Saturday, October 17, 2020

महिला सशक्तिकरण

 आज के माहौल में महिला सशक्तिकरण की बात करने से पहले हमें सवाल का जवाब ढूंढना जरूरी है कि क्या वास्तव में महिलायें अशक्त हैं? यदि अशक्त है तो इतने सारे संवैधानिक उपायों के बाद भी महिलाएं विकास की मुख्य धारा से क्यों नहीं जुड सकी? इतिहास गवाह है कि मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ताकतवर को ही अधिकार मिला है। धीरे-धीरे इसी सिद्धांत को अपनाकर पुरूष जाति ने अपने शारीरिक बनावट की फायदा उठाते हुए महिलाओं को दोयम दर्जे पर ला कर खड़ा कर दिया और औरतों ने भी उसे अपना नसीब व नियति समझकर, स्वीकार कर लिया। भारत में ही नहीं, दुनियाभर में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और शोषण की नीतियों का सदियों से ही बोलबाला रहा है। इतना जरूर कह सकते हैं कि मापदंड व तरीके अलग-अलग रहे हैं।

सीता से लेकर द्रौपदी तक को पुरूषवादी मानसिकता से दो-चार होना पड़ा। हर युग में पुरूष के वर्चस्व की कीमत औरतों ने चुकाई है। हमारे देश में देवी समान पुजनीय नारी के आदर और सम्मान में काफी गिरावट आई है।

विश्व की आबादी का एक चैथाई ग्रामीण महिलाएं एवं बालिकाएं हैं। लेकिन वे सभी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक सूचकांक के निम्नतम् पायदान पर हैं। आय, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता काफी कम है। दूसरी ओर ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के अवैतनिक सेवा कार्यों में उनका योगदान बहुत ज्यादा है।

साल 2011 में इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी महिलाओं के सशक्तिकरण पर जोर देते हुए कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की उम्मीद करना बेमानी है।

संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जहाँ-जहाँ महिलाओं की व्यापार और काॅरपरेट जगत में अहम भागीदारी रही है, वहाँ करीब 53ः ज्यादा लाभांश और करीब 24ः ज्यादा बिक्री दर्ज की गई। लेकिन, कुछ महिलाओं को ऊंचाई पर देख, हम अशिक्षित महिलाओं को नजर अंदाज नहीं कर सकते। हमारे देश में ऐसी अशिक्षित महिलाओं की संख्या ज्यादा है, जो आज भी गरीबी, कुपोषण और घरेलू हिंसा की शिकार हैं यही नहीं ये महिलाएं बेटी को जन्म देने के फैसले के लिए भी वे पुरूषों पर निर्भर हैं।

इसी साल संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव श्री बान की मून ने भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में महिलाओं की बराबर की भागीदारी पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि ग्रामीण महिलाओं और युवतियों की पीड़ा समाज की महिलाओं और लड़कियों को प्रतिबिम्बित करती है। अगर संसाधनों पर समान अधिकार हो और वे भेदभाव और शोषण से मुक्त हों तो ग्रामीण महिलाओं की क्षमता पूरे समाज की भलाई के स्तर में सुधार ला सकती है।

सही मायने में देखा जाए तो महिला सषक्तिकरण का अर्थ ही है महिला को आत्म-सम्मान देना और आत्मनिर्भर बनाना, ताकि वे अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकें।

वैसे तो सरकार, सार्वजनिक प्रशासन और अन्य व्यवसायों में महिलाएं पहले से कहीं अधिक अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्थिति बिल्कुल विपरीत हैं।

ऐसे में ‘गांवों का देश‘ कहे जाने वाले देश भारत को बहुत लम्बा सफर तय करना है ताकि महिलाएं और बालिकाएं अपने बुनियादी अधिकारों, आजादी और सम्मान का लाभ उठा सकें, जो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। इससे सिर्फ ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण ही नहीं बल्कि, इसके साथ-साथ सामाजिक विकास को भी नई गति मिलेगी।

