Friday, October 30, 2020

क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका

क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम

 भारत की स्वतंत्रता के बाद पुलिस जो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का सबसे दृश्यमान अंग है उसकी उन्नति के बजाय नैतिक एवं पेशागत अवनति के प्रति लोग ज्यादा चिंतित हुए । कई विद्वानों ने यह मत दिया कि राज्य की शक्ति चुनाव जैसे वैधानिक प्रावधान और राज्य के दंडात्मक तंत्र से सशक्त होती है। पुलिस राज्य शक्ति का सर्वाधिक दृष्टिगोचर होने वाला दंडात्मक तंत्र का अंग है। पुलिस को विधि-व्यवस्था संचारित करने और सुरक्षा बनाये रखने का जो काम दिया गया है, वह राज्य की शक्ति का प्रतीक है। इस काम को सम्पन्न करने में पुलिस से अपेक्षा है कि वह सभी नागरिकों के लिए सुरक्षा और विधि का शासन सुनिश्चित करेगी। शासन व्यवस्था में पुलिस की एक महत्वपूर्ण भूमिका है जो सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एव राजनैतिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। भारत एक विविधता पूर्ण राज्य है जिसमें कई धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, रंग-रूप के लोग रहते है। अतः भारत में विधि के शासन को संचारित करने वाली लोकतांत्रिक पुलिस की प्रासंगिकता अधिक है। यद्यपि लोकतंत्र में पुलिस को एक बल के बजाय सेवा होना चाहिए जो सभी व्यक्तियों की सुरक्षा, स्वतंत्रता एवं अधिकार सुनिश्चित करें लेकिन विडम्बना यह है कि पुलिस के देखने मात्र से लोगों में भय की भावना व्याप्त हो जाती है। 

पुलिस का काम नियंत्रण, दमन और विनियमन

इसका कारण यह प्रतीत होता है, कि पुलिस का अधिकांश प्रयोग लोगों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से भय पैदा करने के लिए किया जाता है। कठोर भाषा का प्रयोग करना या अभियुक्त आदि के साथ मारपीट करना पुलिस के स्वभाव का अंग माना जाता है। हम 1947 में उपनिवेशवाद से मुक्ति पा चुके हैं परंतु हमारी पुलिस अभी भी औपनिवेशिक मानी जाती है और यह समझा जाता है कि पुलिस का काम नियंत्रण, दमन और विनियमन है न कि सेवा। 1902 के नेशनल पुलिस कमीशन के बाद 1978 में पुलिस कमीशन का गठन हुआ, कई राज्यों ने पुलिस कमीशन बनायें उनके प्रतिवेदन समर्पित हुए किंतु समेकित रूप से उनपर विचार नहीं हो सका। पुलिस की भूमिका पर कभी कुछ पीड़ितों ने आवाज उठायी तो कभी स्वयं पुलिस ने संगठनात्मक स्वतंत्रता के लिए माँग के रूप में पुलिस सुधार की बात कही। किन्तु इस प्रक्रिया में भी पुलिस को लोकतांत्रिक बनाने के लिए पुलिस की नागरिकों द्वारा मोनीटरिंग के विषय पर कभी कोई बहस नहीं हुई। जनसामान्य पुलिस के आलोचक होने के बावजूद पुलिस में सुधार से बहुत सरोकार नहीं रखते हैं। मात्र कुछ सिविल संगठनों यथा काॅमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीसिएटिव ;ब्भ्त्प्द्धष्ए द पीपलस यूनियन फाॅर सिविल लिवर्टीज आदि द्वारा तथा कुछ अन्य मानव अधिकार संगठनों ने पुलिस सुधार की बात कही है।

प्रशासन एवं पुलिस व्यवस्था

भारत में वर्तमान स्वरूप में स्थित प्रशासन एवं पुलिस व्यवस्था की स्थापना ईस्ट इंडिया कम्पनी के द्वारा की गयी थी जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा और मजबूती से अंगीकार किया गया। अतः निष्कर्ष रूप में इसका चरित्र दमनात्मक ही रहा। केवल पुलिस ही नहीं भारत के पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का स्वरूप औपनिवेशक है क्योंकि इस विषय से संबंधित सभी मूल कानून 1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अवतरित हुए। पुलिस एक्ट 1861 में बनाया गया। भारत की दंड विधान संहिता 1860 में, दंड प्रक्रिया संहिता 1862 में, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 में और क्रिमिनल ट्राईब्स एक्ट 1868 में निर्मित हुआ तथा ये ही अधिनियम भारत के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की नींव है। यद्यपि बाद में क्रिमिनल ट्राईब्स एक्ट और भरतीय दंड प्रक्रिया संहिता में परिर्वतन हुआ किंतु इनमें पुलिस की भूमिका से संबंधित जो प्रावधान थे उनमें कोई बदलाव नहीं आया अतः पुलिस की भूमिका यथावत रही। 1902-1903 में अंग्रेजों द्वारा बनाये गये पुलिस कमीशन की चर्चा ऊपर की जा चुकी है और यह स्पष्ट किया जा चुका है कि इसके बावजूद पुलिस में काई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। यह दुखद है कि 1904 में पुलिस कमीशन ने अपने प्रतिवेदन में भारतीय पुलिस को अक्षम, त्रृटिपूर्ण प्रशासन और संगठन वाला बताते हुए भ्रष्ट एवं दमनकारी कहा था

और आज 100 वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी इस धारणा में कोई परिवर्तन नहीं देखा जा रहा है। अब जब हम पुलिस के बदलाव की बात करते है तो हमारी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक पुलिस की है। लोकतांत्रिक पुलिस का क्या स्वरूप होगा यह जानना आवश्यक है। लोकतंत्र में पुलिस केवल एक कानून प्रवर्तन अभिकरण नहीं रह सकती बल्कि इसे सेवामूलक संगठन बनाने की आवश्यकता है। सेवामूलक संगठन बनाने के लिए पुलिस को विधि के शासन के साथ-साथ जनता के प्रति उत्तरदायी होना अनिवार्य है। पुलिस ही नहीं भारतीय लोकतंत्र के लिए भी यह एक चुनौती है। भारतीय पुलिस जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं बनायी जा सकी है। पुलिस में मनमानी करने का स्वभाव भी विद्यमान है, जो लोकतंत्र और विधि के शासन दोनों ही सिद्धातों के प्रतिकूल है।