Saturday, August 22, 2020

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सामरिक भागीदारी

जर्मन की चांस्लर एंजेला मार्केल हाल ही में भारत की यात्रा पर आई थीं। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ अंतर-सरकारी मंत्रणा की। मीरा षंकर इस यात्रा की विषेषताओं का वर्णन कर रही हैं
जर्मन की चांस्लर एंजेला मार्केल 31 अक्टूबर से 1 नवम्बर, 2019 को भारत की यात्रा पर आई थीं। वह यहां पर पांचवें दौर की अंतर-सरकारी मंत्रणा करने के लिए पहुंची थीं। इस अनोखी बैठक की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और चांस्लर मार्केल ने की। इस बैठक में ‘‘समस्त सरकार’’ की भागीदारी के रूप में प्रमुख मंत्रियों ने भी हिस्सा लिया।

आर्थिक क्षेत्र में विकास की गति को बनाए रखने के लिए भारत कड़ी मेहनत कर रहा है। उत्पादन क्षेत्र में तेज़ी से पांव पसार रहा है। युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर उत्पन्न कर रहा है। इस संदर्भ में भारत एक निश्पक्ष साझेदार के रूप में जर्मन को अपने करीब पाता है। जर्मन भी उत्पादन क्षेत्र का प्रमुख देष है। जर्मन स्थित कंपनियां कुषल एवं अपने काम में दक्ष भारतीय कारीगरों को अपने यहां रख सकती हैं। जर्मन आईटी क्षेत्र में भारत की सेवाओं का लाभ पा सकता है। इससे एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनेगा, जिसका लाभ दोनों देषों को होगा। वर्तमान की ध्रुवीकृत दुनिया में, जहां सामरिक एवं आर्थिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहे हैं, ऐसी स्थिति में भारत चाहता है कि वह जर्मनी और यूरोप के साथ अपने आपसी संबंध मज़बूत करे। इन सुदृढ़ संबंधों का प्रभाव स्पश्ट रूप से दिखाई दे रहा है।


जर्मनी की चांस्लर एंजेला मार्केल ने राश्ट्रपति भवन में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से भेंट की
जर्मनी जो यूरोप में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देष है, यूरोपीय मामलों पर उसका प्रभाव अधिक देखने को मिलता है। मार्केल के नेतृत्व में जर्मनी में स्थिरता कायम है। यद्यपि जर्मन भी कुछ चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसी हालत में उसे भी भारत में एक सच्चा भागीदार दिखाई दे रहा है। दोनों एक दूसरे को आर्थिक साझेदार के रूप में देखते हैं। दोनों ही देष एक दूसरे के लिए उभरता हुआ बाज़ार हैं। दोनों मिलकर वैष्विक स्तर पर उठने वाली चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। विकट परिस्थिति में वे एक दूसरे का साथ दे सकते हैं। वे नियम-आधारित विष्व का निर्माण करने में अपना अहम योगदान दे सकते हैं। जर्मन यूरोप में भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। भारतीय कंपनियों के लिए तकनीकी सहयोग का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। भारत में लगभग 1,800 कंपनियां सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। अपनी भारत यात्रा के दौरान आर्थिक सहयोग को मज़बूती प्रदान करना ही दोनों नेताओं की भेंटवार्ता का मुख्य बिंदु रहा। हालांकि, भारत-ईयू कारोबार एवं निवेष संधि से संबंधित किसी प्रकार का वादा नहीं किया गया। किंतु दोनों पक्ष यही चाहते हैं कि इस संधि को मज़बूत करने का हर संभव प्रयास किया जाए।


राजघाट पर चांस्लर को स्मृति चिह्न के रूप में चरखा दिया गया

एक प्रमुख केंद्र ऐसा भी था जिस पर दोनों नेताओं ने विस्तारपूर्वक विचार-विमर्ष किया। यह क्षेत्र आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस (एआई) था, जिसमें नवीनतम अन्वेशण द्वारा संयुक्त रूप से डिजिटल बदलाव करने की बात कही गई। स्वास्थ्य, मोबिलिटी, पर्यावरण एवं कृशि ऐसे क्षेत्र थे जिनमें दोनों देषों ने परस्पर सहयोग देने की बात कही। इन क्षेत्रों में भी आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस की मदद लेने पर विचार विमर्ष किया गया। यह फैसला लिया गया कि कारोबारी पहल के रूप में डिजिटल विषेशज्ञों का समूह गठित किया जाएगा। जो भविश्य में अपनाई जाने वाली नीतियों के संबंध में अपनी सिफारिषें प्रस्तुत करेगा। दोनों देषों ने स्टार्ट-अप आरंभ करने की दिषा में एक दूसरे को मदद करने का आष्वासन दिया।