बदलते समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो गृहस्थी के साथ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भी लोगों का विश्वास अब महिलाओं के प्रति बढ़ा है। आज महिला समूहों द्वारा उत्पादित खाद्य सामग्री के साथ दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएं राज्य की प्रायः हर छोटी-बड़ी दुकानों में देखने को मिल जाती है। बाजार में महिलाओं द्वारा निर्मित वस्तुओं को अब महत्व मिल रहा है।

भारत सरकार ने वर्ष 2001 को महिला सशक्तीकरण वर्ष (स्वशक्ति) घोषित किया और महिलाओं के सशक्तीकरण की नीति भी पारित की।

समाजिक सषक्तिकरण

16 दिसम्बर, 2012 को दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षीया छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म मामले को लेकर दिल्ली में जो विरोध-प्रदर्शन हुआ उसे ध्यान में रखकर दिल्ली सरकार ने महिलाओं के लिए एक विशेष हेल्पलाइन नंबर ‘181‘ शुरू किया जो सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय की निगरानी में काम कर रहा है। इस विशेष नंबर की शुरूआत करते हुए दूरसंचार मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने इस नंबर को पूरे देश में लागू करने की बात कही थी। जो महिलाओं के सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। देश के विभिन्न राज्यों में संचालित महिला हेल्पलाइन में प्राप्त शिकायतों के द्वारा हिंसा की शिकार महिलाओं तक पहंुचने की कोशिश की जाती है। समाज में पीड़ित महिलाओं को मनौवैज्ञानिक परामर्श भी दिया जाता है।

सामाजिक सशक्तीकरण के अंतर्गत उत्पीड़ित महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक पुनर्वास करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा जिला स्तर पर अल्पावास गृह की स्थापना की जा रही है। अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम, 1896 तथा हिंसा संरक्षण अधिनियम, 2005 के अनुसार महिलाओं एवं किशोरियों की खरीद-फरोख्त से बचाने तथा घरेलु हिंसा की शिकार महिलाओं को संरक्षण एवं सुरक्षा देना अल्पावास गृह का मुख्य उद्देश्य है। इसके अंतर्गत अभी हाल ही में बिहार सरकार ने विशेष रूप से कामकाजी महिलाएँ जिन्हें अपने कार्य के दौरान 5 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों को कार्यस्थल पर रखने में सुविधा होती है। जिनके परिवार में बच्चों की देखरेख करने वाला उनके सिवाय कोई नहीं है, राज्य सरकार ने वैसे बच्चों के लिए राज्य में 100 पालनाघर खोले हैं जिसमें स्वादिष्ट एवं पौष्टिक अल्पाहार, अन्य उपकरणों की व्यवस्था तथा खिलौने एवं खेलने के अन्य साधनों के साथ-साथ मनोरंजन का भी प्रावधान किया गया है।

महिलाओं में कानून का व्यावहारिक ज्ञान बढा़ने के लिए सामाजिक जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। नुक्कड़ नाटकों के जरिये सक्षम वातावरण के निर्माण के उद्देश्य से दहेज उत्पीड़न, टैªफिकिंग, बाल-विवाह, भ्रूण हत्या, कानूनी साक्षरता, आर्थिक स्वावलंबन के मुद्दे पर लोक कलाओं की प्रस्तुति करके महिलाओं को सामाजिक रूप से सशक्त किया जा रहा है।

