Tuesday, June 23, 2020

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समाज का आइना


आधुनिकता से दूर, षहरी चकाचैंध से परे आदिवासी समाज की अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और जीवन-षैली है। प्रकृति के करीब, प्रकृति के साथ और प्रकृति के बीच रचा-बसा आदिवासी समाज आज भी अपनी प्रकृति और पर्यावरण को बचाए और अपनाए हुए है। मध्य प्रदेष की राजधानी भोपाल में बसा जनजातीय संग्रहालय जनजातीय समाज की कला, संस्कृति, रीति-रिवाज़, सौंदर्य और उनके रहन-सहन को करीब से जानने और समझने का अहसास कराता है। इस संग्रहालय में वर्शभर अलग-अलग तरह की गतिविधियां चलती रहती हैं।
जीवन षैली का दर्षन

भारत के तत्कालीन राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा 6 जून, 2013 को उद्घाटित जनजातीय संग्रहालय में मध्य प्रदेष के अलावा छŸाीसगढ़ की कुछ जनजातियों की जीवन षैली, परंपरा को सहेजा और संजोया गया है। जनजातीय संग्रहालय मानो किसी अलग ही दुनिया में होने की अनुभूति कराता है। आदिवासी समाज के सहज, सरल, सादगी भरे जीवन के अद्भुत नज़ारे यहां देखे जा सकते हैं। इनके दैनिक जीवन से जुड़े क्रियाकलाप, उनके सुंदर व साफ़-सुथरे घर, देवलोक, पर्व, त्योहार, पारंपरिक अनुष्ठान, मनोरंजन, श्रृंगार मानो साकार हो उठते हैं। संग्रहालय में अलग-अलग दीर्घाएं हैं। हर दीर्घा की अपनी विषेषता और विषिष्टता है। इस संग्रहालय को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो जनजातीय समाज की खुषबू यहां रची-बसी है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन छः दीर्घाओं को बनाने और सजाने में आदिवासी समाज के लोगों को भी षामिल किया गया है। पुआल, पŸाों, पत्थर, मिट्टी, बांस, लकड़ी, लोहे, सूखे पेड़ों की टहनियों से बनी ये दीर्घाएं आदिवासी जीवन के और निकट ले आती है। इस संग्रहालय में मध्य प्रदेष की गोंड, कोरकू, भील, भरिया, बैगा, सहरिया, तथा कोलू जनजातियों के जीवन की खूबसूरत छटा बिखेरी गई है। संग्रहालय के प्रतीक चिह्न के रूप में बिरछा को दर्षाया गया है, जो गौंड आदिवासियों के श्रृंगार गुदना की मुख्य आकृति है। बिरछा इस समाज की समृद्धि ओर सम्पन्नता का सूचक है। संग्रहालय के प्रवेषद्वार पर कलाकार ने नर्मदा के उद्भव की कथा मन भावन तरीके से प्रस्तुत की है।

चरणबद्ध चित्रण

इस संग्रहालय में कुल छः दीर्घाएं हैं। इनमें आदिवासी समुदाय के लोगों के रहन-सहन एवं उनकी परंपराओं को करीब से देखने का सुअवसर मिलता है।

पहली दीर्घाः इसमें मध्य प्रदेष की सांस्कृतिक विविधता और जनजातियों की प्रमुखता दर्षाई गई है। दीर्घा के बीचोबीच प्रदेष का मानचित्र बना हुआ है जिस पर मध्य प्रदेष की सभी जनजातियों की उपस्थिति दर्ज है। इसी मानचित्र के मध्य राज्य का राजकीय चिह्न वटवृक्ष अंकित है। इसी दीर्घा में आदिवासी समाज द्वारा अनाज के प्रति सम्मान, उसकी उपयोगिता तथा भंडारण के लिए अपनाई गई दूरदर्षिता का अद्भुत नज़ारा प्रस्तुत किया गया है। मिट्टी, बांस, भूसा आदि से निर्मित यह कोठी लिलार कोठी कहलाती है। गोंड जनजातीय लोगों के घरों में विषेश रूप से पाई जाती है। अपनी ख़ास बनावट के कारण लिलार कोठी अनाज सहेजने के अतिरिक्त कमरों को दो हिस्सों में बांटने का भी कार्य करती है। गोंड समाज में इस कोठी का क्या महŸव है यह इसके नाम से ही उजागर हो जाता है। लिलार का अर्थ मस्तक होता है।

दूसरी दीर्घाः इसमें जनजातीय जीवन की विभिन्न गतिविधियों को समेटा गया है। इसमें मध्य प्रदेष की जनजातियों के सुंदर, आकर्शक, साफ़-सुथरे घरों की छटा बिख़री गई है। बांस, छप्पर, मिट्टी, लकड़ी, पुआल आदि से बने लिपे-पुते घर षांति का अहसास कराते हैं। आदिवासियों के घरों की विषेशता यह होती है कि ये मिल-जुलकर बनाए जाते हैं तथा इनके निर्माण में पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। इसी दीर्घा में हमें पावन मगरोहन देखने को मिलता है।