जर्मनी की चांस्लर एंजेला मार्केल ने राश्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत-जर्मन ने एक दूसरे को पूर्ण सहयोग देने की बात कही। जर्मन विकास के क्षेत्र में भारत को सहायता प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देष है। वह अक्षय ऊर्जा एवं ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की मदद करने को तत्पर है। जर्मन ने तय किया कि वह ग्रीन मोबिलिटी में आधारभूत सुविधाएं देने की दिषा में भारत को 1 बिलियन यूरो की अनुदान राषि प्रदान करेगा। इससे भारतीय षहरों में सतत्, विषेश एवं स्मार्ट मोबिलिटी सोल्यूषन पाने में सहायता मिलेगी। साथ ही, स्मार्ट मोबिलिटी सोल्यूषन की क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी।


नई दिल्ली में भारत-जर्मनी के बीच हुए विभिन्न करार के दौरान प्रधानमंत्री श्री मोदी एवं चांस्लर मार्केल भी उपस्थित थे

भारत-जर्मनी ने तय किया कि जीवाष्म ऊर्जा से इतर वे सतत् ऊर्जा के अन्य विकल्पों को अपनाने का भरसक प्रयास करेंगे। अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जर्मनी को महारथ हासिल है। श्री मोदी ने घोशणा की कि वर्श 2022 तक अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में 175 गीगावाट का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वहीं भारत में 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा की प्राप्ति होगी। हां, चुनौती यही रहेगी कि अक्षय ऊर्जा की प्राप्ति रुक होती है तथा इसका भंडारण करना भी संभव नहीं है। इन सब पर खर्च भी बहुत होता है। दोनों देषों ने सहमति जताई कि अक्षय ऊर्जा के संरक्षण की दिषा में वे मिलकर काम करेंगे। मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे, ग्रिड इंटिग्रेषन सिस्टम तैयार करेंगे ताकि व्यापक स्तर पर संरक्षण संभव हो सके। जर्मनी ने अंतरराश्ट्रीय सौर ऊर्जा संघ में षामिल होने की इच्छा जताई, जिसका भारत ने खुले दिल से स्वागत किया। भारत और जर्मनी में सामयिक सहयोग की सीमा देखने को मिलती है क्योंकि भारत-प्रषांत क्षेत्र में जर्मनी की उपस्थिति नहीं है। हालांकि, नाटो का हिस्सा होने के नाते जर्मनी की सेना अफगानिस्तान में तैनात है। इस कारण से वह अफगान से अन्य देषों का संवाद स्थापित कराने में सक्रिय रूप कार्यरत है। अफगानिस्तान में षांति बहाल करने की दिषा में भी जर्मनी अहम भूमिका निभा रहा है। भारत ने इस सभी प्रयासों का स्वागत किया। दोनों देषों के रक्षा मंत्रियों के बीच भी नियमित रूप से बैठक आयोजित की जाएगी, भारत-जर्मनी इस बात पर सहमत दिखे। इस वर्श के आरंभ में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग में कार्यान्वयन की व्यावस्था की दिषा में भी करार किया गया। दोनों पक्षों ने आषा जताई कि इससे सुरक्षात्मक सहयोग में कारगर मदद मिलेगी। भारत और जर्मनी ने संयुक्त राश्ट्र महासभा में स्थाई सदस्यता के लिए एक दूसरे को पूरा सहयोग देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिशद में प्रभावषाली बदलाव की आवष्यकता है। जर्मनी ने परमाणु आपूर्ति समूह में भारत की सदस्यता को भी समर्थन देने की बात कही।


नई दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास पर आयोजित बैठक में जाते हुए श्री मोदी और चांस्लर मार्केल

आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के पारस्परिक संबंध ऐसे ही मज़बूत हों, भारत-जर्मनी ने यही इच्छा जताई। दोनों नेताओं ने माना कि उनकी राह में निस्संदेह चुनौतियां आएंगी। आपसी सहयोग से इन चुनौतियों से पार पाया जा सकता है। इससे दोनों देष अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेंगे।