Tuesday, June 23, 2020

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नाचें ज़रा झूमकर

राजस्थान का पारंपरिक कालबेलिया नृत्य देखकर आपके मुंह से यही षब्द निकलेंगे ‘भई वाह, क्या ख़ूब।’ डाॅ देवदन्̀ा षर्मा हमें इस कला एवं इसमें पारंगत प्रसिद्ध कलाकार के बारे में बता रहे हैं।

सतरंगी संस्कृति में रची-बसी, धरती के गर्भ से निकली और ख़्वाजा के आषीर्वाद से पुनर्जीवित राजस्थान की माटी की बेटी गुलाबो एक ऐसी लोक नृत्यांगना हैं, जिन्होंने अपने विलक्षण नृत्य से न केवल कालबेलिया नृत्य को प्रसिद्धि के षिखर पर पहुंचाया अपितु कबीले से निकालकर इस नृत्य को अंतरराश्टंीय स्तर पर प्रतिश्ठित किया है। पुश्कर के गुलाब की तरह अपने नृत्य की सुगंध से देष-विदेष के मंचों को महकाया है। साथ ही इस लोकनृत्य को मंच का आकर्शण बनाया है। कालबेलिया वेष-भूशा में सुसज्जित गुलाबो जब नृत्य करती हैं तो रबड़-सी लचकती, सांप-सी बल खाती और तेज़ी से चक्कर खाती फ़िरकी-सी उसकी देह अवाक कर देने वाला ऐसा दृष्य उत्पन्न करती है, जिसे देखकर दर्षक अचंभित, रोमांचित और आनंदित हो उठते हंै।

कमाल की कला

‘काल’ का अर्थ सांप और ‘बेलिया’ का अर्थ दोस्त होता है। सांपों से मित्रता रखने और उसका संरक्षण करने के कारण इस जाति का नाम कालबेलिया पड़ा। राजस्थान में वैसे तो अनेक लोकनृत्य जैसे गेर, घूमर, चक्री, तेराताली, कच्छी घोड़ी, बम रसिया, चंग, गींदड़, भवाई, सहरिया, चरी और गवरी हैं किंतु इनमें कालबेलिया नृत्य अपने आप में अनूठा है। संगीत की लय पर इनका पद संचालन और हाथ की मुद्राएं अद्भुत दृष्य प्रस्तुत करती हैं। वहीं उनके नेत्र की भंगिमाएं एवं गर्दन को घुमाने का अंदाज़ भी देखते बनता है। ये नृत्यांगनाएं जब तेज़ गति से चक्कर खाती हैं तब वे ‘फ़िरकी’ अथवा चकरी की भांति घूमती दिखती हैं। उनका सिर एवं उनके षरीर के अन्य अंग अलग-अलग घूमते नज़र आते हैं। इनका षरीर ऐसे लचकता है मानो वे रबड़ से निर्मित हों। बीन की धुन पर उनकी लचकती काया ऐसी लगती है मानो नागिन बल खा रही हो। ये नर्तकियां अपनी आंखों की पुतलियों से चक्रासन की मुद्रा में नोट एवं अंगूठी उठाने जैसे करतब दिखाकर दर्षकों को हतप्रभ कर देती हैं।

परिधान का महन्̀व

कालबेलिया राजस्थान की घुमक्कड़ जाति है। यह जोधपुर, पाली, सिरोही, भरतपुर, अजमेर, कोटा, भीलवाड़ा, चिन्̀ाौड़गढ़, उदयपुर एवं बांसवाड़ा ज़िले में मिलती है। इस जाति के पुरुश धोती-कुर्ता, कानों में गोखरन और गले में ताइतिया पहनते हैं। वहीं कालबेलिया महिलाओं की वेषभूशा बहुत चटक एवं आकर्शक होती हैं। कढ़ाईवाला काला लहंगा, काली कुर्ती 1⁄4अंगरखी1⁄2, चमकीली तारों वाली पारदर्षी काली ओढ़नी, सिर पर पोपट, गले में बारला, नाक में भूली, कानों में लटवाले कर्णफूल, पांव में पावड़िये, चूड़ा, चोटी में आटी, लच्छी, फूंदी पहनती हैं। इनकी काली चमकीली वेषभूशा और मोती-सीप से बने रंग-बिरंगे आभूशण बहुत आकर्शक लगते हैं। इस काली वेषभूशा में नृत्य करते समय ये नर्तकियां वास्तव में नागिन प्रतीत होती हैं।

कला की सराहना

पुश्कर मेले से चर्चित और अमेरिका में भारत महोत्सव में कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुति से लोकप्रिय हुई गुलाबो अब तक देष-विदेष के अनेक कार्यक्रमों में प्रषंसा प्राप्त कर चुकी हंै। कालबेलिया नृत्य को अंतरराश्टंीय स्तर पर ले जाने वाली गुलाबो को पन̀श्री से सम्मानित किया गया है। इससे पूर्व वह राश्टंपति अवाॅर्ड, राजस्थान गौरव, अहिल्याबाई पुरस्कार और संस्कार भारती के कला साधक सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित की जा चुकी हैं। उन्होंने विदेषी संगीतकारों के साथ भी काम किया है। कालबेलिया नृत्य के उत्थान एवं प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय गुलाबो ऐसा स्कूल संचालित करना चाहती हंै, जहां वह लड़कियों को कालबेलिया नृत्य सिखा सके। उल्लेखनीय है कि राजस्थान का यह कालबेलिया नृत्य यूनेस्को की विष्वधरोहर सूची में है। कालबेलिया नृत्य को विष्वस्तर पर लोकप्रिय बनाने और लुप्त हो रही इस कला को बचाने के लिए किए गए उत्कृश्ट प्रयासों के लिए उन्हें ‘पन̀श्री’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।

महोत्सवों का आयोजन

आप राजस्थान का प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्य यहां आयोजित होने वाले विभिन्न महोत्सवों में देख सकते हैं। 1 से 3 दिसम्बर तक होने वाले कुम्भलगढ़ महोत्सव; 10 से 12 दिसम्बर तक होने वाले कोलायत मेले तथा 29 से 31 दिसम्बर में माउंट आबू में होने वाले विंटर महोत्सव में आप महिला कलाकारों को यह आकर्शक नृत्य करते हुए देख सकते हैं।

अनोखी गाथा

अजमेर ज़िले के कोटडा गांव में सपेरा परिवार में जन्मी गुलाबो की कहानी भी बड़ी रोमांचक है। गुलाबो ने बताया, ‘‘मेरा जन्म धनतेरस पर षाम सात बजे हुआ था। मेरा नाम धनवंती रखा गया। जाति की औरतें चाहती थीं कि मेरा जन्म न हो। किंतु मेरी माॅसी ने मुझे गोद ले लिया। बचपन में जब मैं बहुत बीमार रहने लगी तब मेरे पिता मुझे अजमेर षरीफ़ ले गए। वहां मुझे पीरबाबा के आषीर्वाद स्वरूप गुलाब मिला तो मेरे पिता ने मेरा नाम गुलाब रख दिया। आगे चलकर मैं गुलाबो कहलाने लगी।’’