Thursday, October 15, 2020

विचार एवं विचारधरा

 विचार एवं विचारधरा


यह मानना ही पड़ेगा कि बिना विचार के न तो किसी साहित्य की रचना हो सकती है एवं न ही किसी संस्था का निर्माण हो सकता है। समस्त ज्ञान-विज्ञान विचार की ही देन है। जब विचार व्यक्तिगत स्तर से ऊपर उठकर सामाजिक रूप लेने लगते है तो यही विचारधारा बन जाती है। ‘मैं चला था जानिबे मंज़िल मगर  लोगआते गये और कारवां बनता गया’। इस प्रकार विचारधरा बहुत से लोगों के विचारों का समावेशी रूप होता है। 

वर्तमान समय में हम जिन विचारों एवं विचारधरा से प्रभावित हुए हैं वे अध्किांश में पश्चिम से आये हैं। हमारा विकास का माडल, शिक्षा, टैक्नोलाॅजी यहाँ तक की सम्पर्क-भाषा भी वहीं से ली गई है। कभी-कभी लगता है कि पश्चिम की यह आँध्ी हमारा अपना सब उड़ा तो नहीं देगी एवं हम कटी पतंग की तरह इध्र-उध्र भटकते रह जायेंगे। वैसे सभ्यता एवं संस्कृति प्रवाहमान होते हैं एवं उन्हें चिर पुरातन, चिर नवीन भी कहा जाता है। वह नये को आत्मसात करके भी अपने मूल तत्वों को नहीं खोती। हजारों वर्ष पुरानी हमारी संस्कृति भी नित्य नया रूप धरण करके भी शाश्वत बनी हुई है। इस झंझावात से भी यह और अध्कि सुदृढ़ होकर निकलेगी ऐसा विश्वास हम सबको रखना चाहिए। 

स्वयंसेवी संस्थाएँ एवं विकास 

सामान्यतः विकास का अर्थआध्ुनिकता की ओर प्रगति से लिया जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाऐं उपलब्ध् करना है। ये सुविधऐं समाज के एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित न रहकर निचले पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिएँ एवं उन्हें उन्नति के समान अवसर उपलब्ध् होने चाहिएँ। 

किन्तु विकास की यह प्रक्रिया केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित न रहकर बौ(िक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में पहुँचनी आवश्यक है। पश्चिम में भौतिक विकास तो भरपूर हुआ है किन्तु आध्यात्मिक विकास कहीं खो गया है। अतः वहाँ भी आवश्यकता महसूस की जा रही है कि इस विकास में कुछ और भी जुड़ना चाहिए था। 

विकास का कार्य प्रायः ही सरकार के हवाले कर दिया जाता है। सरकारी एंजेन्सियाँ बहुत कुछ करती हैं किन्तु उनकी अपनी सीमाऐं हैं। सरकारी कार्य नियमों के बन्ध्नों से बंध होता है। सरकारी कर्मचारी अपनी जीविका के लिए कार्य करता है। उसमें परहित एवं जनहित की भावना नहीं होती। सरकारी मशीनरी भौतिक विकास भी पूर्ण रूप से नहीं कर पाती बौ(िक एवंआध्यात्मिक विकास का तो वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता। 

यहीं से स्वयं सेवी संस्थाओं की भूमिका प्रारम्भ होती है।  ये संस्थाऐं प्रायः ही कुछ व्यक्तियों के कठिन परिश्रम की उपज होती हैं। सरकारों को राजा का प्रतिनिध्एिवं स्वयं सेवी संस्थाओं को जनता का प्रतिनिध् ि कहा जाता है। वे जमीन से जुड़ी होती हैं एवं उनके नियम-कानून लचीले होते हैं। इनकी उत्त्पति, विकास एवं ये कितनी प्रकार की होती है इस संबंध् में विस्तृत विवेचन अन्दर के पृष्ठों में मिलेगा। किन्तु समय के साथ स्वयं सेवी संस्थाओं में भी कुछ विकृतियाँ आ गई हैं। कुछ विद्वानों ने अपनी शोधें के आधर पर इन विकृतियों को निम्न प्रकार गिनाया है-

