Monday, October 12, 2020

उर्दू साहित्य जगत में दरभंगा का स्थान

 डाॅ0 अब्दुल वहाब के नेतृत्व में 1972ई0 में जो स्कूल स्थापित हुआ था वह आज सोगरा गर्ल हाई स्कूल के नाम से मश्हूर है और मुस्लिम समाज की लड़कियांे को शिक्षित करने में अहम भुमिका अदा कर रहा है। दरभंगा शहर में स्थापित यतीम खाना मदरसा, इमामबाड़ी, लहेरियासराय भी मुस्लिम अनाथ बच्चों को तालीम देकर मुस्लिम समाज को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने में अग्रगणी भुमिका निभाता रहा है। आज दरभंगा शहर एवं आसपास के क्षेत्रों में दरजनों ऐसे मदरसे एवं स्कूल हैं जो मुस्लिम समाज को शिक्षित करने में दिन रात लगा हुआ है। यहाॅ यह बात भी वाजह कर देना आवश्यक है कि उपरोक्त शिक्षा केन्द्रों के अलावा दरभंगा में स्थापित राज हाई स्कूल, जिला स्कूल, एम0 एल0 एकेडमी, मुकुन्दी चैधरी हाई स्कूल और विद्यापति हाई स्कूल ने भी मुस्लिम समाज को शिक्षित करने में अपनी प्रमुख भुमिका निभाई है। उसी प्रकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सी0एम0 काॅलेज, दरभंगा, सी0एम0 विज्ञान काॅलेज, दरभंगा, मारवाड़ी काॅलेज दरभंगा, के0एस0 काॅलेज लहेरियासराय एवं एम0आर0एम महिला काॅलेज ने भी मुस्लिम समाज को शिक्षित बनाने में बड़ी भुमिका निभाई है।

        हाल के वर्षों में तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्रों में मुसलमानों को आगे बढ़ाने केलिए कई शिक्षा केन्द्रों की स्थापना हुई है जिस से मुस्लिम समाज नई शिक्षा के क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं उनमें डाॅ0 जाकिर हुसैन टीचर्स ट्रेनिंग काॅलेज, मिथिला माइनोरीटी डेन्टल काॅलेज, दरभंगा डेन्टल काॅलेज, डाॅ0 नकी इमाम डेन्टल काॅलेज, बहेड़ा के साथ ही सरयुग डेन्टल काॅलेज दरभंगा ने भी बड़ी भुमिका निभाई है। यूनानी मेडिकल के क्षेत्र में दरभंगा का सलफिया यूनानी मेडिकल काॅलेज लहेरिया सराय ने भी ठोस प्रयास किये हैं यहाॅ से शिक्षित होने वाले सैंकड़ों यूनानी डाॅक्टर देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हैं।

       हाल के दिनों में मौलाना अबुल कलाम आजाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने अपनी इकाई स्थानीय चंदनपट्ी में आई0 टी0 आई0 खोलने का काम किया है साथ ही बी0एड0 काॅलेज एवं माॅडल स्कूल की स्थापना की है जिस से यहाॅ का मुस्लिम समाज लाभानवित हो रहा है। कई निजि स्कूल भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में स्थापित हैं जो मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के प्रयास में सफल रहा है। स्थानीय डाॅन बास्को स्कूल, नेश्नल इंगलिश स्कूल, उर्दू बाजार, सरसयैद स्कूल एवं एकरा एकेडमी के प्रयास भी सराहनीय हैं।

