Monday, October 12, 2020

समाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, एवं धार्मिक दृष्टि से दरभंगा की जिन्दगी

  दरभंगा अतीत काल से ही समाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, एवं धार्मिक  दृष्टि से मिथिलांचल का दिल रहा है। यहाॅ की जीवन्ता से ही मिथिलांचल की जिन्दगी का पता चलता रहा है। राजा जनक एवं सीता की यह धरती मानवता को नई राह दिखाने का जो चराग रौशन किया था वह आज भी दुनिया में फैल रही है। याज्ञवल्कय और उनकी धर्मपत्नी मैत्रेयी, मंडण मिश्र व उनकी धर्मपत्नी भारती की विद्वता से कौन वाकिफ नहीं। गौतम ऋषि के आर्दशों ने दुनिया को एक नई राह दिखाई। देहली सल्तनत के काल में भी यहाॅ राजपूत कर्णाट खानदान की मजबूत हुकूमत थी। जिसका मुख्य राज केन्द्र यही दरभंगा था। हम अपने इतिहास के पन्नों को जब पलटते हैं तो शिक्षा के क्षेत्र में मिथिलांचल का यह भाग सदा से ही एक प्रमुख केन्द्र रहा है। संस्कृत और मैथिली भाषाओं के उत्थान में यहाॅ के विद्वानों ने जो भुमिका अदा की है उस से साहित्य का इतिहास भरा पड़ा है। विद्यापति की रचना ‘‘कृर्तिलता’’ एवं ‘‘कृर्तिपताका’’ विश्व साहित्य में अपना एक खास मकाम रखती है। जहाॅ तक मिथिलांचल विशेष कर दरभंगा में मुसलमानों की शिक्षा का सवाल है तो खिल्जी युग से ही यहाॅ मुसलमानों की आमद के साथ ही उनके इल्म-व-हुनर का पता चलता है। ज्ञातव्य हो कि मुगल काल में दरभंगा संस्कृत एवं मैथिली की तरह ही फारसी एवं अरबी भाषा के ज्ञाताओं का केन्द्र बन गया था। यही कारण है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार का प्रधान अतालीक , (शिक्षक) मुल्ला अबुलहसन दरभंगा का ही निवासी था। आज भी उनके वंसज दरभंगा के किलाघाट में रहते हैं और उनकी पक्की हवेली में मुसलमानों के आखरी पैगम्बर हजरत महम्मद का मुए-ए-मुबारक (सर का एक बाल) सुरक्षित है। जिसके कारण पूरी इस्लामी दुनिया में इसका नाम है। इतिहास बताता है कि प्रारम्भ में यहाॅ मजहबी तालीम अर्थात धार्मिक शिक्षा के लिए मदरसों की शुरूआत हुई। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया यहाॅ के मुसलमानों ने आधुनिक शिक्षा को भी अपनाने का प्रयास शुरू किया।

          मुगल बादशाह शाहजहाॅ के दौर में मुल्ला निजाम शाह काश्मीरी दरभंगा आए। उनकी आमद का खास मकसद तो इसलामी शिक्षा को आम करना था लेकिन उन्होंने इस्लामी धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अरबी एवं फारसी भाषा के विद्वानों की एक बड़ी जमाअत पैदा कर दी। उनमें मुफती जियाउल्लाह, मौलाना हिदायतुल्लाह, मौलाना शाह मो0 फहीम, मौलाना सेराजुद्दीन और मौलाना शरफुद्दीन हुसैन ताहिर जैसे विद्वान शामिल हैं जिन्होंने पूरे भारत में अपनी काबलियत का लोहा मनवाया। और अठारहवीं सदी आते आते यह क्षेत्र मुसलमानों की शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया। हजरत भीका शाह सैलानी और हजरत मरघन शाह ने भी इस क्षेत्र में शिक्षा की ज्योति जगाने में अहम भुमिका अदा की। तुगलक दौर में नवाब मिर्जा खाॅ और नवाब मासूम खाॅ काबुली जो यहाॅ फौजदार बन कर आए थे उन्होंने भी इस क्षेत्र में मुसलमानों के अन्दर शिक्षा की प्यास जगाने का काम किया। 

