Saturday, October 3, 2020

पूर्व में भारत के मित्र

 पूर्व में भारत के मित्र

भारत ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के अंतर्गत एषिया-प्रषांत क्षेत्र के पड़ोसी देषों से मित्रता बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। इस नीति का आरंभ यद्यपि आर्थिक सुधार के लिए किया गया था, किंतु समय के साथ-साथ इसके तहत राजनीतिक, सामयिक एवं सांस्कृतिक आयामों में भी सुधार देखने को मिला। पूर्व राजदूत अनिल वाधवा हाल ही में इस नीति में आए बदलाव के बारे में बता रहे हैं

भारत ने 1990 के दषक के आरंभ में ‘पूर्व की ओर देखो’ नीति बनाई थी, 2015 तक यह ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में बदल गई। ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का दोहरा मकसद यह था कि क्षेत्र से व्यापारिक संपर्क बढ़ाए जाएं तथा अन्य भारत-प्रषांत देषों के साथ मिलकर विकास किया जाए। इसका लाभ यह होगा कि भारत के पूर्वोŸार राज्य लाभांवित होंगे। तीन ‘सी’ यानी कि काॅमर्स, कल्चर एवं कनेक्टिविटी - भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के स्तंभ हैं।

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी बैंकाॅक में आयोजित 16वें भारत-आसियान षिखर सम्मेलन में अन्य नेताओं के साथ

पिछले कई वर्शों में, भारत ने आसियान देषों (दक्षिण पूर्व एषियाई राश्ट्र संघ) के साथ अपने संबंधों को बहुत मज़बूत बना लिया है। इस दिषा में एआरएफ़ (आसियान रीजनल फोरम), ईएएस (ईस्ट एषिया समिट) एवं एडीएमएम़ (आसियान डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग प्लस) जैसे प्रारूपों पर कार्य किया गया है। इससे आगे बढ़कर जापान, दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया एवं प्रषांत द्वीपों के देषों से भी संबंध सुदृढ़ किए गए हैं। यह उन्नत नीति ‘एक्ट फार ईस्ट’ कहलाती है, जिसके दायरे में अब रूस एवं सुदूर पूर्व के देषों को लाया गया है।

वर्श 1996 में भारत ने साझेदारों के साथ वार्ता आरंभ की। वर्श 2002 में षिखर सम्मेलन आयोजित किए जाने लगे एवं 2012 में आसियान देषों के साथ सामयिक साझेदारी आरंभ की गई। वर्तमान में, भारत विभिन्न क्षेत्रों में आसियान देषों के साथ कम से कम 30 उच्च स्तरीय वार्ताओं में व्यस्त है। भारत चाहता है कि आसियान देषों के साथ उसके कारोबारी संबंध और मज़बूत हों। इस दिषा में वह सक्रिय रूप से जुटा हुआ है। पहले जो यह कारोबार 1.85 बिलियन अमेरिकी डाॅलर का था, अब कुल 3.8 ट्रिलियन डाॅलर सकल घरेलू उत्पाद की ओर अग्रसर हैं।

आसियान देषों ने अप्रैल 2000 से मार्च 2018 के बीच भारत में 68.91 बिलियन डाॅलर का निवेष किया था। वहीं भारत ने 2007 से 2015 के बीच आसियान देषों में 36.67 बिलियन का निवेष किया था। भारत और अन्य आसियान देषों के अलावा अन्य पांच आसियान साझेदार देष - चीन, आॅस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया एवं जापान - सभी मिलकर आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवŸाा एवं पारस्परिक रूप से लाभप्रद क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागेदारी (आरसीईपी) में जुटे हुए हैं।

विजय ठाकुर सिंह (दाएं से तीसरे), भारत विदेष मंत्रालय में सचिव (पूर्व) ने नई दिल्ली में आयोजित 11वीं मेकांग गंगा सहयोग संगठन के वरिश्ठ अधिकारियों की बैठक में हिस्सा लिया। इस बैठक में 2 अगस्त, 2018 को हुई पिछली बैठक की समीक्षा की गई