तीसरी दीर्घाः यह आदिवासी समाज के कला-बोध का साक्षात उदाहरण है। इनमें विभिन्न जनजातियों की उत्पŸिा की रोचक कथा तथा सौंदर्य के प्रति उनका आकर्शण समाहित है। इस दीर्घा में बांस की उत्पŸिा, गोदना एवं उसके पीछे के किस्से, मांगलिक कंगन, वाद्य यंत्रों की कहानियां, आदिवासी समाज के पूर्वजों तथा उनकी दिनचर्या को करीब से जानने का अवसर मिलता है। आदिवासी समुदायों में भी चित्रकला की अत्यंत समृद्ध और सम्पन्न परंपरा रही है। इनके जीवन कर्म के विषेश अवसर, अनुश्ठान और आयोजन की झलक इन चित्रों में परिलक्षित होती है। ये सभी चित्र अत्यंत सरल, सहज और साधारण होते हुए भी प्रभावषाली तथा सषक्त होते हैं। यहां पर आपको विभिन्न प्रकार की चित्रकला भी देखने को मिलेगी।

चैथी दीर्घाः इसमें प्रविश्ट होते ही जनजातियों के देवलोक से साक्षात्कार होता है। चूंकि आदिवासी समाज आज भी प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा है इसलिए इनके देवी-देवता भी पेड़-पौधों, आकाष, धरती, बादल, जल, पहाड़ आदि से संबंधित हैं। सभी जनजातियांे की अपनी श्रद्धा, आस्था और विष्वास है। यह दीर्घा उन्हीं से संबंधित किस्से-कहानियांे और देवस्थान का अलौकिक अनुभव कराती है। आदिवासी समाज अपने पूर्वजों को देवी-देवताओं का स्थान देते हैं तथा उनकी पूजा भी करते हैं। यह दीर्घा उनकी उपस्थिति अचरज, कौतूहल और जिज्ञासा के भाव जगाती है।


पांचवीं दीर्घाः इसका मुख्य आकर्शण छŸाीसगढ़ के बस्तर का दषहरा उत्सव और विषाल दषहरा रथ है। बस्तर का दषहरा पर्व संभवतः दुनिया का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला उत्सव है। इस दीर्घा में इस उत्सव की भव्यता और महŸाा के साथ ही छŸाीसगढ़ की जनजातियों की जीवनषैली को समाहित किया गया है। इसमें विष्व प्रसिद्ध घोटुल, भिŸिाचित्र, कला, षिल्प आदि षामिल हैं। इसी दीर्घा में आदिवासी समुदायों से संबंधित पावन ध्वज सजाए गए हैं। इन दीर्घाओं में विमन दीये की उपस्थिति से ये सभी पवित्र हो उठती हैं। यहां पर हमें कुम्हार समुदायों के घर से अवगत होने का अवसर मिलता है। छठी दीर्घाः इसमें पहुंचते ही कहीं न कहीं आप अपने बचपन की ओर लौट चलते हैं। यहां जनजाति समाज के बच्चों के रोचक और दिलचस्प खेल, खिलौने आधुनिकता और भौतिकता से दूर इस समाज के बचपन में भी सादगी और सरलता की छाप दिखाई देती है। 

रक्कू, पिट्ठू, गेडी, कुष्ती, गिप्पा, चैपड़, गुलाम डंडी सहित अटकन-भटकन जैसे दिलचस्प खेलों को यहां इस प्रकार दर्षाया गया है जिसे देखकर लगता है मानो आकृति में रचे बच्चे अभी षोरगुल करते सजीव हो उठेंगे। वास्तव में संस्कृति संचालनालय द्वारा स्थापित जनजातीय संग्रहालय षहरों में निवास करने वालों को आदिवासियों के रहन-सहन से अवगत कराने का अनूठा प्रयास है। संग्रहालयों का षहर आपको यह जानकर आष्चर्य होगा कि भोपाल में कई संग्रहालय विद्यमान हैं जहां पर पर्यटकों को मानव एवं प्रकृति से लेकर वास्तुषिल्प के संबंध में महŸवपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी। भोपाल को संग्रहालयों का षहर कहना अतिष्योक्ति नहीं होगा। यहां पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, प्राकृतिक इतिहास का क्षेत्रीय संग्रहालय आदि विद्यमान हैं। तो देर किस बात की, आप भी अपने परिजनों के साथ इस संग्रहालय को देखने का कार्यक्रम बना लें।