Saturday, October 17, 2020

महिला सषक्तिकरण एवं दलित महिलाओं की स्थितिः चुनौतियाँ एवं समाधान

 महिला सषक्तिकरण एवं दलित महिलाओं की स्थितिः चुनौतियाँ एवं समाधान

भारत में स्वतन्त्रता मिलने के पहले, मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं थी। स्वतन्त्रता के बाद संविधान में किये गये अनेक प्राविधानों के जरिये महिलाओं की स्थिति में क्रमशः गुणात्मक सुधार अवश्य हुआ है परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में अब भी वंचित समुदाय की महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आ सका है। उनकी कमजोर स्थिति के अनेक कारण हैं विशेषतः शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, राजनैतिक एवं आर्थिक भागीदारी आदि की असमानता के कारण उनकी स्थिति निम्नतर बनी हुई है। महिला सशक्तिकरण की पहल सर्वप्रथम नैरोबी में सन् 1985 में आरम्भ हुई। इसके बाद विश्व के अनेक भागों में इस पहल ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। वस्तुतः महिला सशक्तीकरण का सामान्य अर्थ है- महिला को शक्तिसम्पन्न बनाना, परन्तु पूर्ण रूप से इसका अभिप्राय सत्ता-प्रतिष्ठानों एवं जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की सुनिश्चित समान भागीदारी से है। निर्णय लेने की क्ष़्ामता सशक्तिकरण का एक बड़ा मानक कहा जा सकता है। इसके फलस्वरूप महिलाओं को वैधानिक, राजनैतिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में पुरूषों के बराबर निर्णय लेने की स्वतन्त्रता से है।

भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अनेक प्रयास किये गये हैं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं-

1. संविधान में 93वें एवं 94वें संशोधन के द्वारा ग्राम पंचायतों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित की गई हैं किन्तु कुछ राज्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत या इससे अधिक भी है। उदाहरणार्थ बिहार में महिलाओं की भागीदारी लगभग 54 प्रतिशत है।

2. महिलाओं को निर्णय लेने का प्रभावी अधिकार और आर्थिक, सामाजिक तथा नागरिक स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है।

3. महिलाओं को सही अर्थों में सशक्त और समर्थ बनाने के लिये यह आवश्यक है कि सबसे पहले उन्हें घरेलू मामले में निर्णय का अधिकार मिले तथा परिवार या कार्यस्थल पर भी उन्हें पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त हो।

महिला सशक्तीकरण का सबसे व्यापक तत्व है उन्हें सामाजिक पद, प्रतिष्ठा और न्याय प्रदान करना। महिला सशक्तीकरण के प्रमुख लक्षण हैं- शिक्षा, सामाजिक असमानता और स्थिति बेहतर स्वास्थ्य, आर्थिक अथवा वित्तीय सुदृढ़ता और राजनीतिक सहभागिता।

प्रस्तुत आलेख का मुख्य उद्देश्य वंचित समुदाय की महिलाओं विशेषकर दलित महिलाओं के सशक्तीकरण की प्रक्रिया को जानना तथा उन कारकों की पहचान करना है जो दलित महिलाओं के विकास में बाधक हैं और ऐसे कारकों की भी पहचान करना जिसके कारण उनकी स्थिति सुदृढ़ की जा सके।

महिला सषक्तीकरण का अभिप्राय

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। स्वतन्त्रता के बाद लगभग छह दशकों में भारतीय समाज में अनेक परिवर्तन हुए जिसमें महिलाओं की स्थिति में भी थोड़ा सुधार हुआ किन्तु वंचित समुदाय विशेषकर दलित महिलाओं की स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है। भारत के लोकतान्त्रिक संविधान में अनेक मौलिक अधिकार एवं मानव अधिकार महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किये गये। परिणामस्वरूप नागरिकों को मिले समान अधिकारों के साथ ही भारतीय महिलाओं को समान शैक्षिक अवसर तथा सम्पत्ति और विरासत में बराबर का अधिकार मिला जिससे सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्तरों पर महिलाओं का उल्लेखनीय विकास तथा सशक्तीकरण हो सका।

पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान ने न केवल महिला सशक्तीकरण के लिये अवसर उपलब्ध कराया बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता में वृद्धि के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। आरक्षण से अभिप्राय समाज में शोषण व असमानता का शिकार हो रही जनसंख्या को संरक्षणात्मक अवसर देना है जिससे वे भविष्य में निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनें और कालान्तर में स्वयं को लोकतांत्रिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण एवं सक्रिय हिस्सा बनें। महिलाओं में जागरूकता लाने के अनेक उपाय किये गये हैं ताकि गरिमापूर्ण जीवन के लिए उनमें क्षमता निर्माण किया जा सके। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अनेक कार्य किये हैं जैसे- कानूनी जागरूकता, पारिवारिक महिला लोक अदालतें और विचार गोष्ठी/कार्यशाला/सलाह मशविरा का आयोजन इत्यादि। समाज में कन्या भू्रण हत्या जैसी अमानवीय प्रथा को रोकने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये ताकि इस तरह की बुराई एवं महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध को रोका जा सके। कन्या भ्रूण हत्या के अलावा महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बाल विवाह, दहेज उत्पीड़न एवं बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए समय-समय पर आयोग ने अपनी भूमिका कर निर्वहन बहुत ही संवेदनशीलता के साथ किया है।

भारत में दलित महिलाओं के अधिकार

भारतीय संविधान के द्वारा दलित महिलाओं को पुरुषों के ही समान अनेक अधिकार प्रदान किये गये हैं जो इस प्रकार हैंः

1. अनुच्छेद-14 में प्रावधान है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समता एवं कानून के संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता।

2. अनुच्छेद-15 में समानता की अवधारणा का प्रवर्तन इस ढंग से है कि यह अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की परिस्थितियों से निश्चित रूप से संबंधित है-राज्य, धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान व इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

3. अनुच्छेद-16 में सरकारी नौकरियों में समान अवसर प्रदान करने के साथ-साथ आरक्षण की भी व्यवस्था की गयी है।

4. जातिगत आधार सामाजिक ढांचे में अस्पृश्यता के रूप में सिर पर मैला ढोना एक अत्यन्त अनादरपूर्ण कृत्य है।

5. जातिगत आधार पर सामाजिक ढांचे में अस्पृश्यता के रूप में सिर पर मैला ढोना एक अत्यन्त अनादरपूर्ण कृत्य है। अनुच्छेद-17 के अनुसार अस्पृश्यता का उन्मूलन हो चुका है तथा इसका किसी भी रूप में प्रचलन निशिद्ध है। अस्पृश्यता से आर्विभूत किसी भी निर्योग्यता के प्रवर्तन को अपराध बना दिया गया है तथा कानून के अनुसार दण्डनीय बनाया गया है।

