवल 10 होते हैं, या यदि रोमन बड़े अक्षरों का प्रयोग हो तो आधार केवल 26 अंकों का होता है, जिसके कारण शान जगत के प्रथम श्रेणी के वर्गो (First Order Arrays) को विभाजित करने के लिए कम ही अंक उपलब्ध हो पाते हैं ।
(i) सीमित आधार तथा एक ही प्रजाति के अंकों के प्रयोग के कारण वर्ग संख्या अत्यन्त लंबी हो सकती है । (ii) शुद्ध अंकन पर आधारित पद्धति में ज्ञान जगत के निरन्तर विकास के कारण नवउत्पन्न विषयों को समाविष्ट करने की क्षमता का अभाव होता है । शुद्ध अंकन पर आधारित पद्धति में विधियों (Devices) का प्रावधान भी नहीं हो पाता है । मिश्रित अंकन (Mixed Notation) जिस वर्गीकरण पद्धति की अंकन व्यवस्था में कई प्रकार के अंकों, प्रतीकों व चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उसे मिश्रित अंकन कहा जाता है | वर्गीकरण में मिश्रित अंकन के प्रथम समर्थक ई.सी. रिचार्डसन थे । रिचार्डसन ने मिश्रित अंकन का सिद्धान्त प्रतिपादित कर इसकी उपयोगिता बताते हुए कहा कि प्रत्येक वर्गीकरण (पद्धति) को कभी न कभी मिश्रित अंकन प्रयोग करना ही पड़ेगा । ब्लिस भी मिश्रित अंकन के ही समर्थक थे तथा अपनी पद्धति का आधार भी मिश्रित अंकन ही बनाया । सेयर्स ने वर्गीकरण के उपसूत्रों में एक शुद्ध अंकन का उपसूत्र भी प्रतिपादित किया था किन्तु वे मिश्रित अंकन के प्रबल समर्थक थे | रंगनाथन की दवबिन्दु पद्धति (1933), लाईब्रेरी ऑफ कांग्रेस क्लैसिफिकेशन पद्धति (1904),

 ब्राउन की विषयात्मक पद्धति (1906), 

ब्लिस की ग्रंथात्मक पद्धति (1935) आदि मिश्रित अंकन के ज्वलन्त उदाहरण हैं ।
मिश्रित अंकन के गुण (Qualities Mixed Notation) (i) विभिन्न प्रकार के अंकों, प्रतीकों व चिन्हों के प्रयोग के कारण मिश्रित अंकन का | आधार विस्तृत होता है । अत: ज्ञान जगत के प्रथम श्रेणी (First order arrays)
के वर्गों को पृथक-पृथक अंक प्रदान करना सम्भव है ।। (ii) विस्तृत आधार के कारण वर्ग संख्या छोटी बनती है ।। (iii) विभिन्न प्रकार की विधियों (Devices) के प्रावधान के कारण पंक्ति एवं श्रृंखला एकलों में ग्राह्यता का गुण उत्पन्न होने से ज्ञान जगत के विषयों का सूक्ष्म वर्गीकरण सम्भव है । मिश्रित अंकन के दोष (Demerits of Mixed Notation) (i) शुद्ध अंकन की तुलना में यह जटिल होता है, अत: इसे लिखना, बोलना व याद रखना अपेक्षाकृत कठिन होता (ii) मिश्रित अंकन में वर्गों का क्रम जानना कठिन होता है । (iii) मिश्रित अंकन क्रमदर्शक मूल्य (Ordinal Value) को समझकर फलकों से पुस्तकें | निकालना तथा पुन: व्यवस्थित करना एक जटिल कार्य है । 4.4 अंकन में प्रयुक्त होने वाले अंको / प्रतीकों के प्रकार (Species of Digit / Symbols Used in Notation) अंकन व्यवस्था (Notation system) के निर्माण के लिए निम्न प्रकार के, चिन्हों, प्रतीकों इत्यादि का प्रयोग किया जाता है:
1. हिन्द-अरबी अंक (Indo-Arabic numerals) 1 से 9 तथा 0 2. रोमन-दीर्घ अक्षर (Roman Capital Letter): A से Z 3. रोमन लघु अक्षर (Roman Small Letter). a से z 4. ग्रीक अक्षर (Greek Letter) जैसे- A 5. संकेतक अंक (Indirect Digits) जैसे- , ; : . ' ( ) इत्यादि

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