Friday, December 7, 2018

कनिष्क के उत्तराधिकारियों के शासनकाल का एक संक्षिप्त विवरण दीजिए। कुषाण वंश का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है ?

कनिष्क के उत्तराधिकारियों के शासनकाल का एक संक्षिप्त विवरण दीजिए। कुषाण वंश का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है ?

Give a brief account of the reign of Kanishaka's successors. What is the Importance of Kushan dynasty in Indian history.
|
उत्तर–अधिकाँश विद्वानों का मत है कि कनिष्क प्रथम ने 23 वर्ष तक शासन किया और उसकी मृत्यु 101 ई. के लगभग हो गई । कनिष्क की मृत्यु के पश्चात् कुषाण वंश का गौरव क्षीण होने लगा अतः दुर्बल और अयोग्य शासकों के कारण कुषाण साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। कनिष्क के उत्तराधिकारी और राजत्व काल का विवरण निम्न है।

कनिष्क के उत्तराधिकारी (Successors of Kanishakas)


(4) संयुक्त शासन 

संयुक्त शासन प्रणाली भी कुषाण वंशीय शासन के पतन के लिए उत्तरदायी थी। अनेक मुद्रा रूपी साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि हुविष्क तथा कनिष्क द्वितीय ने संयुक्त रूप से शासन का संचालन किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि इस संयुक्त शासन में सम्भवतः परस्पर मतभेद बढ़े होंगे और शक्ति का विभाजन हो गया होगा। इस शक्ति विभाजन के फलस्वरूप कुषाण साम्राज्य की शक्ति क्षीण हो गई होगी। | (5) जुअन-जुअन जाति के आक्रमण कुछ विद्वानों ने उत्तर की जुअन-जुअन जाति के आक्रमणों को कुषाण जाति के पतन का कारण माना है। जुअन-जुअन जाति ने कनिष्क के उत्तराधिकारियों की अयोग्यता एवं दुर्बलता का लाभ उठाया । इसमें कोई सन्देह नहीं है। कि इस जाति के आक्रमणों से कुषाण शक्ति को काफी धक्का लगा होगा।

| (6) स्वदेशी जातियों के विद्रोह–

भारतीयों में स्वाधीनता की मनोवृत्ति भी कुषाण साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार थी। डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल के मतानुसार पंजाब तथा मध्य प्रदेश से कुषाणों की शक्ति को नष्ट करने का कार्यभार शिव, नागों ने सँभाला और उसे पूरा किया। इस वंश के राजा वीरसेन ने मथुरा, पद्मावती एवं कान्तिपुर से कुषाणों को खदेड़ दिया था और इसी उपलक्ष में भारशिव नागों ने दश अश्वमेघ यज्ञों का आयोजन किया था। इस प्रकार नागों ने कुषाणों को पराजित करके उनके साम्राज्य के अनेक प्रदेशों पर अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किये और वे दीर्घकाल तक भारतवर्ष के राजनीतिक क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण राजवंश बने रहे।
| यौधेय जाति ने भी कुषाण साम्राज्य के पतन में योगदान दिया। डॉ. ओझा लिखते हैं कि यौधेय जाति राजपूताना और दक्षिणी पूर्वी पंजाब में रहती थी तथा अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थी। कनिष्क ने इसे पराजित करके इसके प्रदेश पर अपना अधिकार कर लिया था। महाक्षत्रप रुद्रदामन प्रथम के समय इस जाति ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया जूनागढ़ अभिलेख से प्रकट होता है कि अपनी वीरता के कारण यह जाति समस्त क्षत्रियों द्वारा आदर की दृष्टि से देखी जाती थी परन्तु महाक्षत्रप रुद्रदामन प्रथम ने इसे पराजित कर दिया। अन्त में जब यौधेयों ने कुषाणों को निर्बल होते हुए देखा तो उन्होंने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए पुनः प्रयत्न आरम्भ कर दिये । मुद्रा साक्ष्य से प्रकट होता है कि इस बार उन्हें सफलता मिली और उन्होंने एक बड़े भू- प्रदेश से कुषाणों को मारकर भगा दिया।' डॉ. अल्टेकर के अनुसार यौधेय जाति ने सतलज और यमुना के बीच के प्रदेश से कुषाणों का आधिपत्य समाप्त कर दिया और उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपनी मुद्राओं का प्रचलन किया । इसके अतिरिक्त कुणिन्द, आर्जुनायन आदि जातियों ने भी यौधेयों की कुषाणों को भारत से भगाने में सहायता की थी । डॉ. अल्टेकर का मत है कि यौधेयों की मुद्राओं के ऊपर “यौधेय गणस्य जयः नामक उपाधि के पश्चात् ‘द्वि’ और ‘त्रि' शब्द मिलते हैं। इससे माना जा सकता है कि कुषाणों के विरुद्ध यौधेयों ने सम्भवतः कुणिन्दों और आर्जुनायकों के साथ मिलकर एक सँघ बनाया था। अपने इस विजेता संघ के सदस्यों की सूचना देते हुए ही यौधेयों ने अपनी नवीन मुद्राओं पर ‘द्वि’ और ‘त्रि' शब्द उत्कीर्ण कराये थे ।”

(7) साम्राज्य की विशालता 

कनिष्क द्वारा स्थापित इस कुषाण साम्राज्य की विस्तृता ही इसके पतन का मुख्य कारण बनी। ऐसे विशाल साम्राज्य को संगठित रखना कोई सुगम कार्य नहीं था कनिष्क के उत्तराधिकारी इसे संगठित एवं सुरक्षित नहीं रख सके । अतः कनिष्क की मृत्यु के पश्चात् ही इस साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया।

(8) ससेनियन वंश का उदय 

ईरान के ससेनियन वंश ने भी कुषाण साम्राज्य को प्रबल क्षति पहुँचाई । ससेनियन वंश के राजा अर्देसीर प्रथम ने वासुदेव द्वितीय से 238 ई. के लगभग बैक्ट्रिया द्वीप लिया था और बैक्ट्रिया में उसके गवर्नर ने कुषाण शाह और कुषाण शहंशाह की उपाधियाँ धारण की थी। 284 ई. के लगभग ससेनियन नरेश वरहरन द्वितीय ने अफगानिस्तान सीमा प्रान्त सीस्तान तथा मिन्ध पर भी अपने आधिपत्य की स्थापना कर ली । इस प्रकार ईरानी आक्रमणों ने भी कुषाण साम्राज्य के पतन में योगदान दिया।