Tuesday, June 23, 2020

Technology

गागर में भरा सागर

हमारे बीच कुछ ऐसी किताबें उपलब्ध हैं, जो ‘एक भारत-श्रेश्ठ भारत का संदेष’ देती हैं। बच्चों के लिए भी किताबों का ख़ज़ाना उपलब्ध है।ष्

‘‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’ ये पंक्तियां सफ़दर हाषमी ने लिखी थीं और सच ही तो लिखा था। न जाने कितने लंबे समय से किताबें हमारी मित्र हैं। उनका रंग-रूप बदला। हाथ से लिखी जाने वाली किताबों की जगह छापे खाने से निकली किताबों ने ले ली। किंतु उनसे हमारा रिष्ता नहीं बदला बल्कि और मज़बूत ही हुआ। किताबों के बड़े पैमाने के उत्पादन ने उन्हें ख़ास से आम तक पहुंचा दिया।

ज्ञान का स्रोत

किताबें न जाने कब से हमारी बेहतरीन दोस्त रही हैं। वे हमारा मनोरंजन करती हैं। हमें नई सूचनाएं देती हैं। हमारा ज्ञान बढ़ाती हैं। हमें वैचारिक रूप से समृद्ध करती हैं। हमें विचलित व प्रफुल्लित करती हैं तथा हमारी सोच को धार देती हैं। हमें हमारे अतीत, वर्तमान एवं भविश्य की बेहतर समझ प्रदान करती हैं। हमारे जीवन पथ का निर्माण करती हैं। हमें हमारी उलझनों से उबारती हैं। अंधेरे में रोषनी देती हैं। हताषा में हमारा सहारा बनती हैं। अर्थात किताबें वह सब करती हैं जो एक अच्छा व सच्चा साथी करता है या कर सकता है। किताबों की दुनिया का विस्तार निस्सीम और अनंत है। अगर आप एक नज़र डालें तो पाएंगे कि उनमें वह सब है जो आप चाहते हैं। बल्कि उससे भी बहुत अधिक है। बस आप डूबते जाएं, जितना गहरे डूबेंगे उतना ही आपको हासिल होगा। किताबों की विषेशता यह है कि आपको देती ही हैं, आपसे लेती कुछ भी नहीं है। उन जैसा निःस्वार्थ मित्र कोई हो ही नहीं सकता है। जिन लोगों ने अब तक किताबों को अपना दोस्त नहीं बनाया है, हो सकता है कि वे इस बात को उचित ढंग से न समझ सकें। किंतु आप किताबों से एक बार दोस्ती करके तो देखें। उनकी ओर हाथ बढ़ाने भर की देर है फ़िर तो वे स्वयं आगे बढ़कर आपको अपनी ओर खींच लिया करेंगी। आपको हर विशय और प्रत्येक वाद-विचार पर किताबें मिलेंगी।

अहम योगदान

पंैतीस से अधिक भाशाओं में बच्चे अपनी मातृभाशा में रंग, षब्द, आकृति, अंक और मानवीय संबंधों के महत्त्व को समझ सकें, इसलिए राश्ट्रीय पुस्तक न्यास ‘नेहरू बाल पुस्तकमाला’ प्रकाषित की है। इन किताबों में विविधता है, एकता का संदेष हैं, भावनाओं की खुषबू है, सूचना व ज्ञान के माध्यम से अपने पाठक को उल्लासित और उत्साहित करने की क्षमता है। बच्चा अपने प्रारंभ से ही पुस्तकों के साथ जीवन जीने को अपनी आदत बना ले, इस दिषा में उन बच्चों के लिए ऐसी कई किताबें प्रस्तुत की गई हैं। जो अभी स्कूल नहीं जाते या यों कहें कि जिन्हें अभी अक्षर ज्ञान ही नहीं है, उनके लिए प्रस्तुत पुस्तकों की श्रेणी में गुब्बारा, बस की सैर, बारात जैसी पुस्तकें बच्चों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं। इन किताबों में भावपूर्ण चित्र के साथ कथानक है, कोई षब्द नहीं है। चित्र देखकर बच्चे स्वयं अपनी एक कहानी गढ़ते हैं। उससे फिर नई कहानी बनाते हैं। देखते ही देखते उनकी कल्पना की उड़ान षब्द ज्ञान के करीब पहुंच जाती है। उसके बाद अन्य श्रेणी हैं, जिसमें अभी-अभी स्कूल जाने वाले बच्चों अर्थात् छः से आठ साल आयुवर्ग के बच्चों की पुस्तकें होती हैं। इनमें साठ से अस्सी प्रतिषत तक बहुरंगी चित्र और बहुत कम षब्द होते हैं। विद्यालय जाने वाला बच्चा मनोरंजक तरीके से वह सब कुछ सहजता से और बगैर किसी परीक्षा के भय से सीख जाता है, जो उसे पाठ्य पुस्तकें सिखाना चाहती हैं। नौ से ग्यारह साल के कुछ बड़े बच्चों की पुस्तकों की विशय वस्तु उनकी रुचि के अनुरूप बदलती जाती हैं- इनमें साहित्य, विज्ञान, प्रकृति जैसे विशयों पर सूचना या ऐसी कहानी होती है, जिसमें सीधे कोई संदेष नहीं होता लेकिन बाल-पाठक पुस्तक पूरी करते ही उसके उद्देष्य को समझ जाता है। इनमें षब्द बढ़ जाते हैं, लेकिन चित्रों के रंग वैसे ही चटक व आकर्शक होते हैं।