           दरभंगा में स्थापित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना ने भी मुसलमानों को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का जो अवसर दिया है उसको भी फरामोश नहीं किया जा सकता। चिकित्सा के क्षेत्र में दरभंगा मेडिकल काॅलेज ने मुसलमानों को न केवल शिक्षित किया है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान भी कराई है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी इस क्षेत्र का अल्पसंख्यक मुसलमान शिक्षा की उन उॅचाईयों को नहीं पा सका है जहाॅ उन्हें पहूंचना चाहिये था। खास कर मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा अभी अपनी मंजिल से बहुत दूर है। दरभंगा जिला में मुसलमानों की आबादी 17 प्रतिशत से भी अधिक है लेकिन शिक्षित मुसलमानों का प्रतिशत इतना कम है कि उसका ब्योरा देना भी उचित नहीं मालूम पड़ता। आवश्यकता इस बात की है कि इस क्षेत्र के मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा अर्थात तकनीकी शिक्षा एवं व्यवसायिक शिक्षा देने केलिए और भी शिक्षा का केन्द्र खोला जाना चाहिए। खासतौर पर महिलाओं को शिक्षित बनाने का प्रयास होना चाहिए। मेरे ख्याल में जब तक सरकारी स्तर से इस क्षेत्र के मुसलमानों के शैक्षिक स्तर को उठाने केलिए विशेष प्रयास नहीं किया जाएगा उस समय तक मुस्लिम समाज अन्य वर्गों के मुकाबले खड़े नहीं हो सकते। यहाॅ यह बात भी उल्लेख्नीय है कि इस क्षेत्र का मुस्लिम समाज अर्थिक दृष्टि से भी काफी कम्जोर है इसलिए वह निजि व्यवसायिक या तकनीकि शिक्षा केन्द्रों का रूख नहीं कर पाते क्योंकि निजि हाथों में चलने वाले शैक्षनिक संस्थानों की मोटी फीस अदा करना इनके बस की बात नहीं है। यही कारण है कि विगत तीस वर्षों से जिला में दरजनों व्यवसायिक एवं तकनिकि निजि शैक्षनिक संस्थान चल रहे हैं लेकिन इन संस्थानों में मुस्लिम छात्रों की संख्या कभी भी उनकी आबादी के मुकाबले में नहीं रही है। सच्चाई तो यह है कि अकलियत समाज को शिक्षित करने के नाम पर खोले जाने वाले शैक्षनिक संस्थानों में भी मुस्लिम समाज के छात्रों की संख्या आईना दिखाने वाली ही रही है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी वाला पिछड़े 15 जिलों में दरभंगा का भी नाम शामिल है। अब देखना यह है कि जब यह हकीकत सामने आ गई है कि इस क्षेत्र का मुसलमान आर्थिक एवं शैक्षनिक दृष्टि से दलित समाज से भी बदतर की स्थिति में है तो सरकारी स्तर से कौन सा ऐसा प्रयास किया जाता है कि जिससे मुसलमानों की बदहाली दूर हो सकेगी।

मिथिलांचल की राजधानी के नाम से मशहूर दरभंगा अपने अतीत काल से ही उर्दू साहित्य का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। जब दिल्ली, लखनउ एवं अजीमाबाद में उर्दू शायरी परवान चढ़ रही थी ठीक उसी समय दरभंगा में भी उर्दू साहित्य का बीज अंकुर का रूप धारण कर रहा था। चैदहवीं सदी के प्रारम्भ होते ही फारसी, अरबी के साथ-साथ रेख्ता (उर्दू) भाषा के शायर व अदीबों की पहचान बनने लगी थी। लेकिन सच्चाई यह है कि उर्दू जगत ने अठारहवीं सदी में दरभंगा के साहित्यकारों को कबूलियत बख्शा। अयोध्या प्रसाद बहार की पुस्तक ‘‘रियाज-ए-तिरहुत’’ (1868) बिहारी लाल फितरत की पुस्तक ‘‘आईना-ए-तिरहुत’’ (1883) शहजादा जुबैरुद्दीन की पुस्तक ‘‘मौज-ए-सुल्तानी’’ (1884) ने न केवल शायरी बल्कि उर्दू पद्य के क्षेत्र में भी दरभंगा के अदीबों को स्थापित करने का काम किया। यही वजह है कि दरभंगा बीसवीं सदी के प्रारम्भ में उर्दू साहित्य का एक प्रमुख केन्द्र बन कर साहित्य जगत में सामने आया। उर्दू के साहित्यकार व इतिहासकार शादाॅ फारूकी ने अपनी पुस्तक ‘‘बजम-ए-शुमाल’’ (1986) में दरभंगा व आस-पास के 250 से अधिक शायर व अदीबों का जिक्र किया है। जिससे यह प्रमाणित होता है कि यह क्षेत्र उर्दू साहित्य के सृजन में कितना अहम रहा है। शायरी व नसरनिगारी के साथ-साथ उर्दू पत्रकारिता के मामले में भी दरभंगा का स्थान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित रहा है। आज पटना से प्रकाशित होने वाला उर्दू का राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘‘कौमी तनजीम’’ की शुरूआत एस0 एम0 उमर फरीद के सम्पादन मंे दरभंगा से ही हुई थी। उर्दू के आलोचक एवं साहित्यकार डाॅ0 मुश्ताक अहमद के अनुसार ‘‘दरभंगा में उर्दू पत्रकारिता के इतिहास का जाएजा लेने से यह हकीकत सामने आती है कि दरभंगा में उर्दू पत्रकारिता बीसवींसदी की शुरूआत के साथ प्रारम्भ होती है। दरभंगा में उर्दू की प्रथम पत्रिका ‘‘मसीहा’’ हकीम अबुल हस्नात नासिर ने 1905 ई0 में शुरू की’’। अर्थात उर्दू साहित्य की विद्या शायरी, नसरनिगारी, पत्रकारिता एवं इतिहास लेखन के क्षेत्र में दरभंगा हमेशा से प्रमुख स्थान रखता है।

