Tuesday, June 23, 2020

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मन से जुड़ी भाषा

अलका कौषिक का मानना है कि डिजिटल प्लेटफाॅर्म पर हिंदी को बढ़ावा देने से निस्संदेह यह लोकप्रिय भाशा बन गई है।हर वर्श 14 सितम्बर को हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। इस विषेश दिन विभिन्न संस्थानों एवं संगठनों में हिंदी से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा पूरे देष में हिंदी प्रोत्साहन सप्ताह मनाते हैं। अधिकतर विद्यालयों में भी हिंदी में प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इतना ही नहीं अब तो मोबाइल ऐप और वेबसाइटों के माध्यम से भी आमजन से जुड़ी इस भाशा को अंतरराश्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में सफलता मिल रही है।

भाशा का महत्त्व

हिंदी भारत में सबसे अधिक बोले जाने वाली भाशा है। इसे राजभाशा का दर्जा प्राप्त है। 14 सितम्बर, 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाशा के पद से सुषोभित किया गया था। हिंदी के महत्त्व को बताने और इसके प्रचार-प्रसार के लिए राश्ट्रभाशा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्श 14 सितम्बर बतौर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसा नहीं है कि हिंदी को स्वतंत्रता के बाद राजभाशा बनाने की पहल की गई थी अपितु हिंदी को स्थापित करना और इसे विषाल भारत भूमि की गौरवषाली भाशा बनाना तो महात्मा गांधी का सपना था। सन 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में भारत के राश्ट्रपिता ने ही हिंदी भाशा को राश्ट्रभाशा बनाने की पहल की थी। गांधीजी ने हिंदी को भारत के आमजन की भाशा भी बताया था। स्वतंत्र भारत की राजभाशा कौन सी हो, इस प्रष्न के उत्तर में 14 सितम्बर, 1949 को काफ़ी विचार-विमर्ष के पष्चात यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान में अंगीकार किया गया और बताया गया कि देष की राजभाशा हिंदी तथा लिपि देवनागरी होगी। चूंकि यह निर्णय 14 सितम्बर को लिया गया था, इसी कारण यह दिन हिंदी दिवस घोशित किया गया।

जुड़ने लगे सभीहम मानते हैं कि हिंदी एक भाशा न होकर पूरे भारत को एक स्वर में जोड़ने वाली कड़ी है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय यह हिंदी की ही षक्ति थी जिसने समस्त देष को एक सूत्र में पिरोया था। आंदोलन को एक नई दिषा दी थी। कौन भूल सकेगा नेताजी के उद्धोश को, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।’ इसने हज़ारों लोगों को स्वतंत्रता के यज्ञ के आहुति देने के लिए प्रेरित किया। यह किसी भाशा की ही षक्ति हो सकती है जो इतिहास बदल सकती है। भाशा हमेषा ही देष की संस्कृति का परिचायक होती है। वह देष की छवि को वैष्विक स्तर पर प्रस्तुत करती है। जिस देष की अपनी कोई भाशा न हो, वह कितना निर्धन होगा, इसकी कल्पना करना भी दुरुह है। भाशा राश्ट्रीय एकता का पर्याय होती है। भारत के संदर्भ में राश्ट्रीय भाशा के लिए हिंदी के महत्त्व का बखान बहुत से लोगों ने किया है परंतु षायद ही कोई यह बता पाया हो कि यदि हिंदी इतनी ही ज़रूरी है तो उसके लिए एक विषेश दिवस मनाने की आवष्यकता क्यों पड़ती है? 

हमें हिंदी को एक दिवस से बढ़कर उसकी महत्ता को स्वीकार करना होगा तथा उसके वृहद महत्त्व को अपनाना होगा। हिंदी उतनी दयनीय नहीं है जितना उसे बताया जाता है। कुल मिलाकर हिंदी अपनी विषिश्ट स्वीकार्यता के चलते उस मुकाम को प्राप्त करने की राह पर अग्रसर है जिसकी सभी को चाह है। आज हिंदी की किताबें बिक रही हैं। इन किताबों को पढ़ने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। नवीनतम तकनीक के माध्यम से हिंदी नए स्वरूप में आ रही है। हिंदी फ़िल्में दुनिया भर में देखी जा रही हैं। हिंदी फ़िल्मों के नायक और नायिकाएं वैष्विक स्तर पर नाम कमा रहे हैं। हर भाशा और हर देष की फ़िल्में हिंदी में अनुवादित होकर आ रही हैं। प्रष्न यह भी है कि जो भाशा इतनी विषाल और वृहद हो, क्या वह एक दिन में सीमित की जा सकती है? क्या उसके अस्तित्व को केवल एक ही दिन तक सीमित कर देना ही उचित होगा? ऐसे कई प्रष्न हैं जिनके उत्तर तलाषने की आवष्यकता है! आज हर कोई जान गया है कि यदि किसी को भारत में कारोबार करना है, अपनी जगह बनानी है तो उसे हिंदी की षरण में आना ही होगा। और हम उसे एक दिन में समेटने की बात करते हैं।