       जब अंग्रेजों का शासन आया तो गुलामी ने मुसलमानों के हौसले पस्त का दिए और अन्य भारत वासियों की तरह मुस्लिम समाज भी एहसास-ए-कम्तरी का शिकार बना। जाहिर है ऐसे समय में मुसलमानों के दरमयान कोई ऐसा रहनुमा सामने नहीं आया जो इनको शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाता। लेकिन उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ होने के साथ ही एक बार फिर यहाॅ के मुसलमानों के अन्दर शिक्षित होने की ललक बढ़ी और कुछ मजहबी रहनुमाओं ने आगे बढ़कर इनको राह दिखाने का काम किया। उनमें हजरत मौलाना मनौवर अली निस्तवी के प्रयास ने एक संग-ए-मील का काम किया। ज्ञातव्य हो कि आज का मदरसा इम्दादिया, लहेरिया सराय, दरभंगा मौलाना निस्तवी के द्वारा ही 1882ई0 में स्थापित किया गया था। इस मदरसा ने न केवल धार्मिक उलेमा को पैदा किया बल्कि अरबी फारसी के कई विश्व प्रसिद्ध विद्वानों को भी पैदा किया। अल्लामा सय्ैद सुलेमान नदवी और मौलाना नाजिर हसन जिलानी इसी मदरसा के छात्र थे। जिन्हों ने पूरी दुनिया में एक भाषाविद् के रूप में दरभंगा का नाम रौशन किया। 

        1883ई0 में मौलाना हसन अली ने दारूलओलूम मशरकिया हमीदिया की स्थापना की। यह मदरसा आज भी किलाघाट दरभंगा में स्थित है और मुसलमानों को मजहबी तालीम देने के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा देने का भी सार्थक प्रयास कर रहा है। दरभंगा जिला में ही स्थित मदरसा रहमानिया सुपौल, मदरसा कुदरतिया सकरी, मदरसा इस्लामिया अमानिया लोआम आदि एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में स्थापित है और यहाॅ धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जा रही है।  

       दरभंगा शहर में स्थापित मदरसा अहमदिया सलफिया , लहेरिया सराय दरभंगा बीसवीं सदी के प्रारम्भ में स्थापित हुआ जो आज भी दरभंगा में मुसलमानों का एक प्रमुख शिक्षा का केन्द्र है। इसी प्रकार दरस्गाह-ए-इस्लामी और मुस्लिम हाई स्कूल दरभंगा मुसलमानों को शिक्षित करने में अहम भुमिका निभाता आ रहा है। 1957ई0 में स्थापित मिल्लत काॅलेज दरभंगा न केवल दरभंगा बल्कि पूरे बिहार में मुसलमानों की तालीम का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। आजादी के बाद मिल्लत काॅलेज ने मुस्लिम  समाज को शिक्षित करने के साथ- साथ राष्ट्रीय एकता के सुत्रों में बांधने का जो सफल प्रयास किया है उसे कभी भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। ज्ञातव्य हो कि स्वतंत्र भारत में बिहार राज्य का यह पहला काॅलेज है जो अकलियत मुस्लिम समाज को शिक्षित करने एवं उनको राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़े रखने के लिए स्थपित किया गया था। यहाॅ सरहदी गाॅधी खान अब्दुल गफ्फार खान, एवं राष्ट्रपति डाॅ0 जाकिर हुसैन जैसे स्वतंत्रा सेनानियों ने आकर मुस्लिम समाज के लिए शिक्षा के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों की सराहना की थी। बीसवीं सदी की सातवीं दशक में यहाॅ के मुसलमानों ने स्त्री शिक्षा की अहमियत को स्वीकार करते हुए दरभंगा में लड़कियों केलिए एक गर्ल स्कूल की स्थापना का प्रयास किया।