Saturday, October 17, 2020

महिलाओं के उत्थान के लिए सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण

महिलाओं के उत्थान के लिए सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण 

महिलाओं के उत्थान के लिए सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण पर्याप्त नहीं है बल्कि राजनीतिक सशक्तीकरण सबसे महत्वपूर्ण है। स्वयं सहायता समूहों को महिलाओं के राजनैतिक सशक्तीकरण के रूप में भी देखा जा सकता है हालांकि पंचायतों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण के फलस्वरूप गांव की सत्ता में महिलाओं को भागीदारी का अवसर मिला है। इस प्रकार से सत्ता में भागीदारी के फलस्वरूप महिला समूह एक ऐसे संगठन के रूप में उभर कर आए, जिनमें महिलाएं गांव के विकास के बारे में सोचने लगीं। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब महिला प्रतिनिधियों ने ग्रामीण समस्याओं पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया और उन्हें हल करने की पहल की हालांकि अभी भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना शेष है। राजनीति में सक्रिय महिलाओं में पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी पाटिल, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश - सुश्री मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री- सुश्री ममता बनर्जी, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री - सुश्री जयललिता, दिल्ली की मुख्यमंत्री - श्रीमती शीला दीक्षित, सदन में विपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज आदि महिला नेत्रियों ने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसे हम राजनैतिक सशक्तीकरण के रूप में देख सकते है।

पिछड़े राज्यों में महिला सषक्तीकरण की प्रगति

(क) छत्तीसगढ़: राज्य की महिलाएं व्यक्तिगत रूप से और संगठित होकर आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी कर सकें, इसके लिए उन्हें ‘छत्तीसगढ़ महिला कोष‘ की ऋण योजना तथा सक्षम योजना के तहत आसान शर्तों पर केवल तीन प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही व्यावसायिक कुशलता प्रदान करने के लिए स्वावलम्बन योजना, उद्यमिता जागरूकता कार्यक्रम और कौशल उन्नयन के माध्यम से उन्हें निःशुल्क प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ महिला कोष के माध्यम से पिछले करीब दस वर्षों में 20 हजार से अधिक महिला स्वसहायता समूहों को आमदनी मूलक गतिविधियों के लिए 30 करोड़ 34 लाख 50 हजार रूपए की ऋण राशि वितरित की जा चुकी है। इन योजनाओं की मदद से राज्य की हजारों महिलाएं सामाजिक-आर्थिक रूप से सक्षम बन चुकी हैं। राज्य में संचालित करीब 50 हजार आंगनबाड़ी केन्द्रों और मिनी आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से लगभग 26 लाख बच्चों और गर्भवती व शिशुवती माताओं के लिए पोषण पूरक आहार तैयार करने की जिम्मेदारी प्रदेश के महिला स्व-सहायता समूहों को ही दी गयी है। उचित मूल्य की दुकानों के संचालन के साथ ही स्कूली बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन तैयार करने का कार्य भी महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा प्राथमिकता से किया जा रहा है। इसके अलावा महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा बड़ी, पापड़, अचार, मसाला, दलिया, मुरब्बा छत्तीसगढ़ी व्यंजन, सेनिटरी और फिनाइन निर्माण के साथ ही बकरी पालन, मछली पालन, कोस कृमि पालन, लाख की खेती, मशरूम उत्पादन, बांस शिल्प और काष्ठ शिल्प का कार्य भी किया जा रहा है।

महिलाओं के समग्र विकास के साथ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने और राज्य के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ प्रदेश की महिला सशक्तीकरण नीति भी बनाई गई है। घरेलु हिंसा, देहज प्रताड़ना, टोनही प्रताड़ना और संपत्ति विवाद से परेशान महिलाओं को पुलिस या न्यायालयीन कार्यवाही से राहत दिलाने तथा उनकी सुविधा के लिए विकासखंड स्तर पर महिलाओं की शिकायतों की सुनवाई हेतु महिला अदालतों का भी गठन किया गया है। महिलाओं की सुरक्षा और सरंक्षण के लिए राज्य में छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005, घरेलु हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 सहित अनेक कानून लागू किये गये हैं। महिलाओं एवं बालिकाओं की आपातकालीन सहायता के लिए दूरभाष हेल्पलाइन 1091 की स्थापना की गई है। महिलाओं एवं बलिकाओं की सहायता के लिए राज्य के सभी थानों में महिला डेस्क की स्थापना का निर्णय भी एक अच्छी पहल है, जहाँ केवल महिला कर्मी ही तैनात होगी। इन योजनाओं के सकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं।

(ख) मध्यप्रदेष:- मध्यप्रदेश में भी लाखों की तादाद में महिला स्वयं सहायता समूह गठित किए गए। ये समूह सरकारी एजेंसियों के अलावा महिला आर्थिक विकास निगम तथा स्वयं सेवी संस्थाओं द्वार संचालित किए जा रहे हैं। कई सरकारी योजनाओं का लाभ भी इन समूहों के माध्यम से महिलाओं को दिया जाता रहा है। स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा गठित समूहों ने राजनैतिक पहलुओं को भी छूने का प्रयास किया है। पिछले कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई, जब महिला समूहों ने जल संकट जैसी कई समस्याओं के निदान के लिए ग्रामसभा में न सिर्फ अपनी आवाज बुलंद की, बल्कि उसे समाधान के प्रयास भी किए। इसके अलावा गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी, राशन- दूकान की माॅनिटरिंग भी इन समूहों की महिलाओं ने की, जिससे गांव की सार्वजनिक सेवाएं ज्यादा उत्तरदायी हो सकी।