      अब सवाल है कि आज की तारीख में दरभंगा उर्दू साहित्य जगत में कौन सा स्थान रखता है और यहाॅ के शायरों और अदीबों ने स्वयं को किस प्रकार स्थापित किया है, तो थोड़ी सी मेहनत से ही यह सच्चाई सामने आ जाती है कि वर्तमान उर्दू साहित्य में दरभंगा के अदीबों व शायरों को प्रमुख्ता हासिल है। मजहर इमाम को उर्दू का साहित्य अकादमी अवार्ड मिलने के बाद तो यह साबित हो गया है कि वर्तमान उर्दू साहित्य का इतिहास दरभंगा के साहित्यकारों को नजरअंदाज करके नहीं लिखा जा सकता। आज ओवैस अहमद दौराॅ, प्रो0 अब्दुल मन्नान तरजी, प्रो0 शाकिर खलीक, डाॅ0 मनसूर उमर, डाॅ0 मुश्ताक अहमद, अता आबदी, खालिद एबादी, जमाल ओवैसी, डाॅ0 इमाम आजम, फारूक आजम अनसारी, डाॅ0 केयाम नय्ैर, सोहैल जामई, मनौवर राही, मोबीन सिद्दीकी, मुश्ताक शमसी, डाॅ0 सोहैल अख्तर, डाॅ0 बरकत अली, डाॅ0 आफताब अशरफ, डाॅ0 मो0 इम्तेयाज जैसे शायरों व अदीबों की लेखनी से वर्तमान उर्दू साहित्य का पन्ना भरा हुआ है।