6. अनुच्छेद-46 में राज्य के नीति निदेशक तत्व के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि राज्य विशेष देखभाल द्वारा कमजोर वर्गों तथा विशेषकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के शैक्षणिक तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा तथा सामाजिक अन्याय एवं शोषण के विरुद्ध हर तरह से रक्षा प्रदान करेगा। सुनियोजित हिंसा भारतीय समाज का विशिष्ट लक्षण रहा है। जातिगत हिंसा की शिकार दलित महिलाओं को उनकी सुरक्षा के लिए संवैधानिक अधिकारों के अतिरिक्त राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक अधिकार दिये गये हैं। उदाहरणस्वरूप-सन् 1998 में ही आन्ध्र प्रदेश में देवदासी प्रथा के विरुद्ध कानून बनाया गया था जिसका नाम आन्ध्र प्रदेश देवदासी निरुद्ध अधिनियम, 1988 है और इसी प्रकार अनुसूचित जाति एवं जनजाति; अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 सन् 1996 में इस अधिनियम को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए संशोधित किया गया और इसे नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम का नाम दिया गया। कालान्तर में जब दलितों के विरुद्ध अत्याचार बढ़ गए तथा अनुसूचित जातियों व जनजातियों के सदस्यों के ऊपर शारीरिक हिंसा, सामूहिक हत्या, बलात्कार, आगजनी इत्यादि गम्भीर प्रहारों के रूप में बर्बरताएं बढ़ गयीं तो सुरक्षा हेतु विशेष कानून पारित किया गया जिसे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति; अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के नाम से जाना जाता है। इसके तहत कठोर दण्डात्मक कार्यवाही का प्रावधान किया गया है जिससे दलितों के विरुद्ध भय का संचार तथा अत्याचार न हो। इसी प्रकार अस्पृश्यता प्रचलन अधिनियम, 1955, संविधान के अनुच्छेद 17 की ध्येय पूर्ति के लिए अधिनियमित किया गया। हाथों से मानवीय मल की सफाई तथा जलविहीन शौचालयों के निर्माण; निषेध अधिनियम, 1993 का निर्माण कर दलित महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए प्रयास किया गया।

महिला सषक्तिकरण एवं मानवाधिकार

मानव के सर्वांगीण विकास के लिए दिये गये अधिकार मानवाधिकार कहलाते हैं। दरअसल से अधिकार व्यक्ति में जन्म से ही अन्तर्निहित होते हैं। मानव अधिकार तथा मूल स्वतन्त्रतायें मानवीय गुणों के विकास तथा संबंधित आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सहायक होती है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अत्याचार एवं अन्य अमानवीय कृत्यों के विरुद्ध अनेक प्रयास किये गये जिसके अन्तर्गत मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा पत्र सन् 1948, नस्ली भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय अधिनियम 1965, महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय 1979, नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1966 तथा अन्य अनेक अन्तर्राष्ट्रीय घोषणाओं एवं प्रसंविदाओं के माध्यम से विश्व के प्रत्येक मनुष्य को मानवाधिकार प्रदत्त किये गये है। सभी राष्ट्रों का यह मौलिक तथा नैतिक कर्तव्य है कि वे सभी स्त्री-पुरूषों को समान अधिकार प्रदान करें तथा उनकी रक्षा करें। यद्यपि भारतीय संविधान ने स्त्रियों को पुरुषों के तुल्य मूल अधिकार प्रदत्त किये हैं तथा सदियों से शोषित महिलाओं को समान स्तर पर लाने हेतु विशेष उपबन्ध किये हैं जिस कारण आज महिलाओं ने शिक्षा के माध्यम से अपनी बुद्धिमत्ता एंव दक्षता को प्रमाणित कर दिखाया है और जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह शिक्षा, सरकारी सेवा, व्यवसाय या राजनीति हो अभूतपूर्व प्रगति की है। परन्तु यद्यपि आज के नवीन युग में भी स्त्रियों के प्रति भेदभाव एवं हिंसा की घटनाएँ देखने-सुनने को मिल जाती है। पारम्परिक समुदाय में स्त्रियों के साथ आज भी पारम्परिक तरीके से भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है तथा उनके मानवाधिकारों की उपेक्षा की जाती है। भारतीय समाज में आज भी स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक तथा पुरुषों से निम्न माना जाता है।