1. इन पर कुछ व्यक्तियों ने एकाध्किार स्थापित कर लिया है।

2. कुछ मामलों में ये सरकारी ध्न को हड़पने का साध्न बन गई हैं।

3. एक ही प्रकार का कार्य, एक ही स्थान पर कई संस्थाऐं कर रही हैं एवं उनमेंकोई तालमेल नहीं है।

4. पारदर्शिता का अभाव है।

5. किसी की कोई जवाबदेही नहीं है।

दूसरी ओर सरकारी सहायता प्राप्त करने वाली स्वयं सेवी संस्थाओं की शिकायतें भी कम नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार से सहायता प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। नियम अत्यंत पुराने एवं कठोर हैं। उनमें लचीलेपन का अभाव है।सरकारी अध्किारियों का रवैया काम में विलम्ब करने, रोड़े अटकाने एवं टकराने वाला रहता है। भ्रष्टाचार से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। वास्तविकता तो यही है कि सरकारी ध्न अपने लक्ष्य तक पहुँचते-पहुँचते आध या उससे भी कम रह जाता है। 

उपरोक्त सभी कारणों से स्वयंसेवी संस्थाओं को अध्कि सक्षम बनाने के लिये विशेषज्ञों ने निम्न सुझाव दिये हैं-

1. ये संस्थायें जिन लोगों के लिये कार्य करती हैं उनसे अध्कि से अध्कि सम्पर्क बनाना चाहिये।

2. निधर््न वर्ग को निष्पक्ष रूप से लाभ पहुँचना चाहिए। इसमें जाति, सम्प्रदाय याराजनैतिक विचारधरा आड़े नहीं आनी चाहिए।

3. जन साधरण की आवश्यकताओं एवं दुख दर्द के प्रति इन्हें संवेदनशील होना चाहिए।

4. लाभार्थी कितना भी निधर््न या निर्बल क्यों न हो उसके प्रति सम्मान पूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए।

5. संस्था के संचालकों का जीवन सादा तथा व्यवहार इतना विनम्र होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति उन तक पहुँच सके।

6. कार्य प्रणाली इस प्रकार की हो जिससे विकास, प्रगति एवं सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा मिल सके।

7. विचारों एवं कार्यों में एक रूपता तथा ईमानदारी होनी चाहिए।

8. संस्था के लक्ष्यों के प्रति समर्पण एवं निष्ठा हो।

9. किये गये कार्यों का कुछ परिणाम दृष्टिगोचर होना चाहिए।

10. इन संस्थाओं को अपना कार्य क्षेत्रा नगरों तक सीमित न रखकर ग्रामों में भी कार्य करना चाहिए क्योंकि अभी भी भारत की 70% आबादी गाँवों में ही रहतीहै।

11. अध्किांश स्वयं सेवी संस्थाऐं अपने को प्रायः ही भौतिक विकास के कार्यों तकही सीमित रखती हैं। उन्हें सेवा के साथ ही संस्कारों के क्षेत्रा में भी कार्य करनाचाहिए। इससे मनुष्य का मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास भी होगा।

भारत विकास परिषद् उन गिनी चुनी राष्ट्र व्यापी संस्थाओं में से एक है जिन्होंने सेवा संस्कार दोनों ही क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कार्य किया है एवं अब भी उस कार्यके विस्तार में लगे हुए हैं। परिषद् ने अब तक लगभग 120 प्रकल्प शिक्षा के क्षेत्र,में 380 चिकित्सा के क्षेत्र में तथा 100 से अध्कि ऐसे स्थायी प्रकल्पों का निर्माण किया जो नियमित रूप से जन सेवा में कार्यरत हैं। 550 के लगभग कुछ अन्य प्रकार के प्रकल्प हैं जिनमें गर्मियों में जल सेवा से लेकर मेलों में खोये बच्चों की सहायता करना शामिल हैं।

परिषद् की सदस्यता वाले 45000 परिवार निष्ठा पूर्वक इन क्षेत्रों में रात दिनकार्य कर रहे हैं।