Saturday, August 1, 2020

मोदी से आगे बुद्धदेव


मोदी  एक ऐसे राज्य के मुख्यमंत्री है जहां पर उनकी पार्टी पिछले ३१ सालों से सत्ता में है और आम शोषित वर्ग के लिए काम करती है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है कहानी और भी जहां हिंसा ,बलात्कार और खून का तांडव नृत्य खेला गया और यह जगह है नंदीग्राम। आज नंदीग्राम से पूरी दुनिया वाकिफ है और वहां पर चल रहें घटनाक्रम की निंदा सभी कर रहें है ,लेकिन संविधान की शपथ से बंधा हुआ एक मुख्यमंत्री बड़े आराम से इस हिंसा का समर्थन करता हुआ नजर आता है। बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के कथन को देखिए वे कहते है कि उनकें कार्यकताओं ने अपने बचाव में कार्यवाही की है, अर्थात वे कहना चाहते है कि जिसने जैसा किया वैसा पाया। लेकिन सरकार और कानून व्यवस्था क्या अंधत्व में लीन हो गए थे और क्या उन्होंने अराजकता फैलाने वाले तत्वों को देखकर अपनी आंखे मूंद ली थी?

ऐसी संवैधानिक अराजकता को देखकर वहां के राज्यपाल का ये कहना कि ऐसा लगता है कि राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा गई है ,कोई अतिश्योक्तिपूर्ण बयान नहीं बल्कि एक ऐसा आईना है जिसमें प्रधानमंत्री नदीग्राम को देखने और समझनें की प्रयास करते तो उनकों एक भयावह तस्वीर नजर आती और शायद वामपंथी सरकार को बॉय बॉय कहने का साहस भी वे करते । लेकिन जो खुद दूसरो के सहारे पर टिका हो वो क्या सहारा देगा। ऑखें तरेरने का साहस मजबूत कंधों में होता है न की धुटने के बल टिकी हुई सरकार में ।

मोदी बनाम बुद्वदेव

गोधराकांड पर मोदी ने प्रतिक्रिया दी थी कि ये तो क्रिया की प्रतिक्रिया है । वे भी संवैधानिक पद पर थे और अपना राजधर्म भूल गए थे। गुजरात दंगों और मोदी के बयान की आलोचना बड़े पैमाने पर हुई थी और वामपंथी दलों ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। लेकिन आज वामपंथी नेता नंदीग्राम पर अपने ही मुख्यमंत्री के बयान और बिगड़ती कानून व्यवस्था को देखकर खामोश है और बचाव करते नजर आ रहें हैं जबकि मुख्यमंत्री बुद्वदेव भटाचार्य लगभग मोदी की राह पर चल पड़े है। वे ऐसा व्यवहार कर रहें है मानों वे एक राज्य के मुख्यमंत्री न होकर अपनी पार्टी के कार्यकर्ता भर हो। समय सबकी कहानी लिखता है आज कटघरें में केवल पश्चिम बंगाल की कानून व्यवस्था ही नहीं , बल्कि वामपंथियों की पूरी विचारधारा दाव पर है अगर वे सही राह पर नहीं लौटते है तो वामपंथ विचारधारा को अपनों से ही चोट पहुचेंगी ।