षैक्षिक सषक्तीकरण

भारत के विकास में महिला साक्षरता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पिछले कुछ दशकों से ज्यों-ज्यों महिला साक्षरता में वृद्धि हुई है, भारत के विकास के पथ पर अग्रसर हुआ है। इसने ने केवल मानव संसाधन के अवसर में वृद्धि की है, बल्कि घर के आँगन से आॅफिस के कारीडोर के कामकाज और वातावरण में भी बदलाव आया हैं। महिलाओं के शिक्षित होने से न केवल बालिका-शिक्षा को बढ़ावा मिला, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास में भी तेजी आई है। महिला साक्षरता से एक बात और भी सामने आई है कि इससे शिशु मृत्युदर में गिरावट आ रही है और जनसंख्या नियंत्रण को भी बढ़ावा मिल रहा है हालांकि इसमें और प्रगति की गुजंाइश हैं।

आर्थिक सषक्तीकरण

स्वयं सहायता समूहों में कार्य करने के कारण महिलाओं के आत्मविश्वास, स्वाभिमान, आत्मा-गौरव इत्यादि में वृद्धि होती है क्योंकि घरेलु परिधि के बाहर एक समूह के रूप में छोटी-छोटी बचत इकट्ठी कर, ऋण लेकर, लघु उद्यम स्थापित कर समूह की बैठकों की कार्रवाई संचालित कर महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। स्वयं सहायता समूह के सदस्य के रूप में काम करने के कारण महिलाओं की स्वयं निर्णय लेने की शक्ति का विकास होता है। महिलाओं द्वारा बैंकों के साथ लेन-देन, कागजी कार्रवाई इत्यादि करने से उनमें आत्म-विश्वास पनपता है। समूह की गतिविधियों के संचालन, बैठकों में भाग लेने से महिलाओं की स्वनिर्णय की क्षमताओं का विकास होता है जिससे धीरे-धीरे परिवार और समुदाय में उनकी सो को आवाज मिलती है और समूह के सदस्य के रूप में महिलाओं की गतिशीलता बढ़ जाती है। घर की चार दीवारी में कैद रहने वाली महिलाएं इन समूहों के माध्यम से पंचायत संस्थाओं, बैंक, सरकारी तंत्र, गैर-सरकारी संगठनों, सूक्ष्म वित्त संस्थानों इत्यादि के साथ संपर्क में आती हैं जिससे उनके पास अधिक सूचना एवं संसाधन उपलब्ध होते हैं। सूचना एवं संसाधनों की उपलब्धता महिलाओं को सशक्त करती है। स्वयं सहायता समूह के सदस्य के रूप में महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर बनती हैं जिससे परिवार में उनकी स्थिति में सुधार होता है तथा इस प्रकार उपलब्ध धन का वे अपने निजी कार्य अथवा बच्चों की शिक्षा व स्वास्थ्य इत्यादि में उपयोग करती हैं। अध्ययनों से स्पष्ट है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं के साथ घरेलु हिंसा के मामले कम होते हैं। हमारे देश में प्रायः महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, पापड़ बनाने, अचार बनाने जैसे कई कार्य करती हैं किंतु इन्हीं कार्यों को स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बड़े पैमाने पर वणिज्यिक आधार पर किया जाता है। इन समूहों को सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों द्वारा कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाता है जिससे महिलाओं की स्वयं की व्यक्तिगत या सामूहिक शक्ति बेहतर करने की क्षमता का विकास होता हें

सांस्कृतिक सषक्तीकरण

महिला सशक्तीकरण के अंतर्गत महिलाओं के सांस्कृतिक सशक्तीकरण के लिए मुख्य रूप से मेला का आयोजन किया जाता है जिसका उद्देश्य परम्परागत कौशल तथा लोक चित्रकला, लोक नाट्यकला, लोकगीत आदि को जीवित रखना है। स्वयं सहायता समूह के द्वारा उत्पादित वस्तुओं का प्रदर्शन करना भी मेला का एक अहम उद्देश्य होता है। विलुप्त होती सांस्कृतिक परम्पराओं और इन कलाओं से जुड़े समुदायों के बीच कला की व्यावसायिक गुणवत्ता को बढाकर तथा आजीविका के साथ जोड़कर राष्ट्रीय पहचान स्थापित करना इस योजना का मुख्य लक्ष्य है।