          प्रो0 इज्तबा रिजवी, शादाॅ फारूकी, मुर्तजा अजहर रिजवी, प्रो0 अब्दुल मन्नान तरजी, प्रो0 एम0 कमालुद्दीन एवं प्रो0 तैयब सिद्दीकी, डाॅ0 रईस अनवर, डाॅ0 मो0 कैस के कारनामों से उर्दू जगत को नई दिशा मिली है। प्रो0 तरजी की दो दर्जन पुस्तकों ने दरभंगा को उर्दू साहित्य जगत में जो स्थान दिलाया है वह एक तारीखी कारनामा है। इन्होंने दरभंगा का एक मन्जूम इतिहास लिखा है जिसमें दरभंगा के साहित्यकारों के कारनामों को पेश किया है। आधुनिक उर्दू शायरी में प्रो0 ओवैस अहमद दौराॅ एवं प्रो0 शाकिर खलीक को किसी तौर पर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। डाॅ0 मनसूर उमर ने शायरी के साथ-साथ नसर निगारी में भी खुद को स्थापित किया है। उर्दू उपन्यास लेखन में दरभंगा को आचार्य शौकत खलील ने एक प्रमुख स्थान दिलाया है। इनका उपन्यास ‘‘अगर तुम लौट आते’’ पूरी उर्दू दुनिया में हलचल पैदा करने में कामयाब रहा है। इन्हों ने उर्दू साप्ताहिक ‘‘आग का दरिया’’ के जरिए उर्दू पत्रकारिता में भी दरभंगा को पहचान दिलाई थी। उसी प्रकार नई पीढ़ी के शायरों में डाॅ0 मुश्ताक अहमद, अता आबदी, खालिद एबादी, जमाल ओवैसी और मोबीन सिद्दीकी ने दरभंगा को एक खास पहचान दिलाई है। डाॅ0 मुश्ताक अहमद (प्रधानाचार्य, मिल्लत काॅलेज, दरभंगा) ने शायरी के साथ-साथ आलोचक के रूप में भी खुद को स्थापित किया है। इनकी एक दर्जन पुस्तकें उर्दू तनकीद (आलोचना) और तहकीक (शोध) के क्षेत्र में संदर्भ पुस्तक का स्थान रखती हैं। इनकी पुस्तक ‘‘तनकीदी बसीरत’’, ‘‘तनकीदी तकाजे’’, ‘‘इकबाल की असरी मानवीयत’’, ‘‘बहादुर शाह जफर’’ एवं ‘‘आतिश-ए-पिन्हाॅ’’ को उर्दू जगत ने हाथों हाथ लिया है जिससे दरभंगा का नाम रौशन हुआ है। इनके सम्पादन में ही ‘‘जहाॅन-ए-उर्दू’’ जैसी साहित्यिक त्रेमासिक पत्रिका विगत दस वर्षों से प्रकाशित हो रही है। जिसने उर्दू साहित्य जगत में अपनी एक खास पहचान बनाई है। डाॅ0 इमाम आजम ने अपनी शायरी एवं लेखनी से नई पीढ़ी में अपनी पहचान बनाई है। इनकी साहित्यिक त्रेमासिक पत्रिका ‘‘तमसील-ए-नौ’’ उर्दू पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखती है। वर्तमान में कई ऐसे नए शायर सामने आए हैं जो उर्दू शायरी जगत में अपनी पहचान बना रहे हैं। उनमें जुनैद आरवी, मन्जर सिद्दीकी, निदा अरफी, मनसूर खुशतर आदि के नाम शामिल हैं। वर्तमान में उर्दू पत्रकारिता को नई दिशा देने में मो0 आफ्ताब जीलानी, मनसूर खुशतर, फिरदौस अली, शमीम रहमानी, एम0ए0सारिम  रफी सागर आदि प्रमुख स्थान रखते हैं।

         उर्दू कहानी लेखन में भी दरभंगा को उर्दू साहित्य जगत में प्रमुख्ता हासिल रहा है। आचार्य शौकत खलील, शमीम सैफी, ओबैदुल्लाह सिद्दीकी, की कहानियों ने उर्दू के सुधि पाठकों को अपनी ओर मुखातिब किया था। वर्तमान में डाॅ0 केयाम नैयर, सोहैल जामई, डाॅ0 मुश्ताक अहमद, आलमगीर शबनम, एम0ए0 शमसी, मोजीर अहमद आजाद, मुश्ताक शमसी, ने अपनी शिनाख्त कायम की है।

         उपरोक्त संक्षिप्त विवरणी से ही पता चलता है कि वर्तमान उर्दू साहित्य जगत में दरभंगा के शायरों एवं अदीबों ने अपनी नई फिक्र से अपनी एक अलग शिनाख्त कायम की है और दरभंगा को माजी की तरह स्थापित करने का काम किया है। सच्चाई तो यह है कि आज बिहार में दरभंगा ही एक ऐसा शहर है जहाॅ से दो साहित्यिक पत्रिकाऐं प्रकाशित हो रही हैं और साहित्य जगत में हलचल पैदा कर रही हैं। नई पीढ़ी के शायर व अदीब भी बड़ी तेजी से साहित्यिक पटल पर अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे हैं। इस से ऐसा लगता है कि दरभंगा की अदबी तारीख में जल्द  ही एक नए पाठ का इजाफा हो सकेगा।