Monday, October 12, 2020

बिहार में सरकारी दषा दयनीय

   बिहार में विगत तीन दषकों से उर्दू राज्य की दूसरी सरकारी जुबान है। लेकिन इस के बावजूद राज्य में उर्दू की दषा दयनीय है और इस के लिए किसी एक राजनैतिक पार्टी या सरकार को दोषी करार नहीं दिया जा सकता। क्योंकि इस तवील अरसे में कई सियासी पार्टियाॅ सत्ता में रही हैं। ज्ञातव्य हो कि 1980ई0 में कांग्रेस सरकार ने उर्दू को राज्य में दूसरी सरकारी जुबान का दर्जा दिया था। उस समय भी कई सियासी पार्टियों ने इसका विरोध किया था और उर्दू को मुसलमानों से जोड़ कर सम्प्रदायिक गलतफहमी फैलाने की कोषिष की थी। जब्कि सच्चाई यह है कि उर्दू मूल रूप से भारतीय संस्कृति की उपज है। इसका संबन्ध किसी खास जाति या धर्म से नहीं है और न इस्लाम मजहब से इसका कोई नाता रिष्ता है। 

इतिहास गवाह है कि उर्दू भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की पैदावार है और शुरू से ही विभिन्न धर्मो और जातियों के लोगों की यह मातृ भाषा रही है। मिसाल के तौर पर प्रेम चन्द, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चन्द्र, जगननाथ आजाद, गुलजार देहलवी और प्रो0 गोपी चन्द नारंग जैसे सरीखे साहित्यकारों का संबन्ध इस्लाम धर्म से नहीं है। लेकिन इन सभों ने उर्दू भाषा के फरोग में अहम भूमिका निभाई है। अफसोस की बात है कि मुल्क के चंद तंगजेहन लोगों ने उर्दू को भी जाति और धर्म से जोड़ कर हमेषा नुकसान पहूंचाने की कोषिष की है। नतीजा है कि हर सतह पर उर्दू की हकतलफी होती रही है और इसे आज तक वह मकाम नहीं मिल पाया जिसकी यह हकदार है। सनद रहे कि किसी भाषा का फरोग (विकास) उसकी षिक्षा पर मुनहसर (निर्भर) होता है। लेकिन बिहार में उर्दू की षिक्षा की समस्या ने हमेषा ही उर्दू वालों को जेहनी परेषानियों में मुबतला रखा है। 

आज भी प्राईमरी सतह से लेकर काॅलेजों और यूनिवर्सिटियों में उर्दू की षिक्षा का माकूल इंतेजाम नहीं हो पाया है। सैंकड़ों स्कूल और काॅलेज ऐसे हैं जहाँ उर्दू षिक्षक नहीं हैं और कहीं-कहीं तो उर्दू षिक्षक के पद भी नहीं हैं। परिणाम यह है कि राज्य में दूसरी सरकारी जुबान होने के बावजूद उर्दू हाषिये पर है। यह एक संगीन मसअला है जिसपर सरकार को संजीदगी से सोचने की जरूरत है। क्योंकि उर्दू को उसका वाजिब हक देना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य भी है। मुझे खुषी है कि वर्तमान बिहार सरकार के सामने जब उर्दू भाषियों ने अपने एक अहम मसअले की तरफ तवज्जोह दिलाई है तो षिक्षा मंत्री पी0 के0 शाही ने उसे गंभीरता से लिया है। ज्ञातव्य हो कि हाल में प्राईमरी सतह के स्कूलों में षिक्षक पात्रता परीक्षा के आधार पर षिक्षकों की बहाली होनी है उसमें सरकार द्वारा ऐसे ही इन्टर योग्यताधारी को उर्दू षिक्षक के रूप में बहाल करने का निर्णय लिया गया था जो 100 अंक की उर्दू के साथ परीक्षा पास हों। जब्कि इन्टरमीडिएट में मातृ भाषा उर्दू 50 अंक की ही होती है। इस लिए सरकार द्वारा निर्धारित आर्हता के मुताबिक उर्दू भाषी उम्मीदवारों को भारी नुकसान हो सकता था क्योंकि वह 100 अंक की शर्त पूरी नहीं कर पा रहे थे।

 लेकिन बिहार विधान परिषद् में विपक्ष के नेता श्री गुलाम गौस और माननीय सदस्य डाॅ0 तनवीर हसन की कोषिषों एवं श्री सलीम परवेज, माननीय उपसभापति बिहार विधान परिषद् की खुलूसनियती की वजह से इस समस्या का निदान हो गया है और श्री पी0के0 शाही, माननीय मंत्री षिक्षा विभाग बिहार सरकार ने 100 अंक के स्थान पर 50 अंक की उर्दू की अनिवार्यता तैय की है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जिससे हजारों उर्दू वालों को फायदा होगा। ज्ञातव्य हो कि बिहार में 27000 उर्दू षिक्षकों की बहाली होनी है ऐसी सूरत में अब अधिक से अधिक उर्दू भाषी उम्मीदवार उर्दू षिक्षक बहाली में शामिल हो सकेंगे। क्योंकि हाल ही में 34540 षिक्षको की बहाली राज्य में हुई है उसमें 12862 उर्दू षिक्षकों के पद थे। लेकिन उसमें 200 अंक की उर्दू की अनिवार्यता के कारण मात्र 3000 उर्दू षिक्षक ही बहाल हो सके। अर्थात उर्दू भाषी षिक्षकों का 9000 से अधिक पद रिक्त रह गया। जाहिर है इससे उर्दू का बड़ा नुकसान हुआ है।

 क्योंकि किसी भी भाषा को जब तक रोजगार से नहीं जोड़ा जाता है उस वक्त तक उसकी तरक्की मुम्किन नहीं। इस लिए आवष्यकता इस बात की है कि उर्दू को रोजी रोटी से जोड़ने का इमानदाराना प्रयास होना चाहिए ताकि उर्दू की तरक्की का रास्ता हमवार हो सके और अब तो षिक्षा के अधिकार कानून के तहत बुनियादी षिक्षा मातृ भाषा में देने की संवैधानिक मजबूरी भी है। ऐसी हालत में किसी भी तौर पर उर्दू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उर्दू के विकास से अन्य भारतीय भाषाओं के विकास की कड़ी भी जुड़ी हुई है क्योंकि उर्दू के 80 प्रतिषत शब्द भारत की अन्य भाषाओं की ही देन है। इस लिए उर्दू भारत के किसी खास इलाके की जुबान नहीं है बल्कि इसका दायरा पूरा मुल्क है। जो लोग उर्दू को किसी खास इलाके या सम्प्रदाय से जोड़ कर देखते हैं वह या तो संकृर्ण मांसिकता के व्यक्ति हैं या फिर भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की तारीख से नावाकिफ हैं।