भारत में दलित महिलाओं की स्थिति

आर्थिक विषमताएँ तथा दलित महिला के मानव अधिकार मंे निकट का संबंध है। भारतीय समाज में दलित महिला की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय है। आर्थिक स्तर पर देखा जाए तो दलित भूमिहीन हैं और पर्याप्त लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं खेतिहर-मजदूर हैं जिनकी दैनिक मजदूरी इतनी कम है कि पर्याप्त जीविकोपार्जन उनके लिए अत्यन्त कठिन है। चूँकि कृषि कार्य केवल अल्प समय/मौसमी एवं प्रकृति पर निर्भर हैं इसलिए अधिकतर समय ये दलित महिलाएं बेरोजगार ही रहती हैं और आर्थिक तंगी तथा गरीबी की मार झेलती रहती हैं। यद्यपि भारत में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की साक्षरता बहुत कम लगभग 65.57 प्रतिशत है किन्तु जहाँ तक दलित महिलाओं की साक्षरता की बात आती है तो शिक्षा के क्षेत्र में इनकी साक्षरता मात्र 19.46 प्रतिशत ही है जबकि आजादी के लगभग 65 वर्ष बाद अनेक दावों के बावजूद उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में दलित महिलाएं अभी भी अत्यन्त पिछड़ी स्थिति में हैं।

दासी प्रथा-दलित महिलाओं के विरुद्ध एक सामाजिक कलंक

दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में देवदासी प्रथा आज भी प्रचलित है। सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था ऐसी है जहाँ दलित किशोरियों का देवता से विवाह कर दिया जाता है। कहीं-कहीं तो स्वयं माता-पिता भी इस प्रथा में सम्मिलित हो जाते हैं और इस प्रथा को बढ़ावा देते हैं। इस ’’दैविक-विवाह’’ को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है। इस प्रथा के अन्तर्गत सवर्ण जाति के सामंत तथा साहूकार दलित महिला का यौन शोषण करते हैं। आज भी यह प्रथा तेलंगाना और कर्नाटक के कई क्षेत्रों तथा महाराष्ट्र के पश्चिमी क्षेत्र जैसे कोल्हापुर, शोलापुर तथा धारवाड़ में प्रचलित है। देवदासी प्रथा एक ऐसी रूढ़िवादी प्रथा है जिसमें दलित कन्याओं को स्थानीय देवता को समर्पित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप दलित महिलाओं की मौन दासता बनी रहती है।

इस सामाजिक बुराई के अलावा मैला ढोने के प्रथा से भी दलित महिलाएं अत्यन्त पीड़ित हैं। सदियों से सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा अनेक ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में सदियों से प्रचलित हैं जहाँ आज भी दलित महिलाएं सिर पर मैला ढोती हैं और समाज की इस अमानवीय कुरीतियों को झेल रही हैं। जहाँ तक महिलाओं के प्रति अपराध की बात आती है दलित महिलाओं के खिलाफ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध अधिकांशतः कारित होते हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो, 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2012 ई0 में दलित महिलाओं के खिलाफ 1576 बलात्कार के मामले दर्ज किये गये जबकि इनके खिलाफ कारित बलात्कार के 5427 मामले लम्बित हैं।

निश्कर्श

स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान द्वारा अपनायी गयी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत सभी व्यक्तियों को समान अधिकार, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय व अवसर की समानता बिना किसी भेदभाव के प्रदान की गयी किन्तु सामाजिक व्यवस्था में अपेक्षित परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। निःसन्देह भारत सरकार ने समय के साथ-साथ अनेक कानूनों का निर्माण शोषित समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिये किया परन्तु कानूनांे का सही प्रवर्तन न होने के कारण आज भी दयनीय स्थिति बनी हुई है। बिना सामाजिक सहयोग के कानून प्रायः असहाय हो जाते हैं। अतः यदि महिलाओं या दलित महिलाओं को पूर्णरूप से सशक्त करना है तो उन्हें स्वयं आगे आना होगा तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा और साथ ही सरकार को भी इच्छाशक्ति दिखानी होगी ताकि जो भी अधिकार महिलाओं को विभिन्न कानूनों के अन्तर्गत दिये गये हैं उनके प्रवर्तन को सुनिश्चित कराया जा सके अन्यथा समस्त प्रक्रिया केवल कागजी होगी जो हमारे लक्ष्य से अत्यन्त दूर होगी।