सुधार के प्रयासकिसी भी राश्ट्र की पहचान उसकी भाशा और संस्कृति ही होती है। समस्त विष्व में हर एक देष की अपनी एक भाशा और संस्कृति है जिसकी छांव में उस देष के लोग पले-बड़े होते हैं। यदि कोई देष अपनी मूल भाशा को छोड़कर दूसरे देष की भाशा पर आश्रित होता है तो उसे सांस्कृतिक रूप से गुलाम माना जाता है। जिस भाशा को लोग पैदा होने से लेकर जीवन भर बोलते हैं लेकिन आधिकारिक रूप से दूसरी भाशा पर निर्भर रहना पड़े तो कहीं न कहीं उस देष के विकास में दूसरे देष की अपनाई गई भाशा ही सबसे बड़ी बाधक बनती है। हमारे देष की मूल भाशा हिंदी है। किंतु भारत में अंग्रेज़ों की गुलामी के बाद हमारे देष की भाशा पर भी अंग्रेज़ी का आधिपत्य स्थापित हो गया। भारत देष तो स्वतंत्र हो गया परंतु अंग्रेज़ी भाशा का प्रभाव आज भी कायम है। अकसर अपने देष के लोग यह कहते हैं कि हमारी हिंदी थोड़ी कमज़ोर है। ऐसा कहने का तात्पर्य यही होता है कि हिंदी के मुकाबले उनकी अंग्रेज़ी अधिक अच्छी है। यदि वह भूल से यह कह दे कि उसकी अंग्रेज़ी कमज़ोर है तो दूसरे उसे कम पढ़ा-लिखा समझेंगे।

आने लगा बदलाव

अंतरराश्ट्रीय स्तर पर विदेषियों में हिंदी भाशा सीखने और जानने वालों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर हमारे यहां तस्वीर कुछ भिन्न है। यद्यपि हमारी राश्ट्र भाशा हिंदी है परंतु हमारा चिंतन आज भी विदेषी है। वार्तालाप करते समय हम अंग्रेज़ी का उपयोग करने में गौरव समझते हैं। भले ही अषुद्ध अंग्रेज़ी हो। हमें इस मानसिकता का परित्याग करना चाहिए और हिंदी का प्रयोग करने में गर्व अनुभव करना चाहिए। ऐसा हो भी रहा है, सरकारी कार्यालयों,बैंकों इत्यादि में हिंदी का उपयोग व्यापक स्तर पर होने लगा है।

सार्थक परिणाम

राश्ट्रीय व अंतरराश्ट्रीय स्तर पर पत्र-व्यवहार हिंदी में ही होने चाहिए। विद्यालयों में छात्रों को हिंदी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। राश्ट्रीय एकता में भी हिंदी बहुत सहयोगी है। विभिन्न जातियों, धर्मावलंबियों और भाशा-भाशियों के बीच एकता स्थापित करने का एक सबल साधन भाशा ही होती है। देष की बहुसंख्यक आबादी हिंदी बोलती है, ऐसे में हिंदी भाशा में एकता स्थापित करने की अद्भुत षक्ति है। प्राचीनकाल में जब विभिन्न मत-मतांतरों के मानने वाले लोग थे, उन्होंने संस्कृत के माध्यम से एकता स्थापित की थी। उस समय बहुसंख्यक लोग संस्कृत बोलते थे। आज जब हिंदी संपूर्ण भारत में बोली जाती है, समझी जाती है तो राश्ट्रीय एकता और राश्ट्र के विकास में इसकी अहम भूमिका होगी। भारत महाषक्ति बनने के मार्ग पर अग्रसर है और इसके पीछे उसकी भाशा का भी अहम योगदान है। विभिन्न प्रकार की जानकारियांे को अपनी भाशा में पाना अब संभव है। न केवल देषी कंपनियां अपितु विदेषी कंपनियां भी डिजिटल प्लेटफाॅर्म पर हिंदी को न केवल अपना रही हैं बल्कि उसका प्रचार-प्रसार भी कर रही हैं।