सत्ता और विकास में जन भागीदारी के इस दौर में महिला स्वयं सहायता समूह ज्यादा बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। यह देखा गया है कि इन समूहों के माध्यम से महिलाओं के आपस में मिल बैठने का अवसर मिला, जो न सिर्फ आर्थिक बचत और आपसी बचत और आपसी सुख-दुख बांटने तक सीमित रहा, बल्कि इससे विकास में उनकी भागीदारी के लिए भी अनुकूल वातावरण बना। समता, सामाजिक न्याय और पंचायत के उत्तरदायित्व जैसे मामलों में भी इस समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह देखा गया है कि स्वयं सहायता समूहों के कारण सत्ता और विकास में महिलाओं की भागीदारी संभव हो पाई है। कई स्थानों पर महिलाओं ने श्रमदान के जरिए गांव के विकास में अपन भूमिका निभाई, तो कई महिलाओं ने गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य, आंगनबाड़ी और राशन की दूकान जैसी सेवाओं के लिए आवाज उठाई। हरदा जिले के ग्राम छुरीखाल की महिलाओं ने तो आंगनबाड़ी नियमित रूप से संचालित करने के मुद्दे पर ग्रामसभा में आवाज उठाई और आज ये महिलाएं खुद आंगनबाड़ी का निरीक्षण कर रही है। कहा जाता है कि उनमें यह आत्मविश्वास समूह में इकट्ठे होने की वजह से आया। इस तरह और भी कई उदाहरण है, जहाँ स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने विकास की मिसाल कायम करने में सफलता हासिल की है।

(ग) बिहार:- बिहार में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण देकर महिला सशक्तिकरण की भूमिका में एक अच्छा प्रयास किया गया है, लेकिन इसमें भी बहुत दिक्कते आई, गावों में खासी दिक्कतें आईं, क्योंकि घर के पुरूष तो मान जाते हैं, लेकिन गांव के दंबगों का कहना था कि इस तरह तो महिलाएँ हाथ से निकल जाएंगी। उन्हें डर था कि इस तरह तो उनकी गांव में बनी सालों की सत्ता हिल जाएगी। इसलिए वे बार-बार घर के पुरुष को डराते रहते कि महिलाओं को ज्यादा आजादी देने की जरूरत नहीं है। अगर महिलाएं पंचायत में चुनकर आती तो गांव के लोग हंसते और ताने मारते। खैर! पिछले कुछ सालों से महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया चल रही है। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के राजनैतिक के बचत समूह गठित कर उनके आर्थिक सशक्तिकरण के प्रयास किए जा रहे हैं किंतु इन समूहों को महिलाओं के सशक्तिकरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पंचायतों में महिलाओं के पचास फीसदी आरक्षण के फलस्वरूप गांव की सत्ता में महिलाओं को अपनी भागीदारी निभाने का अवसर जरूर मिला है।

अंतरराश्ट्रीय स्तर पर महिला मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की प्रस्तावना में कहा गया है कि ‘‘हम संयुक्त राष्ट्र के लोग मूलभूत मानवाधिकारों में मानव की गरिमा, महत्त्व व मूल्य में तथा स्त्री, पुरुष के समान अधिकारों में आस्था व्यक्त करते हैं। साथ ही चार्टर में महिलाओं के समानता के अधिकारों की घोषणा की गई है।‘‘ अनुच्छेद 16(1) के अनुसार वयस्क पुरुष व स्त्रियों को मूल, वंश, राष्ट्रीयता या धर्म के कारण किसी भी सीमा के बिना विवाह करने और परिवार स्थापित करने का अधिकार है। अनुच्छेद 23(2) के अनुसार स्त्री पुरुष में भेदभाव किए बिना समान कार्य के लिए समान वेतन पाने का अधिकार है। अनुच्छेद 26(1) के अनुसार सभी व्यक्तियों को शिक्षा पाने का अधिकार है चाहे वे स्त्री हो या पुरुष। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के समुचित विकास पर संयुक्त राष्ट्र ने विश्व महिला सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया ताकि महिलाएँ स्वयं के विकास के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त कर सके तथा नीति निर्धारण में उनके विचारों को प्रमुखता दी जा सके। इस परम्परा के अंतर्गत विभिन्न विश्व महिला सम्मेलन आयोजित किए जा चुके है।

प्रथम विष्व महिला सम्मेलन सन् 1975 मेक्सिको: इस सम्मेलन में वर्ष 1975 से 1984 को महिला दशक के रूप में घोषित किया तथा पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गई जिनमे स्त्री शिक्षा, लिंग भेदभाव मिटाना, महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढाना, नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी, समान राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिकार देने आदि पर बल दिया गया।

नई दिल्ली सम्मेलन 1997: ‘‘वीमेंस पोलिटिकल वाच‘‘ नामक गैर सरकारी संगठन ने संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से विश्व सांसद सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया, इसका उद्देश्य महिलाओं की सत्ता में भागीदारी बढ़ाना था।

भारत में महिला मानवाधिकार: 

मानवाधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की प्राप्ति के लिए भारत ने भी लम्बे समय से संघर्ष किया है। सदियों से भारत में सती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, अधिकार विहीनता, रूढिवादिता समाज का मुख्य अंग था परंतु 19वीं शताब्दी में पश्चिमी शिक्षा के आगमन से संस्कृतियों का टकराव हुआ जिसके फलस्वरूप महिला अधिकारों की बात की जाने लगी। लोग परंपरागत ढांचे से बाहर निकलकर सोचने लगे और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जाने लगा। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों को लागू करने के लिए 1950 में संवैधानिक उपाय किए गए।