भारत एवं आसियान देषों के बीच व्यापारिक संबंधों में सुधार के लिए आवष्यक है कि इन देषों में ज़मीन, समुद्र या आकाष के माध्यम से संपर्क बढ़ाया जाए। इस दिषा में भारत त्रिपक्षीय राजमार्ग के निर्माण में तेज़ी ला रहा है। इससे भारत, म्यांमार एवं थाईलैंड एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। उसके बाद इसे लाओस, कम्बोडिया एवं वियतनाम तक बढ़ाया जाएगा। इस राजमार्ग के लिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में एक बिलियन अमेरिकी डाॅलर का अनुदान देने की घोशणा की थी। इस राजमार्ग के 2020 तक खुल जाने की संभावना है। इसके सफल उद्घाटन के लिए आवष्यक बुनियादी ढांचे को स्थापित किए जाने के प्रयास जारी हैं। भारत के पूर्वी बंदरगाहों के अलावा एल्लोर एवं चेन्नई से सीएमएलवी देषों के लिए समुद्री संपर्क बढ़ाने पर भी अधिक बल दिया जा रहा है।

भारत समुद्रीय आर्थिक सहयोग में भी तेज़ी लाना चाहता है। इस दिषा में अलवणीकरण प्रौद्योगिकियों में निवेष, जैव विविधता वाली फसलों की कटाई तथा समुद्र में खनिजों की खोज एवं उत्खनन पर बल दिया जा रहा है। भारत तटीय इलाकों की चैकसी के लिए एक नेटवर्क बनाने पर विचार कर रहा है। अपने साझेदारों के साथ समुद्र से संबंधित विशयों के प्रति जागरूकता फैलाना चाहता है। इतना ही नहीं भारत ने आसियान देषों के साथ मिलकर ग्रीन फंड भी गठित किया है। इसकी मदद से जलवायु पर पड़ने वाले दुश्प्रभावों को कम किया जाएगा।

वर्तमान में, भारत इस क्षेत्र में आसियान देषों की भागीदारी एवं क्षमताओं के प्रचार-प्रसार में जुटा हुआ है। उसका मकसद बीम्सटेक (बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग उपक्रम) को और मज़बूती प्रदान करना है। इसके लिए बंगाल की खाड़ी में सहयोग बढ़ाया जा रहा है। मेकांग गंगा सहयोग समूह में सक्रियता निभा रहा है। इंडो-चीन उप-क्षेत्रों में और संपर्कता बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। भारत और प्रषांत द्वीप देषों के लिए फोरम (एफ़आईपीआईसी) का गठन 2014 में किया था। विकास परियोजनाओं के लिए भारत हर वर्श दो लाख अमेरिकी डाॅलर का अनुदान भी देता है ताकि इस फोरम के 14 सदस्य देषों में समान रूप से विकास हो सके।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास के लिए भारत, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवं अमेरिका के औपचारिक समूह ‘क्वाद’ की गतिविधियां दोबारा आरंभ की गई हैं। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आधारभूत परियोजनाओं के लिए भारत क्वाद का भरपूर सहयोग ले रहा है। भारत इस क्षेत्र में जोख़िम प्रबंधन के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहा है।

थाईलैंड की राजधानी बैंकाॅक में आयोजित 35वें आसियान षिखर सम्मेलन में सदस्य देषों के षासनाध्यक्ष

भविश्य में, भारत आसियान देषों के साथ संपर्कता बढ़ाने वाली परियोजनाओं को तुरंत पूरा करने में लगा है। भारत चाहता है कि आसियान देषों के साथ रक्षा, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक सहयोग और बढ़ाया जाए। सभी सदस्य देष ऐसा माहौल बनाने में मदद दें जिसमें सभी देष स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। भारत हमेषा से ही इस बात पर बल दे रहा है कि आर्थिक विकास के लिए समुद्रीय मार्गों के माध्यम से संपर्क बढ़ाया जाए। स्थाई एवं षांति का वातावरण बनाया जाए।