Tuesday, June 23, 2020

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गणपति बप्पा मोरया!

सुनील मिश्र हमें भारत में गणेष चतुर्थी की परंपरा के बारे में विस्तारपूर्वक बता रहे हैं।
विष्व में भारत की प्रतिश्ठा अपनी धरोहरों और विरासत के साथ-साथ मानवीय चेतना और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की सन्निधि में सबसे अलग और उत्कृष्ट मानी जाती है। दुनिया के ऐसे अनेक देष हैं, जिसके नागरिक जो सैलानी के रूप में अनेकानेक देषों का भ्रमण करते हैं, उनके लिए भारत आने का एक बड़ा स्वाभाविक कारण यहां की विरासत और धरोहर का साक्षी होना है। हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और आध्यात्मिक दृष्टि तथा संस्कारों में वह षक्ति है, जिसे अनुभूत करके अनेक लोग हमारी संस्कृति और उसके वैभव से प्रभावित हुए हैं। ऐसे अनेक हैं जिनका प्रायः हमारे देष आना होता है और ऐसे भी अनेक हैं जिन्होंने अपना देष छोड़कर भारत को अपना देष और घर मान लिया है तथा यहीं संबंध और रिष्ते-नाते स्थापित किए हैं। हमारे पर्यटन स्थलों, ऐतिहासिक महलों, पर्व-उत्सवों, मेलों, तीज-त्योहारों का आकर्षण दुनिया के सिर चढ़कर बोला है। हमारे यहां प्रतिवर्ष इन उत्सवों और आयोजनों का जो आरंभ और प्रवाह मिलता है, उसमें गणेषोत्सव प्रमुख है। यह देष के कोने-कोने में मनाया जाता है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों और ग्रामीण अंचल तक गणेषोत्सवों की धूम देखी जाती है। गहरी हैं जड़ें

2019 का साल गणेष उत्सव की स्थापना का 127वां साल है। इस उत्सव को मनाने की परंपरा का सूत्रपात लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने किया था। उन्होंने अंग्र्रेज़ों के विरुद्ध एक ऐतिहासिक नारा, ‘‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे,’’ दिया था। परतंत्र भारत में आमजन को एकजुट करके अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जनमत तैयार करने के लिए जिस अहिंसक और सुसंस्कारित प्रतिवार को पहली बार स्थापित किया गया था, वह था गणेष उत्सव का आयोजन। तिलक ने 1893 में इसके आरंभ की घोशणा की थी। गणेष चतुर्थी का त्योहार, उनकी प्रतिमा की स्थापना करने और लगभग पंद्रह दिन उनके सान्निध्य में विभिन्न रचनात्मक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगोें का आमंत्रण और आपसी सद्भाव स्थापित करने में ऐसे प्रभाव का उपक्रम रहा कि जिसने फिर एक श्रद्धास्पद और आदरसम्मत सांस्कृतिक अनुश्ठान के रूप में अपनी यात्रा जारी रखी। इसका आरंभ भाद्रपद की चतुर्थी से तथा पूर्णता चतुदर्षी तक मानी गई है। इसी के अनुरूप गणेष स्थापना की जाती है। सावन की पहली फुहार और बरसात के आगमन के साथ ही मिट्टी षिल्प पर काम करने वाले कलाकार भारी संख्या में पूरे देष में अपना अस्थाई ठिकाना बनाकर प्रतिमा निर्माण के काम में जुट जाते हैं।

आमजन की आस्था

यह कितना स्फूर्तीदायक होता है, जिसे देखकर सभी चकित हो जाते हैं। धीरे-धीरे जब प्रतिमा अपना रूप लेती है तथा अपना आकार ग्रहण करती है तो आते-जाते लोग ठहरकर, ठिठककर, चकित होकर प्रतिमा को बनते देखते हैं और मुग्ध हो जाया करते हैं। वह दिन भी आता है जब लोग अपने संसाधनों से, अपनी क्षमताओं से, अपनी खुषी और उत्साह से गणेष प्रतिमा को अपने घर या सार्वजनिक उत्सव स्थल तक लेकर आते हैं, रास्ते भर नृत्य, संगीत, वाद्य और गणपति बप्पा मोरया की गूंज भारत की पर्व परंपरा के आकर्शण और उसके प्रति अगाध मानवीय निश्ठा को प्रकट करती है। चतुर्थी से चतुर्दषी तक स्थापित गणपति को उसी उत्सवप्रियता, भावनात्मकता और धूमधाम से विसर्जित किया जाता है और ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ का उद्घोश आकाष को जगा दिया करता है। श्री गणेष को बुद्धि का अधिपति कहा गया है। श्री गणेष के अनेक नाम है, गजानन, लम्बोदर, सुमुख, विनायक, विघ्नहर्ता, गणाध्यक्ष, गणपति, एकदंत आदि। देष के गुणी चित्रकारों और षिल्पकारों ने गणेष प्रतिमा अथवा चित्र का सृजन अनेक प्रकार से और अनूठी कल्पनाषीलता के साथ किया है।

कलाकारों के प्रिय

महाराश्ट्र के अलावा मध्य प्रदेष, आंध्र प्रदेष, कर्नाटक, उत्तर प्रदेष और गुजरात में भी कलाकारों ने अपनी सर्जनषीलता के आधार पर गणेष बनाए हैं। हम गणेष के व्यक्तित्व में एक असाधारण देवत्व की परिकल्पना करते हैं। परम पूज्य, प्रथम पूज्य, प्रत्येक मांगलिक अवसर पर प्रथम वंदना का उनका स्थान कालजयी और अक्षुण्ण है। बुद्धि के अधिश्ठाता और अधिपति के रूप में उनका मूषक अर्थात चूहे की सवारी करना कल्पना और अनुभूति में अलौकिक है। लेकिन इस बात को अनुभव किया जा सकता है कि एक ओर उनका वाहन जो बहुत चंचल और अस्थिर है जिसकी वाचालता तथा छिन्न-भिन्नता का स्वभाव एक बहुत अलग सा बोध कराता हो, उस पर बैठकर अपने आवागमन को सिद्ध करने वाले, सारे जगत को अपनी प्रथम पूज्यता का फल देने वाले गणेष स्वयं भारी-भरकम काया के साथ जिस असाधारण और अलौकिक मेधा के स्वामी हैं। उसके छोटे से छोटे कण से भी हिंद महासागर की तुलना नहीं की जा सकती। प्रकट अस्थिरता पर अन्ततः ज्ञान और बुद्धि के स्वामी ही स्थापित होकर उसको नियंत्रित कर सकते हैं यह गणपति या गणाध्यक्ष का महान अर्थ है।