बदलता स्वरूप

किषोरावस्था की ओर बढ़ रहे 12 से 14 साल के बच्चों के लिए राश्ट्रीय पुस्तक न्यास की पुस्तकों में सूचना, रोचकता, ज्ञान का ख़जाना तो है ही, साथ ही रस्टी के कारनामे, स्वामी और उसके दोस्त जैसी कालजयी कृतियां भी हैं। बच्चों की पुस्तकांे की इस श्रंृखला में प्रख्यात षिक्षाविद् गिजुभाई बधेका की 100 कहानियों को ‘गिजुभाई का गुलदस्ता’ के तहत दस पुस्तकों में प्रस्तुत किया गया है। मूल गुजराती कहानियांे का हिंदी भावानुवाद तथा चित्रांकन देष के ख्यातिलब्ध कार्टूनिस्ट आबिद सुरती ने किया है। ये पुस्तकें बच्चों के साथ-साथ षिक्षकों, अभिभावकों को भी भा रही हैं। हिंदी के बड़े लेखकों विश्णु प्रभाकर, चित्रा मुद्गल, डाॅ. श्रीप्रसाद, हरीकृश्ण देवसरे, अमर गोस्वामी, प्रकाष मनु आदि द्वारा अपने लेखन काल के चालीस-पचास साल अवधि में विभिन्न दषकों में लिखी गई 10 कहानियांे के संकलन तथा विदेष में रह रहे हिंदी के लेखकों द्वारा उन देषों की बच्चों के लिए लोककथाओं का संकलन जैसी पुस्तकें राश्ट्रीय पुस्तक न्यास के बच्चों के प्रकाषन को देष ही नहीं दुनिया में विषिश्ट बनाती हैं। न्यास ने बस्तर, झारखंड, पूर्वोत्तर राज्यों की ऐसी आदिवासी बोली-भाशाओं में भी बच्चों की पुस्तकों के अनुवाद करवाए हैं जो लुप्त होने के खतरे से जूझ रही हैं। इतनी सारी बोली-भाशाओं में विभिन्न विशयों पर समान पठन-सामग्री उपलब्ध कराके न्यास की ‘नेहरू बाल पुस्तकमाला’ राश्ट्रीय एकता को बेमिसाल तरीके से बढ़ावा भी दे रही हैं।

पारंपरिक आधार

किताब के स्वरूप में हो रहे इस परिवर्तन से किताब के पारंपरिक अनुरागी अधिक प्रभावित नहीं हैं। उन्हें तो किताब को हाथ में लेकर, उसके पन्ने पलटकर अपार आनंद की प्राप्ति होती है। यह भावनात्मक मुद्दा है और कुछ हद तक वैयक्तिक रुचि का प्रष्न भी है। किताबों से हमारा रिष्ता बहुत पुराना है और जो परंपरावादी हैं वे अगर इस रिष्ते में किसी भी तरह का बदलाव देखने को तैयार नहीं हैं तो उनकी इस भावना का भी पूरा आदर किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि दुनिया में बहुत सारी बातें हमारी इच्छा के विरुद्ध भी होती हैं। ई-बुक को आना है तो वह आकर रहेगी। आप उसे अपनाते हैं या नहीं यह आपकी इच्छा है। भोज-पत्र, ताड़-पत्र और हस्तलिखित पुस्तकों से अगर हम आज की मुद्रित किताबों तक आए हैं और यह यात्रा यहीं तो नहीं थम सकती है। इसे तो आगे बढ़ना ही है। आप उसे अपनाते हैं या नहीं यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता है।